0156. कोर्ट नाटक

1) अभी हम सुब्रमनियम स्वामी के कोर्ट नाटक के बारे में बात करेंगे

जब तक नेताओं, अधिकारीयों आदि को सज़ा नहीं होगी , तब तक उन्हें भ्रष्टाचार करने से डर नहीं लगेगा और वे भ्रष्टाचार करना बंद नहीं करेंगे और भ्रष्टाचार कम नहीं होगा |

बिना भ्रष्ट को सज़ा हुए कोर्ट के मुकदम्मे केवल एक नाटक हैं , जो वास्तविक कार्यकर्ताओं को गुमराह करते हैं |

15 सालों से सुब्रमनियम स्वामी के कोर्ट के कार्यवाही में कोई भी नेता या बड़े अधिकारी को सज़ा नहीं हुई है |

उन्होंने 1996 में जयललिता के खिलाफ कोर्ट में मामला दर्ज किया था और जैसे ही जयललिता ने अटल बिहारी वाजपाई की सरकार को दिया गया अपना समर्थन वापिस लिया  तो सुब्रमनियम ने मामलों को कमजोर होने और लटकने दिया |

सुब्रमनियम स्वामी बोलते हैं मीडिया में कि वे कोर्ट के द्वारा भ्रष्ट को सज़ा देंगे और भ्रष्टाचार कम करेंगे लेकिन एक भी कोर्ट द्वारा माने जाने वाला प्रमाण उनके पास नहीं है, जो ये सिद्ध कर सके कि चिदमबरम आदि नेताओं ने रिश्वत ली है या उन नेताओं को कैसे फायदा हुआ है घोटालों द्वारा | पिछले 15 सालों से सुब्रमनियम कोर्ट के मुकदमे लड़ रहे हैं लेकिन आज तक एक भी व्यक्ति को सजा नहीं दिलवा सके हैं | सुब्रमनियम केवल मीडिया में ही बोलते हैं कि चिदंबरम ने इतने पैसे रिश्वत में लिए हैं और उनके फलाना बैंक में , फलाना खाते नंबर में जमा हैं ; वे कोर्ट में नहीं बोलते | क्यों ? क्योंकि उन्हें भी मालूम है कि ये कोर्ट में सिद्ध नहीं किया जा सकता है |
इसको कोर्ट में सिद्ध करने के लिए , उस विदेशी बैंक के डायरेक्टर को भारत के कोर्ट में आ कर गवाही देनी होगी | लेकिन ये असंभव है क्योंकि उन विदेशी बैंकों की ये नीति नहीं है कि उनके यहाँ के गुप्त खातों की जानकारी सार्वजानिक की जाए |

पिछले 15 साल के उनकी कोर्ट की कार्यवाही में , एक भी भ्रष्ट नेता या अधिकारी को सज़ा नहीं हुई है और बिना भ्रष्ट को सज़ा हुए , भ्रष्टाचार कम नहीं होगा | इसलिए सुब्रमनियम सवामी ने अभी तक भ्रष्टाचार कम करने के लिए कुछ भी नहीं किया है |

 

2) सुब्रमनियम का राईट टू रिकॉल पर झूठ और राईट टू रिकॉल का विरोध

     1977 में जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में राईट टू रिकॉल की मांग की थी |
सुब्रमनियम और अन्य नेता जैसे लालू यादव, नितीश कुमार, शरद यादव आदि.
राईट टू रिकाल के मुद्दे पर जीते थे और सांसद बने थे, लेकिन सांसद बनने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को रद्दी के टोकरे में डाल दिया था |
लिंक -
देखें पन्ना “6 ASIA” या “recall” शब्द के लिए सर्च करें इस लिंक में --- http://www.larouchepub.com/eiw/public/1977/eirv04n09-19770229/eirv04n09-19770229.pdf

इस लिंक में पोलिटिकल रिफोर्म का नंबर 8 पॉइंट कहता है ---
“(8) तारकुंडे समिति समेत सभी समितियां के सुझावों पर अच्छी तरह से विचार करने के बाद चुनावी सुधर लाओ और विशेषकर भटके हुए विधायकों के रिकाल (वापिस बुलाना) के प्रस्ताव और चुनावी खर्चा कम करने के प्रस्ताव और मतदान की आयु 21 से कम करके 18 करने का प्रस्ताव |”

 लेकिन वे 1977 का जनता पार्टी का ऐतिहासिक घोषणा-पत्र कई बार विनती करने पर भी सार्वजनिक नहीं करते इन्टरनेट आदि पर | और अहमदाबाद में 2000 लोगों की सभा में उन्होंने झूठ बोला कि जनता पार्टी के घोषणा पत्र में कभी भी राईट टू रिकॉल की मांग की ही नहीं गयी थी |
     ऊपर से आम-नागरिकों के लिए राईट टू रिकॉल की प्रक्रियाएँ जैसे राईट टू रिकॉल-जज, राईट टू रिकॉल-लोकपाल, राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री आदि का विरोध करते हैं ये कह कहकर कि ये संभव नहीं है लेकिन ये भी नहीं बताते कि राईट टू रिकॉल के कौन सी प्रक्रिया संभव नहीं है और झूठ बोल रहे हैं कि राईट टू रिकॉल की प्रक्रियाएँ अस्थिरता पैदा करेंगी | लेकिन साथ ही वे अमीरों के लिए राईट टू रिकॉल की प्रक्रियाओं जैसे राईट टू रिकॉल-घर का नौकर, राईट टू रिकॉल-कंपनी मैनेजेर का विरोध नहीं करते | हमारी प्रस्तावित राईट टू रिकॉल की प्रक्रियाएँ , जो हाजिरी वाली हैं बिलकुल संभव हैं और पोसिटिव रिकॉल वाली हैं जिससे उनके कारण अस्थिरता बिलकुल नहीं होगी , उल्टा स्थिरता बढ़ेगी | कृपया ये प्रस्तावित प्रक्रियाएँ
www.righttorecall.info/301.h.pdf चैप्टर 6 में देखें |

     सुब्रमनियम के कई कार्यकर्ताओं ने हमारे द्वारा प्रस्तावित राईट टू रिकॉल की प्रक्रिया को सुब्रमनियम को बताया और कई बार दिखाया कि ऐसी प्रक्रिया से अस्थिरता नहीं आएगी | इसके बावजूद सुब्रमनियम हर जगह ये झूठ बोलता है कि राईट टू रिकॉल के प्रक्रिया से अस्थिरता आएगी |
क्यों सुब्रमनियम स्वामी जनता पार्टी के 1977 के घोषणा पत्र के बारे में झूठ बोलता है ?
     यदि सुब्रमनियम ये मान लेता है कि 1977 का जनता पार्टी के घोषणा पत्र में राईट टू रिकॉल था , तो अवश्य ही वो राजनैतिक मुसीबत में आ जाएगा | उसके अपने कार्यकर्ता, जिमें बहुत सारे `राईट टू रिकॉल` के समर्थक हैं , पूछेंगे कि “ फिर आपने क्यों ये मुद्दा छोड़ दिया ? “और जयप्रकाश नरायण की इतनी जरूरी बात को ऐसे ही क्यों छोड़ दिय?

  3) ज्यादातर घोटाले जो सुब्रमनियम स्वामी दावा करते हैं खुलासा करने का, पहले से ही जनता को मालूम थे |

     उदहारण 2-जी घोटाले को लीजिए | ए.राजा ने मीडिया के सामने केवल कुछ ही घंटे दिए थे अर्जी और करोड़ों का चेक जमा करने के लिए , `पहले आओ पहले पाओ` योजना के शर्तों के तहत , 2-जी का लायसेंस पाने के लिए |

     जिनको पहले से ही जानकारी दी गयी थी ए.राजा द्वारा, वे पहले से ही चेक और दूसरे दस्तावेजों के साथ तैयार थे |

लिंक : http://www.ndtv.com/article/india/how-raja-misused-pms-letter-while-allocating-2g-licences-136810&cp  

     अभी तक केवल कुछ नेताओं को जांच के लिए जेल हुई है , लेकिन जेल में भी उन्हें पांच सितारा होटल जैसी सुविधाएं मिलती हैं और वे कुछ दिनों में छूट जाते हैं | इसीलिए, ऐसे कोर्ट के नाटकों से भ्रष्टाचार कभी भी कम नहीं होगा |

     भारत के आम-नागरिक जिन्हें इस देश की चिंता है, चुनाव यंत्र में धांधली , 2-जी घोटाला, राईट टू रिकॉल की प्रक्रियाओं आदि मुद्दे उठाते हैं लेकिन नाम के भूखे लोग जैसे सुब्रमनियम, अन्ना उन मुद्दों को चुरा लेते हैं बिकी हुई मीडिया और विदेशी कंपनियों प्रभावित कोर्ट द्वारा |

     मैं कुछ उदाहरण दूँगा ऐसे असली लोगों के , जिन्होंने ये मुद्दे उठाये लेकिन उनको सुब्रमनियम, अन्ना और दूसरे नाम-भ्रष्ट लोगों ने चुरा लिया और फिर मामले को कमजोर कर दिया – 2009 में हरिप्रसाद ने चुनाव यंत्र धांधली का खुलासा किया , 2-जी घोटाले का खुलासा अरुण अग्रवाल और बहुत सारे अन्य लोगों ने किया, सोनिया गाँधी का खुलासा पी.ए.संगमा ने 1999 में सबसे पहले किया था , राजीव गाँधी ने काले धन का मामला सबसे पहले उठाया था और कई लोग जैसे रामा गोपालन ने सेतुसमुद्रम मामला सबसे पहले दर्ज किया था |

लिंक –

सबसे पहले खुलासा किया 2 जी का-

अरुण अग्रवाल, `टेलीकोम वाच डाग` स्वयंसेवी संस्था और कई अन्य -

http://www.indianexpress.com/news/2g-scam-chronology-of-events/781614/0 

चुनावी यंत्र का सबसे पहले खुलासा किया -

http://www.indiaevm.org/ 

सबसे पहले सोनिया गाँधी का खुलासा किया और सोनिया के खिलाफ विद्रोह भी किया -

http://en.wikipedia.org/wiki/P._A._SangmaFirst 

सबसे पहले सेतुसमुद्रम का खुलासा किया -

रामा गोपालन -

http://lawandotherthings.blogspot.in/2008/05/sethusamudram-case-in-supreme-court.html 

4) अभी जनहित याचिका के फिक्सिंग या पूर्व-निर्धारण के बारे में बात करते हैं – कैसे कोर्ट के मामले चोरी करके बरबाद किये जाते हैं

      भ्रष्ट विदेशी कंपनियों के समूह या लॉबी ये सुनिश्चित करते हैं कि जज केवल उन्हीं व्यक्तियों की जनहित याचिका जज आने दें जिन्हें ये भ्रष्ट विदेशी कम्पनियाँ उनके द्वारा प्रायोजित , बिकी हुए मीडिया द्वारा श्रेय दिलवाना चाहते हैं | ये विदेशी कंपनियों के लॉबियां जजों से अपने काम निकालती हैं उनके रिश्तेदारों को अपने यहाँ नौकरी देकर और उन्हें साल के करोड़ों रुपये देकर या जजों का कोई और काम करवा कर | जनहित याचिका इस आधार पर स्वीकार नहीं की जाती कि उसमें क्या लिखा है लेकिन याचिका को कौन व्यक्ति दे रहा है, उसके आधार पर स्वीकार या अस्वीकार की जाती है |

    उदहारण , 2003 में राजीव दीक्षित जी ने एक जनहित याचिका डाली थी मौरिशियस मार्ग बंद करने और टैक्स की चोरी मौरिशियस मार्ग द्वारा रोकने के लिए | लेकिन सुप्रीम-कोर्ट ने उनकी जनहित याचिका को रद्द कर दिया और ये संविधान के खिलाफ फैसले ने इस टैक्स की चोरी के मार्ग को जारी रखा |
http://www.hindu.com/biz/2003/11/17/stories/2003111700010300.htm

     एक बार सुब्रमनियम कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज करता है, तो विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित जज दूसरी वैसे ही याचिका आने नहीं देते | और सुब्रमनियम उस मामले को कमजोर कर देता है और जज उस मामले को सालों तक लटका देते हैं |

     सुब्रमनियम स्वामी 2-जी मामले को इसीलिए चुरा सके क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उसे ऐसा करने दिया था | क्यों सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने उसे ऐसा करने दिया ? क्योंकि क्या यदि मामले को सबसे पहले दर्ज करने वाले व्यक्ति, अरुण जी ने ए.राजा का पब्लिक में नार्को करवाने की मांग की होती तो ? यदि सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने ए.राजा.की पब्लिक में नार्को जांच करवाने की मांग की स्वीकृति दे दी होती ,तो सोनिया गाँधी ,मनमोहन सिंह और बहुत सारे अन्य भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध सबूत मिल जाता | और यदि सुप्रीम-कोर्ट के जज ए.राजा का पब्लिक में नार्को जांच का विरोध करते , तो सुप्रीम-कोर्ट के जज की पोल खुल गयी होती |
     इसीलिए, विदेशी कंपनियों की लॉबी , जो मनमोहन सिंह को बचाना चाहती थी, ने सुप्रीम-कोर्ट के जज के साथ सेट्टिंग बनायीं ताकि मामला अरुण जी से सुब्रमनियम स्वामी के पास चला जाये |
 

5) अभी हम सुब्रमनियम और राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के प्यार और नफरत के बदलते रिश्ते के बारे में बात करते हैं 

     सुब्रमनियम कुछ साल पहले तक तो भा.ज.पा., संघ और विश्व हिंदू परिषद के बहुत खिलाफ थे | वे विश्व हिंदू परिषद को अयोध्या राम मंदिर को बनाने के लिए , राष्ट्रिय सुरक्षा अधिनियम के तहत प्रतिबन्ध भी करवाना चाहते थे | लेकिन अभी संघ और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष के नेताओं की सुब्रमनियम के साथ दोस्ती है |
लिंक-
सुब्रमनियम विश्व हिंदू परिषद पर बैन चाहता है (Jan 23,2001)-

http://hindu.com/2001/01/23/stories/02230009.htm

(हमारे विशेष संवादाता द्वारा) 

चेनई , जनुअरी 22.

 जनता पार्टी के अध्यक्ष डा.सुब्रमनियम स्वामी , ने आज राष्ट्रपति से गुहार लगई के वे केन्द्रीय मंत्रिमंडल को बोलें कि वो विश्व हिंदू परिषद पर बैन लगाये और राष्ट्रिय सुरक्षा अधिनियम के तहत उसके सभी पदाधिकारियों को कैद करे |  

 “विश्व हिंदू परिषद की सरकार से ये मांग कि वे मार्च 2002 तक अयोध्या में राम मंदिर को बनाने में जो भी रुकावटें हैं उन्हें दूर करने के लिए कदम उठाये, एक आतंकवादी कार्य था और क़ानून को अपने हाथों में लेने और संविदान को नीचा दिखाने और उसे बदनाम करने का एक प्रयत्न था “ सुब्रमनियम ने अपने बयान में कहा |

 सुब्रमनियम ने कांची के आचार्य की मध्यस्थ की आलोचना की (मार्च 7,2002)

http://www.hindu.com/thehindu/2002/03/07/stories/2002030706261100.htm

 विश्वहिंदू परिषद के नेताओं पर पोटा लगाओ (मार्च 8, 2002)

http://hindu.com/2002/03/08/stories/2002030802570400.htm

http://janataparty.org/pressdetail.asp?rowid=18

 सुब्रमनियम स्वामी ने कहा “ आर.एस.एस एक राष्ट्र-विरोधी संगठन है | जितनी जल्दी उसको तोड़ दिया जाये, उतना भारत के लिए अच्छा है | आज आर.एस.एस. और भा.जा.पा. पूरी तरह से अधिकार-हीन के बिना है, मैं उनको अधिक मूल्य नहीं देता |” 

http://www.rediff.com/news/1998/mar/17sswamy.htm

6) सुब्रमनियम स्वामी के स्वदेशी विरोधी कथन क्या थे, ये अब देखते हैं –

     सुब्रमनियम स्वामी ने कहा था कि “ यदि स्वदेशी से आपका मतलब है कि आप केवल वो ही प्रयोग करोगे जो भारत में बना है, तो ये बिलकुल ही अप्रचिलित सिद्धांत है | उतना ही अप्रचलित , जितना की मार्क्सवाद | ”

http://www.rediff.com/news/1998/mar/21swamy.htm  

     1999 में, सुब्रमनियम ने आयात शुल्क कम करने की मांग की थी, ताकि विदेशी कंपनियां आसानी से स्वदेशी , स्थानीय कंपनियों को समाप्त कर सकें |
उसने कहा था “ आयात शुल्क
30 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और ये ही डबलयू.टी.ओ. की भी शर्त है , जिसके विरुद्ध हम लड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं |”
इसका लिंक विवरण में देखें |

http://www.rediff.com/news/1999/dec/29us.htm

     इसीलिए कृपया अपना मन बनाएँ कि आप राजीव दीक्षित जी का समर्थन करते हैं या सुब्रमनियम स्वामी का , क्योंकि सभी मुद्दों पर , ये एक दूसरे के विरुद्ध हैं |
सुब्रमनियम सोनिया गाँधी के खिलाफ इसीलिए बोल रहा है ताकि उसे आपके दिल में जगह प्राप्त हो जाये और वो आपको गुमराह कर सके , और यही कारण है कि विदेशी-कंपनियों द्वारा  मीडिया उसे बढ़ावा दे रहा है | कृपया जागिये, और ये सत्य जानिये कि ये व्यक्ति केवल एक विदेशी-कंपनियों का और ईसाई धर्म-प्रचारकों का एजेंट है |

7) अब सुब्रमनियम स्वामी और सोनिया गाँधी की बात करते हैं |

7.1 सुब्रमनियम ने सोनिया गाँधी को लक्ष्मी कहा था, उसे प्रधानमंत्री बनाने के लिए –
(http://www.rediff.com/news/1999/apr/17swamy.htm  )

     अप्रैल 1999 में सुब्रमनियम ने एक मशहूर चाय पार्टी रखी थी दिल्ली के एक होटल में, जिसमें उसने सोनिया और जयललिता दोनों को बुलाया था | इस मीटिंग के कारण जयललिता ने वाजपाई की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिए, और वाजपयी की सरकार अप्रैल 1999 में गिर गयी |

लिंक-

(http://www.outlookindia.com/article.aspx?207350  

http://www.tehelka.com/story_main51.asp?filename=Ne311211Coverstory.asp 

http://www.rediff.com/news/2002/apr/04inter.htm 

http://m.firstpost.com/politics/the-storysubramanian-swamy-a-political-mystery-168178.html)

     यदि सुबमनियम अटल बिहारी वाजपयी को हटा कर , कोई कम बुरा व्यक्ति जैसे अडवाणी या नरेंद्र मोदी या नितीश को लाने की कोशिश करता, तो मैं समझ सकता था | लेकिन ये सुब्रमनियम किस तरह का व्यक्ति है जिसने वाजपयी को हटा कर उसकी जगह एक महा-भ्रष्ट विदेशी-कंपनी एजेंट सोनिया गाँधी को लाने का प्रयत्न किया था ?  

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7.2 सोनिया गाँधी का झूठा एफिडेविट का मामला    

     सोनिया ने चुनाव आयोग को अपनी डिग्री का एक झूठा एफिडेविट दिया था , जिसके विरोध में सुब्रमनियम ने 2004 में हाई कोर्ट में मामला दर्ज किया था | इससे जजों को अन्य लोगों का इसी विषय पर जन हित याचिका ना लेना का बहाना मिल गया क्योंकि जज आम तौर पर मिलते जुलते विषय के जन-हित याचिका को या तो लेते नहीं हैं या तो एक साथ इकठ्ठा कर देते हैं | सुब्रमनियम ने अपने जनहित याचिका में स्पष्ट किया था कि सोनिया के खिलाफ उनकी शिकायत केवल सोनिया पर जुर्माना डालने के लिए थी , ना कि सोनिया के चुनाव को रद्द करने के लिए  |

लिंक-
http://news.outlookindia.com/printitem.aspx?474299    
          सोनिया गाँधी ने इसे गलती बताया था और माफ़ी मांगी थी और जज ने मामले को बिना कोई सज़ा दिए मामले को बंद करने के आदेश दिए थे | झूठी एफिडेविट दर्ज करने के लिए 6 महीनों की सज़ा हो सकती है और 6 सालों के लिए व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध हो सकता है | लेकिन कांग्रेस के नेता तो खुले आम बोलते हैं आम-नागरिकों को कि ` सोनिया ने झूठी एफिडेविट दी है | जज हमारी जेब में हैं | तुमको जो उखाड़ना है उखाड़ लो |`
      सुब्रमनियम ने ना तो सोनिया को जेल में डालने की मांग की थी ना तो उस जज पर महाभियोग (संसद में करवाई) चलाने की मांग की थी | यदि कोई जज गलत फैसला करता है, तो कोई भी आम-नागरिक के पास अधिकार है और उसका कर्तव्य है कि अपने सांसद को कहे कि उस दोषी जज पर सांसद में करवाई (महाभियोग) करने की मांग कर सकता है | सुप्रीम-कोर्ट के भ्रष्टाचार के कारण देश को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है लेकिन सुब्रमनियम तो सुप्रीम-कोर्ट के जजों को ईमानदार बता कर कार्यकर्ताओं को गुमराह कर रहे हैं | सुप्रीम-कोर्ट के जज मंत्रियों से ज्यादा भ्रष्ट हैं , यहाँ तक कि वकील शांतिभूषण ने एफिडेविट फाइल की थी कि पिछले आधे सुप्रीम-कोर्ट के जज बेईमान थे |

       आपको किसी भी व्यक्ति की जांच उसके भाषणों से नहीं, उसके कार्यों से करनी चाहिए | सुब्रमनियम के सारे काम तो कांग्रेस को फायदा पहुंचाते हैं |

2 जी के मामले से कांग्रेस को फायदा हुआ था क्योंकि दूरसंचार मंत्री का पद द्रमुक से छीन कर कांग्रेस को मिल गया |

        सुब्रमनियम स्वामी कहते हैं कि जज बालकृष्णन बेईमान थे | लेकिन साथ ही वे कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज ईमानदार हैं हालाँकि हमको इस कोर्ट ड्रामा में कोई विश्वास नहीं है, जिसमें जनहित-याचिका पहले से ही निश्चित परिणाम वाला (फिक्सिंग वाला)  होती है | मैं जनहित-याचिका को एकदम बेकार मानता हूँ क्योंकि मैं मानता हूँ कि जज मंत्रियों से ज्यादा बेईमान होते हैं | इसीलये मैं केवल जन आन्दोलन में विश्वास करता हूँ जैसे राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री , राईट टू रिकॉल-जज, राईट टू रिकॉल-सांसद आदि., पर जन आन्दोलन |
     इसीलिए , यदि सुब्रमनियम सोनिया गाँधी के खिलाफ सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज के पास मामला दर्ज करते हैं, और यदि जज सचमुच ईमानदार है, तो
सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज सोनिया को तुरंत जेल में डाल देगा | कोई भी जांच की जरुरत नहीं होगी क्योंकि सोनिया ने स्वयं अपना अपराध स्वीकार किया है सुप्रीम-कोर्ट में | 

     इसीलिए सुब्रमनियम स्वामी और अन्य नेताओं या बुद्धिजीवियों के प्रशंसको से विनती करें कि सुब्रमनियम और अन्य नेताओं को खुले-आम बोलें कि वे 15 दिनों के अंदर जज से मांग करें कि सोनिया गाँधी को झूठी एफिडेविट देने के लिए 6 महीनों के लिए तुरंत जेल में डालें |

इससे देश को इस प्रकार लाभ होगा –

1. यदि सुब्रमनियम और अन्य नेताओं के प्रशंसक अपने प्रिय नेता को ऐसा कहने के लिए मना कर देते हैं, तो ये साफ़ हो जायेगा कि सुब्रमनियम और अन्य नेताओं के प्रशंसक अपने नेताओं के नाम के बारे में ज्यादा सोचते हैं, ना कि देश के बारे में |

2. यदि सुब्रमनियम और अन्य नेताओं के प्रशंसक अपने प्रिय नेता को सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज के पास सोनिया गाँधी को तुरंत जेल में डालने के लिए अर्जी डालने के लिए कहने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो या तो सुब्रमनियम और अन्य नेता मानेंगे या तो नहीं मानेंगे | यदि सुब्रमनियम या कोई अन्य प्रिय नेता मना कर देते हैं, तो कमसे कम प्रशंसकों को ये तो पता चल जायेगा कि उनके प्रिय नेताओं का उद्देश्य सोनिया गाँधी को नुकसान पहुँचाना नहीं है बल्कि सोनिया गाँधी को बचाना है |
3. यदि सुब्रमनियम या आपका प्रिय नेता सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज को कहते हैं सोनिया गाँधी को तुरन्त जेल में डालने के लिए और जज सोनिया गाँधी को जेल में नहीं डालता, तो हमें पता चल जायेगा कि सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज कितना ईमानदार है |
4. और यदि सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज सोनिया गाँधी को झूठी एफिडेविट देने के लिए तुरंत जेल में डाल देता है, तो फिर इसका सारा श्रेय सुब्रमण्यम या आपके प्रिय नेता और सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज को जायेगा और देश का भला हो जायेगा | 

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     इसीलिए कृपया भारत माँ पर कृपा करें | कृपया सुब्रमनियम और अन्य प्रिय नेताओं से कहें कि 15 दिनों के अंदर अपनी अर्जी दें सोनिया गाँधी को जेल में डालने के लिए सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज के पास और सोनिया को तुरंत जेल में डालने की मांग करें और जो भी जवाब या ख़ामोशी आये उन्हें सार्वजनिक करें इन्टरनेट आदि द्वारा |

7.3  कैसे आम-नागरिकों ने 2004 में सोनिया गाँधी को भारत का प्रधान मंत्री बनने से रोका था

    बिकी हुई मीडिया ने (और सुब्रमनियम स्वामी ने) कहा है कि सुब्रमनियम स्वामी को श्रेय जाता है कि सोनिया गाँधी 2004 में प्रधानमंत्री नहीं बन सकी , लेकिन असलियत ये है कि आम-नागरिकों ने सोनिया गाँधी को भारत का प्रधानमंत्री बनने से रोका था   |

     सुब्रमनियम कहते हैं कि उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम को सोनिया के अवैद्य भारतीय नागरिकता के बारे में बताया था और फिर कलाम ने ये बात सोनिया को बताई थी , इसीलिए सोनिया ने प्रधानमंत्री बनने का अपना इरादा बदल दिया और मनमोहन को प्रधानमंत्री बना दिया |

      यदि सुब्रमनियम सोनिया के अवैद्य भारतीय नागरिकता के बारे में जानता था, तो उसने सुप्रीम कोर्ट से सोनिया का चुनाव रद्द करने की मांग क्यों नहीं की (विदेशी मूल का व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता)

      और कलाम 2004 से ही कह रहे हैं कि उन्होंने सोनिया के साथ कभी भी नागरिकता के बारे में नहीं बात की थी | ऐसा उन्होंने दो प्रेस सूचनाओं में, कई इंटरवियू में कहा था | ये प्रेस सूचनाएं कई बड़े समाचार पत्र जैसे हिंदू , टाईम्स ऑफ इंडिया, आदि में छापी गयी थी | उनके सचिव ने भी उसके रिटायर होने के बाद अपनी पुस्तक `दी कलाम इफेक्ट` में इस बात की पुष्टि की थी | 
 लिंक -
    

"नागरिकता का मुद्दा की चर्चा श्रीमती सोनिया गाँधी के साथ नहीं हुई 

19-05-2004 : राष्ट्रपति भवन , नई दिल्ली

 प्रेस सूचना (विज्ञप्ति) 
ये कुछेक प्रेस में सूचित किया गया है कि राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलम ने नागरिकता के मुद्दे को श्रीमती सोनिया गाँधी के साथ चर्चा हुई थी जब सोनिया गाँधी राष्ट्रपति के साथ कल राष्ट्रपति भवन में मिले थी | ये तथ्यों के विपरीत है | ये विषय/मुद्दा चर्चाओं में बिलकुल भी नहीं आया था |”
राष्ट्रपति की वेबसाइट पर
2004 की प्रेस सूचना उपलब्ध नहीं है क्योंकि 2007 के राष्ट्रपति के चुनाव के बाद उनको हटा दिया गया था | लेकिन किसी को भी राष्टपति के सचिव से हार्ड कापी मिल सकती है | 

इसका विकल्प लिंक प्रेस सूचना ब्यूरो(विभाग) का लिंक, मूल लिंक जितना ही विश्वसनीय है -
http://pib.nic.in/newsite/erelease.aspx?relid=1730  

http://www.facebook.com/notes/right-to-recall-against-corruption/0191-kalam-exposes-lies-of-subramaniam-swamy-in-his-book-in-his-own-words/460282627324077

      लेकिन सुब्रमनियम के अंध-भक्त कहते हैं कि सभी लोग – कलाम, कलाम के सचिव, कम्युनिस्ट पार्टी, भारत का प्रेस सूच ब्यूरो, हिंदू समाचार पत्र सभी झूठ बोल रहे हैं और केवल सुब्रमनियम ही सच बोल रहे हैं |
       मैं सभी सुब्रमनियम के अंध-भक्तों से विनती करूँगा कि विशेषज्ञ सुब्रमनियम से कहें कि इसका प्रमाण दें कि कलाम ने सोनिया के साथ उसके नागरिकता के बारे में बात की थी , क्योंकि बिना प्रमाण के हम ये नहीं तय कर सकते कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ | यदि कोई ये सिद्ध कर देगा कि ये सभी लोग – हिंदू समाचार पत्र, कलम, कलम के सचिव सभी सालों से झूठ बोलते आ रहे हैं और केवल सुब्रमनियम ही सच बोल रहे हैं , तो मैं इसे स्वीकार कर लूँगा |  

       राष्ट्रपति कलाम ने ये भी कहा था कि यदि सोनिया भारत की वैद्य नागरिक हैं कि नहीं, ये फैसला करना अदालत का अधिकार है , राष्ट्रपति का नहीं | राष्ट्रपति के पास किसी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कोई सत्ता नहीं है | यदि कलाम सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोकते तो सोनिया सुप्रीम-कोर्ट जा सकती थी और भ्रष्ट सुप्रीम-कोर्ट जज सोनिया गाँधी के पक्ष में फैसला दे देते | और ना ही सुब्रमनियम ने कोई सबूत दिया कि कलाम ने सोनिया के साथ नागरिकता का मुद्दा उठाया था |

सुब्रमनियम स्वामी सोनिया की भारतीय नागरिकता के वैद्यता के बारे में झूठ बोल रहा है | यदि सोनिया भारत की वैद्य नागरिक नहीं है, तो क्यों सुब्रमनियम ने कोर्ट में कोई अर्जी नहीं दी सोनिया के संसाद के दर्जे को रद्द करने के लिए ? (जो भारत के वैद्य नागरिक नहीं हैं, वे सांसद नहीं बन सकते)
      पहले ही
2001 में, एक मामला दर्ज किया गया था, हरी शंकर जैन बनाम सोनिया गाँधी के खिलाफ कोर्ट में, सोनिया की नागरिकता और उसके सांसद पद की वैद्यता पर आपत्ति जताते हुए | लेकिन सुप्रीम-कोर्ट ने मामला सुनने के बाद कहा कि ये मामला `साफ़ तौर पर बिना किसी आधार के और अस्पष्ट` है और सोनिया भारत की एक वैद्य नागरिक है |   

       जैसे हम सब जानते हैं कि सोनिया राष्ट्रपति से लगबग शाम के 5 बजे मिली लेकिन कलाम ने उससे केवल सांसदों का समर्थन ही देने के लिए कहा था , क्योंकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी | सोनिया ने कहा था कि वो राष्ट्रपति को सांसदों के समर्थन के पत्र रात 8 बजे देंगी | लेकिन उस रात सोनिया कलाम से नहीं मिली और अगले दिन उसने मनमोहन को प्रधानमंत्री घोषित किया और ये नाटक किया कि उसने पद का त्याग किया था |

       फिर क्यों उसको प्रधानमत्री बनने के लिए अपना मन बदलना पड़ा जब कलाम ने कभी भी नागरिकता का मुद्दा सोनिया के साथ चर्चा ही नहीं की थी ? क्योंकि लाखों कार्यकर्ता और करोड़ों आम-नागरिक उसका विरोध कर रहे थे और उनमें से बहुत सारे सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे और दिल्ली कूच कर रहे थे | ऐसी सूचनाएं हैं कि बहुत से लोगों ने छुट्टी ले ली थी और दिल्ली के लिए टिकेट भी ले लिया था |

       मैने अपने समय में बड़े स्तर पर बहुत से विरोध देखे थे और सुने थे | आप जांच करने के लिए कोई भी राजनीति में थोड़ी भी रूचि रखने वाले बुजुर्ग से पूछ सकते हैं कि उस समय लोग सोनिया के खिलाफ थे कि नहीं |
       विदेशी कंपनियों के समूहों ने मीडिया का प्रयोग किया था सोनिया को देसी-बहु के जैसे पेश करने के लिए  , क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे जो उनके प्रति ईमानदार हो, देश के प्रति नहीं |
      ये आन्दोलन धीमा था लेकिन पूरे भारत में उभर रहा था | विदेशी कंपनियों के समूहों ने ये भांप लिया कि सोनिया के विदेशी मूल के खिलाफ बहुत विरोध है | इसिलए विदेशी कंपनियों के समूहों ने सोनिया गाँधी से कहा कि मनमोहन सिंह का नाम प्रस्ताव करे ,जो उनके प्रति उतना ही वफादार था | और जिस समय सोनिया गाँधी ने ये घोषित किया कि वो प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती और उसके बदले मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनेंगे, तो सोनिया गाँधी के खिलाफ आन्दोलन बिखर गया |

       इससे ये सिद्ध होता है कि यदि करोड़ों आम-नागरिक एक ही चीज की मांग करते हैं, तो वे नेताओं या तानाशाओं  को भी मजबूर कर सकते हैं, उनकी मांग पूरी करने के लिए | इसी तरह हमें आजादी मिली थी , जब करोड़ों आम-नागरिक और लाखों सैनिकों ने आजादी की मांग की थी और अंग्रजों को भारत से भागना पड़ा था |

       इसी तरह , यदि लाखों कार्यकर्ता और करोड़ों आम-नागरिक राईट टू रिकॉल, पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली, जूरी सिस्टम , सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी, और अन्य जन-हित के क़ानून-ड्राफ्ट की मांग करते हैं, तो नेताओं और प्रधानमंत्री को मजबूर होना पड़ेगा उसे भारतीय राजपत्र में डालने के लिए |

 

7.4 अभी बात करते हैं कि कैसे कोई व्यक्ति जनता के आँखों में हीरो बन सकता है अपने बुरे, प्रभावशाली दोस्त पर आरोप लगाकर

मान लीजिए, मुझे अपने कोलेज में एक `हीरो` बनना है | छात्रों में नाम पाने के लिए, मुझे ये दिखाना होगा कि मैं एक अच्छा व्यक्ति हूँ | उसके लिए, मैं अपने बुरे मित्र, जो एक बड़ा व्यक्ति है जैसे कोलेज प्रबंधन ट्रस्टी का बेटा, उसके साथ सैटिंग बनाना होगा | फिर हम, इस तरह की योजना बना सकते हैं -
योजना:

मैं अपने बुरे मित्र पर कोई गैर-कानोनी कार्य जैसे रैगिंग आदि का आरोप लगता हूँ |
मैं कोई भी कोर्ट द्वारा माने जाने वाले सबूत नहीं देता, जो आरोपों को सिद्ध कर सके |

तो मेरा मित्र सुरक्षित रहेगा....कालेज प्रभंधन मेरे इस बुरे दोस्त को कोई सजा नहीं दे सकेगा क्योंकि कोई भी सबूत नहीं होंगे | 

नतीजा क्या होगा ?
1) मैंने कुछ बातें कहीं, जो छात्रों को पहले से पता थी , लेकिन मैंने उसे जोर से कहा |
2) छात्रों मुझे हीरो मानेंगे...और मझे कोलेज के चुनावों में वोट देंगे |
3) परदे के पीछे, मैं अपने बुरे दोस्त के साथ यारी रखूँगा और उसकी मदद भी करूँगा |
4) यदि कोई और व्यक्ति मेरे दोस्त का विरोध करने का प्रयास करता है...मैं उसको मजबूर कर दूँगा मेरे साथ जुड़ने के लिए, क्योंकि मैं पहले से ही हीरो हूँ या...मेरा दोस्त उसकी पिटाई करके रास्ते से हटा सकता है ताकि छात्रों का सारा ध्यान मेरे पर ही केंद्रित रहे | 

क्या ये संभव है ? समझदार को इशारा ही काफी है !!!

राजनीति में भी ये संभव है यदि बुरे दोस्त्त के स्थान पर भ्रष्ट कम्पनी-मालिक और भ्रष्ट नेता हों तो | और कोलेज प्रबंधन के स्थान पर देसी-विदेशी कंपनी प्रायोजित बिकी हुई मीडिया होगी | कालेज के बदले संसद होगा और छात्रों के स्थान पर मतदाता और आम जनता होगी

कृपया नोट करें कि सभी लोगों की बुरे, प्रभावशाली लोगों के साथ परदे के पीछे मित्रता नहीं होती,  इसीलिए ऐसा नाटक सभी नहीं कर सकते | केवल वे ही लोग, जिनकी बुरे, प्रभावशाली लोग जैसे भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट उद्योगपति आदि के साथ सैटिंग है ; वे ही अपने ही बुरे दोस्तों पर ऐसे बिना किसी कोर्ट में माने जाने वाले सबूत के आरोप लगाने में सक्षम हैं | वे जनता के आँखों में हीरो बन जाते हैं और इन सैटिंग वाले लोगों को कोई भी हानि भी नहीं होती है |

इसलिए, हमें नेताओं/बुद्धिजीवियों की जांच उनके भाषणों से नहीं, प्रक्रिया-ड्राफ्ट से करनी चाहिए जो वे अपने वेबसाइट या घोषणा-पत्र में डालते हैं | एक तरीका अपराधी व्यक्ति के दोस्त की पोल खोलने का है कि उसके सामने ऐसे अच्छी प्रक्रिया-ड्राफ्ट रखी जायें, जो अपराधी को शारीरिक और आर्थिक रूप से हानि पहुंचाए |

 

8) अभी हम सुब्रमनियम और 2 जी मामले के बारे में बात करते हैं |

2 जी मामले की याचिका सबसे पहले अरुण अग्रवाल और `टेलीकोम वाचडाग` नामक स्वयं सेवी संस्था ने डाली थी |

     बाद में सुब्रमनियम स्वामी ने 2 जी मामले में वकील बनने की अर्जी दी थी और उनको वकील बना दिया गया | क्योंकि सुब्रमनियम जनता के नाम से ये मुकद्दमा लड़ रहे हैं, इसीलिए वो जनता के प्रति जवाबदार है | जनता उससे सवाल कर सकती है क्योंकि सुब्रमनियम कोर्ट का प्रयोग कर रहे हैं और कोर्ट के लिए आवंटित राशि का प्रयोग कर रहे हैं 

     सुब्रमनियम ने ए.राजा और चिदंबरम पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था लेकिन रिश्वत लेने के लिए एक भी प्रमाण कोर्ट में नहीं दिया , इसीलिए राजा और चिदंबरम छूट गए | और ऊपर से जब बहुत से कार्यकर्ताओं ने सुब्रमनियम से सोनिया और अन्य भ्रष्ट मंत्रियों पर पब्लिक में नार्को करवाने के लिए जज से मांग करने की सुब्रमनियम से विनती की , तो उस ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया |

      बिना नार्को जांच के , ये सिद्ध करना कि ए.राजा और चिदंबरम ने जो गलत काम किया वो बेईमान उद्देश्य से किया , संभव नहीं है क्योंकि उन्होंने रिश्वत लेने का कोई सबूत नहीं छोड़ा और शायद अपनी ली गयी रिश्वत कोई विदेशी गुप्त खाते में जमा की | विदेशी गुप्त खाते के बैंक का डायरेक्टर कभी भी ये गवाही नहीं देगा कि ए.राजा का उसके बैंक में गुप्त खता है क्योंकि उन बैंकों की पालिसी/ नीति  नहीं है कि गुप्त खातों का खुलासा किया जाये |
फिर भी , मीडिया के सामने , सुब्रमनियम स्वामी ये दावा करते हैं कि वे भ्रष्टाचार को सामने लायेंगे और कम करेंगे, कोर्ट में मामले दर्ज करके |

        2 जी मामले में सुब्रमनियम ने सोनिया गाँधी की मदद की द्रमुक नेताओं को जेल करवा कर क्योंकि इससे द्रमुक की सौदा करने की शक्ति कमजोर हुई और कांग्रेस शक्ति-शाली हो गयी और इसीलिए टेलीफोन मंत्रालय कांगेस को मिल गया | सोनिया को केवल फायदा हुआ क्योंकि जो रिश्वत का पैसा द्रमुक को जाता था , वो अब सोनिया गाँधी और कांग्रेस के सांसदों को जा रहा है | सुब्रमनियम स्वामी राईट टू रिकॉल के सभी प्रक्रियाओं का विरोध करते हैं ताकि सभी पार्टियों के सभी भ्रष्ट सांसद सुरक्षित रहें | यदि राष्ट्रिय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के ऊपर राईट टू रिकॉल (बदलने का अधिकार) आ जाता है, तो सोनिया आम-नागरिकों द्वारा तुरंत निकाली जायेगी |

     सुब्रमनियम अमीरों और उच्च वर्ग के लिए ही राईट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं | आज कोई भी उच्च वर्ग का व्यक्ति , किसी भी दिन अपने घर के नौकर और ऑफिस के नौकरों को बदल सकता है , मतलब उनके पास घर के नौकर और ऑफिस के कार्यकर्ताओं के ऊपर राईट टू रिकॉल है लेकिन सुब्रमनियम आम-नागरिकों के लिए राईट टू रिकॉल, यानी प्रधान मंत्री, मंत्रियों, राष्ट्रिय सलाहकार परिषद अध्यक्ष आदि पर राईट टू रिकॉल का विरोधी है | उसके सभी कार्य आम-नागरिक विरोधी हैं |

यहाँ तक कि चिदंबरम, जो भविष्य में कांग्रेस का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बन सकता है, को हटाने का प्रयत्न से भी सोनिया और उसके बेटे के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना बढ़ा देता है

       स्वामी ने 122 स्पैक्ट्रम के लायसेंस को रद्द करनी की मांग की थी क्योंकि उसमें कोई बोली नहीं लगायी गयी थी | देखिये, स्पैक्ट्रम की बोली तो 2003 में भी नहीं लगायी गयी थी | 2003 में भी वो `पहले आओ , पहले पाओ` के नियम के अनुससार लायसेंस दिए गए थे | और हजारों प्लॉट जो सरकार देती है सभी बिना बोली लगाये दिए जाते हैं | उदहारण, नरेंद्र मोदी ने 900 एकड़ का प्लॉट टाटा-नेनो के लिए , कहा जाता है, 500 करोड के लिए 2009 दिया था और वो भी बिना बोली का था | क्या हमें वो सब स्पैक्ट्रम और वो सभी प्लॉट जो बोली के बिना दिए थे जब्त कर लेना चाहिए ?
       यदि मंत्री भ्रष्ट है, तो हमें मंत्री को जेल में डालना चाहिए | और हमें उस व्यक्ति को भी जेल की सज़ा देनी चाहिए जिन्होंने रिश्वतें दी हैं , जैसे रिश्वत देने वाले कंपनियों के मालिक आदि | और हम को रिश्वत का पैसा वापस लाना चाहिए | लेकिन ये सब सुब्रमनियम के लिए “बाद में “ आता है ---- सुब्रमनियम तो पहले यूनिनोर के लायसेंस रद्द करवाना चाहता है !!
     तो फायदा किसको हुआ ? फायदा तो वोडाफोन, आदि अमेरिकी और अंग्रेजों की कंपनियों को हुआ | ये तो साफ़ दिखता है कि वोडाफोन का लायसेंस रद्द करवाने में अपना स्वार्थ है |

     और नुकसान किसको हुआ ? नुकसान देश के आम-आदमी को हुआ | 2007 से वोडाफोन आदि ने फोन करनी की कीमतें ऊंची रखीं हैं | कीमतें यूनिनोर , सियेस्ता आदि के कारण ही गिरीं आपसी मुकाबला बढ़ने के कारण | आम आदमी को जो ये कीमतें गिरने से फायदा मिला था , वो अब नहीं मिलेगा |
     बंधुओं जागिये, ये व्यक्ति दावा करता है कि वो सोनिया के खिलाफ है , लेकिन उसके सारे कार्य तो सोनिया और विदेशी कंपनियों की मदद करते हैं | सुब्रमनियम स्वामी भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं हैं – वो केवल विदेशी कंपनी समूह जैसे वोडाफोन आदि., की मदद कर रहा है | और वो खुले आम भ्रष्ट लोग जैसे जज कपाड़िया, मनमोहन सिंह आदि की मदद कर रहा है | ये हर एक नागरिक का कर्तव्य है कि वो उन लोगों की पोल खोले जो नकली , यूरिया वाले दूध को असली दूध बता कर बेचे |
     सोनिया को नुकसान पहुँचाने का सबसे अच्छा तरीका सुब्रमनियम स्वामी की पूजा करना और उसकी आरती उतरना नहीं है बल्कि राईट टू रिकॉल प्रधान मंत्री के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रचार करना है |

     मेरा एक प्रस्ताव है कि हमें सुप्रीम कोर्ट प्रधान जज को कहने चाहिए कि वो हसन अली, राजा और अन्य भ्रष्ट लोगों, जिनके खिलाफ प्रथम दृष्टि में प्रमाण हैं, का खुले आम यानी पब्लिक में नार्को जांच (सच उगलने की दवाई देकर जांच) करना चाहिए | कृपया ध्यान दें कि संविधान या कोई अन्य क़ानून नार्को जांच पर प्रतिबन्ध नहीं लगाता | कुछ भ्रष्ट सुप्रीम-कोर्ट के जज काला बाजारी करने वाले , आतंकवादी , आर्थिक (धन सम्बन्धी) अपराधी और अन्य अपराधी को बचाना चाहते हैं |
     और इसीलिए इन भ्रष्ट सुप्रीम-कोर्ट के जजों ने
2010 में ये फैसला दिया कि नार्को जांच केवल तभी किया जा सकेगा यदि आरोपी अपनी सहमति दे !! जरा सोचें, कौन सा राजा या शौरी या हसन अली जैसा बड़ा अपराधी ये मानेगा कि उसका नार्को टेस्ट किया जाए | कुल मिला के, सुप्रीम कोर्ट जजों ने बड़े अपराधियों का साथ दिया, और वो भी मानवाधिकार के नाम पर – भले ही भारत के नागरिकों का बेडा गर्क हो जाये |

शुक्र है कि ये फैसला कसब के नार्को टेस्ट हो जाने के बाद आया था | अगर ये निर्णय पहले आता तो कसब से भी पूछना पड़ता- `कसब जी, क्या आप पर नार्को जांच कर सकते हैं ?` कसब नार्को जांच के लिए मना कर देता और बच निकलता | क्या इसे ही "न्याय"  कहते हैं

    सुप्रीम कोर्ट के जज हास्यास्पद होते हैं लेकिन आज कल वो मुझे रुला देते हैं | उनके निर्णयों और अनिर्णयों पर गौर करें | पुलिसकर्मियों ने जून-5-2011 को 25,000 सोते हुए अनशन करने वालों को पीता और उनका पंडाल जला दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट जजों ने इस बुरे काम के लिए एक भी पुलिस अधिकारी को नौकरी से नहीं निकाला |

     हम अनगिनत पुलिस अत्याचारों के मामले सुनते रहते हैं और ये भी पाते हैं की जज उन मामलों पर दशकों तक सोते रहते हैं | फिर नार्को टेस्ट में क्या रखा है ?  इसमें व्यक्ति को पीटा या प्रताड़ित नहीं किया जाता है | केवल 5 मिली लीटर सोडियम पेंथानोल, जो की गैर विषैला पदार्थ है, का व्यक्ति को  चिकित्सक के देखरेख में इंजेक्शन दिया जाता है और इसके बाद 2-3 घंटों तक पूछ-ताछ की जाती है |

     ये पदार्थ हररोज, हर ऑपरेशन में उपयोग किया जाता है और वो भी अधिक मात्र में | इसीलिए नारीको-जांच पूरी तरह से सुरक्षित है | तो जज पुलिस  हिरासत में हुए मौतों पर तो सोते रहते हैं, लेकिन नार्को टेस्ट को, आतंकवादियों और बड़े अपराधियों पर करने को भी, "मानवाधिकार" के विरुद्ध मानते हैं !!!  या तो ये जज पूरी तरह से मुर्ख हैं या वे अपराधियों के दलाल हैं और उनको बचाने के लिए तुले हुए हैं  |  मेरे विचार में वो मुर्ख तो नहीं हो सकते !  

     लेकिन जैसा कि सुब्रमनियम स्वामी ने कहा – आज का सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज अत्यंत ही ईमानदार सुप्रीम-कोर्ट का प्रधान जज है |  उसके पास इस फैसले को , बिना कोई रोक-टोक के रद्द करने का अधिकार है और फिर वे हसन अली, राजा जैसों पर नार्को टेस्ट करने का आदेश दे सकते हैं |  एक और बात,  हम ये नार्को टेस्ट सबूत के तौर पर उपयोग करने के लिए नहीं मांग कर रहे हैं | लेकिन नारको जांच एक बहुत ही वैज्ञानिक तरीका है, जो पूरी दुनिया में कहीं भी बैन नहीं है |  नार्को जाँच के द्वारा ऐसे सुराग मिल सकते हैं जो आगे की जांच कार्यवाही में मदद कर सकते हैं |  ऐसा करने से महत्वपूर्ण सबूत हाथ आ सकते हैं जो आरोपी और उसके गिरोह द्वारा लिए गए रिश्वत के पैसे वापस लाने में मदद कर सकते हैं |

सभी कार्यकर्ताओं को अपने नेताओं को पब्लिक में ए.राजा, सोनिया आदि का नार्को की मांग करने के लिए विनती -

     नार्को जांच पूरी दुनिया में किया जाता है ; 2010 में एक भ्रष्ट जज, बालाकृष्णन ने नार्को-जांच पर बैन नहीं लगाया था, लेकिन ये कहा था कि आरोपी की स्वीकृति लेनी होगी नार्को-जांच करवाने के लिए | उस जज को सुब्रमनियम ने भी भ्रष्ट कहा है |

http://www.financialexpress.com/news/no-narco-test-without-consent-supreme-court/615551/

अभी हाल ही में, मध्य प्रधेश हाई-कोर्ट के एक ईमानदार जज ने नार्को-जांच की स्वीकृति दी थी और वो भी बिना आरोपी से स्वीकृति लिए हुए |  
http://www.dailypioneer.com/state-editions/bhopal/62043-hc-permits-narco-test-of-3-forest-staffers.html

नार्को की रिपोर्ट सबूत के तौर पर नहीं लिया जाता, लेकिन नार्को-जाँच से मिली जानकारी से आगे कार्यवाही करके साबुत इकठ्ठा किया जा सकता है | इसीलिए नार्को-जांच असंवैधानिक नहीं है |

ये बहुत ही सुरक्षित और वैज्ञानिक है , और पूरी दुनिया में पसंद किया जाता है |
इसीलिए सभी कार्यकर्ता कृपया सुब्रमनियम के भक्तों से बोलें कि सुब्रमनियम से सार्वजानिक पूछें कि वो क्यों
सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज से ए.राजा आदि पर नार्को की मांग करने से मना कर रहा है |

इसीलिए कृपया भारत माँ पर कृपा करें | कृपया सुब्रमनियम और अन्य प्रिय नेताओं के भक्तों से कहें कि सुप्रीम-कोर्ट प्रधान जज को 15 दिनों के अंदर अपनी अर्जी दें कि ए.राजा. और दूसरे आरोपी पर नार्को-जांच करवाई जाये 30 दिनों के अंदर और जो भी जवाब या ख़ामोशी आये उन्हें सार्वजनिक करें |

पत्र का एक नमूना इस लिंक में दिया गया है -

http://www.facebook.com/note.php?saved&&note_id=374724985879842&id=168540969831579

 9) सुब्रमनियम और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई)

     सुब्रमनियम ने परचून/खुदरा में एफ.डी.आई और वर्ल्ड ट्रेड ओर्गानाईसेशन के समझौते को जोर-शोर से समर्थन किया था जब वे चंद्रशेखर के सरकार में व्यापार और क़ानून मंत्री थे
उसने स्वदेशी लोगों को जाली और झूठा कहा था |

http://www.rediff.com/money/2005/feb/24swamy.htm

उस समय सुब्रमनियम स्वामी कानून-मंत्री और वाणिज्य मंत्री थे चंद्रशेखर की सरकार में |

     आजकल , सुब्रमनियम ने अपने एफ.डी.आई के बयानों पर पलटी मारी है और एफ.डी.आई का विरोधी बन गया है लेकिन उसके सारे कार्य अब भी विदेशी कंपनी जैसे वोडाफोन आदि को फायदा पहुंचा रहे हैं | उदहारण , उसके प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकपाल आदि पर राईट टू रिकॉल का विरोध करने से विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंच रहा है क्योंकि बिना राईट टू रिकॉल आम जनता विदेशी कंपनियों द्वारा ख़रीदे गए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकपाल आदि को बदल नहीं सकेंगे |  
और इसके साथ ही वो अपनी खुद की प्रशंसा करता है कि वो ही था जिसने ये भारतीय बाजार के वैश्वीकरण किया , मनमोहन सिंह ने नहीं किया था |
इसीलिए कृपया नेताओं के काम पर ध्यान केंद्रित करें, उनके भाषणों पर नहीं |

पहला पार्ट यहाँ समाप्त होता है | आगे अगले पार्ट में सुनें |

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पार्ट-2 का आरम्भ

     पिछले पार्ट में हमने कोर्ट ड्रामा के बारे में बात की थी , कैसे सुब्रमनियम झूठे दावे करता है उन घोटालों का खुलासा करने का, जो पहले से ही लोगों को मालूम है और जिनका दूसरे लोगों ने खुलासा किया था | कैसे वो जनहित-याचिकाओं को चुरा लेता है और उनको बरबाद कर देता है और कैसे जनहित-याचिकाएं का पूर्व-निर्धारण होता है | हमने बात की थी कैसे सुब्रमनियम ने सोनिया को `लक्ष्मी` कहा था 1999 में और उसे प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की थी , कैसे इस विदेशी कंपनियों के एजेंट ने एफ.डी.आई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के पक्ष में और स्वदेशी के खिलाफ बयान दिए थे और राष्ट्रिय स्वयं सेवी संग के खिलाफ एक लेख भी लिखा था | अभी उसके भाषण बदल गए हैं लेकिन उसके काम अभी भी कांग्रेस और विदेशी कंपनियों को ही फायदा कर रहे हैं |      

10) अभी हम बात करते हैं कि क्यों संघ, भा.ज.पा, स्वामी रामदेव आदि सुब्रमनियम स्वामी का समर्थन कर रहे है?

     मुझसे एक अच्छा प्रश्न पूछा जाता है --- यदि सुब्रमनियम स्वामी देश को इतना नुकसान कर रहे हैं जितना मैं बोलता हूँ , तो फिर संघ और भा.ज.पा के नेता सुब्रमनियम स्वामी का साथ क्यों दे रहे हैं  ?
इसका कारण मैं कहूँगा कि आप अंध-भक्त खुद हो | आपकी अंध-भक्ति की वजह से आर.एस.एस. आदि को मजबूर होना पड़ रहा है कि वे सुब्रमनियम को समर्थन दें | कैसे मैं आपको समझाता हूँ |

     देखिये , विदेशी कंपनियों के मालिक / ईसाई धर्म प्रचारकों ने 2010 में देखा था कि कांग्रेस के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है | विदेशी कंपनियों के मालिक और ईसाई धर्म प्रचारक मीडिया, स्वयं-सेवी संस्थानों और जजों के प्रायोजक हैं | इसीलिए उनका प्रयोग करके भ्रष्ट विदेशी कंपनियों ने नकली कांग्रेस विरोधी अन्ना और अब सुब्रमनियम स्वामी जैसे लोग खड़े कर दिए जो कांग्रेस-विरोधी युवकों के लिए अब आकर्षण का केन्द्र बन गए हैं |

     विदेशी कंपनियों द्वारा पैसे दिए गए टी.वी. चैनलों के झूठे प्रचार का इतना प्रभाव रहा कि अप्रैल-08-2011 को, जब हमलोगों ने कहा कि अन्ना केवल मीडिया प्रचार द्वारा खड़े किये गए हैं और जनलोकपाल केवल विदेशी कम्पनी-पाल है विदेशी कंपनियों के मालिकों के फायदे के लिए, तो लोगों ने हमें कांग्रेस एजेंट बुलाना शुरू कर दिया !!

     तो अभी यदि भा.ज.पा / संघ के लोग अन्ना या सुब्रमनियम को उनके यहाँ स्थान नहीं देते , तो फिर 2014 में उन्हें कांग्रेस विरोधी वोट बँट जाने की सम्भावना का सामना करना पढ़ेगा |

     मान लीजिए कि अन्ना और सुब्रमनियम एक पार्टी बना लेते हैं और 2014 में चुनाव लड़ते हैं , तो फिर वे कांग्रेस-विरोधी 2-4 % वोटों पर कब्ज़ा कर सकते हैं , जिसका मतलब भा.ज.पा को पूरे देश में 20 से 40 सीटों का नुकसान हो सकता है और कांग्रेस को फायदा होगा | इसीलिए भा.ज.पा / संघ के नेता और जो भी कांग्रेस से नफरत करते हैं, के पास कोई भी चारा नहीं रहता है कि वे अन्ना और सुब्रमनियम के साथ काम करें | और उनके पास कोई भी चारा नहीं रहता , सिवाय इसके कि वे इस अपमान को सहें कि सुब्रमनियम ने वाजपाई सरकार को गिराया था और सोनिया को 1999 में प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की थी और ये अपमान सहें कि सुब्रमनियम ने 2001 में विश्व हिंदू परिषद पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत प्रतिबन्ध लगाने की मांग की थी और ये भी कि सुब्रमियम ने संघ को देश-विरोधी संस्था कहा था , आदि ,आदि |

     इसीलिए कांग्रेस-विरोधी वोटों को बँटने से रोकने के लिए, भा.ज.पा के नेताओं के पास कोई चारा नहीं है कि अन्ना , सुब्रमनियम आदि को खुश रखा जाये | 
     इसमें आप अंध-भक्तों की भूमिका कहाँ आती है ? बिकी हुई मीडिया मीडिया ने आपको बोला कि सुब्रमनियम स्वामी कांग्रेस विरोधी हैं और आपने मान लिया बिना जांच किये कि सुब्रमनियम ने अपने कार्य द्वारा कांग्रेस को फायदा पहुँचाया कि नुकसान | इस तरह बिकी हुई मीडिया सुब्रमनियम का नाम बड़ा करने में सफल हुई और आर.एस.एस. आदि को सुब्रमनियम का समर्थन करने पर मजबूर होना पड़ा |

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     ये ही मुख्य कारण है कि हम राईट टू रिकॉल आदि जन-हित के कानूनों के लिए एक असली जन-आन्दोलन चाहते हैं , बिना मीडिया के समर्थन के, जो केवल लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों आम-नागरिकों द्वारा समर्थित हो, जनलोकपाल जैसा नकली आन्दोलन नहीं जो केवल मीडिया द्वारा प्रचारित था |  इस जन आन्दोलन द्वारा नेताओं को ये जन-हित के क़ानून भारतीय राजपत्र में डालने के लिए मजबूर किया जा सकता है |

     हम “ चुनाव जीतो और राईट टू रिकॉल के नियमों को बनाओ “ जैसे असफल तरीके नहीं अपनाते क्योंकि जैसे ही आप “ चुनाव जीतो और अच्छे क़ानून बनाओ” का रास्ता लेते हो, तो आपको उन सब लोगों के साथ समझौता करना पड़ेगा जो वोटों में फूट डाल सकते हैं  और उनमें से कई लोग विदेशी कंपनियों के मालिकों , जिनका मीडिया और जजों पर प्रभाव है , द्वारा खड़े किये गए होंगे |

     इसीलिए सभी से निवेदन है कि कृपया राष्ट्रहित में, राईट टू रिकॉल के क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान केंद्रित करें और अपने प्रिय नेताओं के सामने राईट टू रिकॉल के तरीके लागू करवाने की मांग करें |
11)  अभी हम सुब्रमनियम स्वामी और चुनाव यंत्र के बारे में बात करते हैं

     सुब्रमनियम स्वामी ये दावा करते हैं कि वे चुनाव यंत्र के विरोधी हैं | तो फिर कोई ये समझा सकता है कि सुब्रमनियम अपने समर्थकों से कोई भी चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार बनने के लिए क्यों नहीं कहते ताकि हरेक चुनाव क्षेत्र में 65 या ज्यादा उम्मीदवार हों और चुनाव आयोग (चुनाव करवाने वाली सरकारी संस्था) मतदान पत्र का प्रयोग करने पर मजबूर हो जाये? (क्योंकि चुनाव यंत्र एक चुनाव क्षेत्र में 64 से ज्यादा उम्मीदवार के लिए प्रयोग नहीं हो सकता) 
          और ये संभव है क्योंकि ये तरीका को सफलता से आंध्र उप-चुनावों में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति पार्टी द्वारा प्रयोग किया था | और वोट भी नहीं बांटते क्योंकि अतिरिक्त उम्मीदवार प्रचार भी नहीं करते |
इसका लिंक देखें -
 

http://indiatoday.intoday.in/story/trs-trick-forces-ec-to-use-ballot-papers-in-andhra-pradesh-bypolls/1/104882.html

http://www.siasat.com/english/news/trs-field-dummies-defeat-evms

http://www.thehindu.com/news/states/andhra-pradesh/article544179.ece?homepage=true

            लेकिन ये तरीके का प्रयोग करने के बदले सुब्रमनियम कार्यकर्ताओं का समय बेकार के कोर्ट के मामलों में क्यों बर्बाद कर रहे हैं, जहाँ जज ने अभी तक आने वाले चुनावों के लिए चुनाव यंत्र पर प्रतिबन्ध लगाने से मन कर दिया है ?
             यदि सुब्रमनियम सच में चुनाव यंत्र के विरोधी हैं , तो वो कम से कम सभी संस्थाएं और पार्टियां जैसे भा.जा.पा, कोम्युनिस्ट पार्टी, इंडिया अगेंस्ट करपशन, आदि से 65 या ज्यादा उम्मीदवार खड़े करने के लिए अपील कर सकते हैं | ये संस्थाओं के पास काफी पैसा है ये कार्य करने के लिए | सभी नहीं , तो ये पार्टियां या संस्थाएं कुछ एक-आध चुनाव क्षेत्र में तो ऐसा कर ही सकती हैं |
               इसके बाद सुब्रमनियम को नागरिकों को बोलना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री को राईट टू रिकॉल चुनाव आयोग अध्यक्ष की प्रक्रिया को भारतीय राजपत्र में छापने के लिए मजबूर करें |  और सबसे कम प्रभावशाली तरीका है कोर्ट के धक्के खाना |

अधिकतर राजनैतिक पार्टियों के शीर्ष के नेता चुनाव यंत्रों का समर्थन कर रहे हैं अमेरिकी दबाव के कारण | कोई भी पार्टी सिवाय तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ने अपने कार्यकर्ताओं को 65 उम्मीदवारों को रखने से मना कर दिया है | अडवानी ने भी एक चुनाव क्षेत्र 65 या जयादा  उम्मीदवार खड़े करने से मना कर दिया है |
      चुनाव यंत्र में जो चिप है वो अमेरिका में बनी है
| यदि 5-10 लोग भी भेल में ( वो कंपनी जो चुनाव यंत्र बनाती है ) आपस में मिल जाते हैं, तो ये संभव है किसी उम्मीदवार को 20% वोट देने के लिए , उम्मीदवार का चुनाव यंत्र पर नंबर बाद में पता चले तो भी | कैसे ? इसके लिए http://righttorecall.info/evm1.pdf  देखें |

और एक यू-ट्यूब वीडियो भी है हमारे चैनल पर जो दिखाता है कि कैसे चुनाव यंत्र की धांधली हो सकती है दूर से रेडियो सिग्नल भेज कर यदि भेल में चुनाव यंत्र में एक सरकिट रखा जाये |
       अभी यदि चुनाव यंत्र में धांधली होती है , तो कांग्रेस या भा.जा.पा. ये करने में समर्थ नहीं है और कोई भी पार्टी इस यू-ट्यूब वीडियो को मुख्य मीडिया पर आने से नहीं रोक सकने में समर्थ नहीं है | केवल अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी चुनाव यंत्रों की बड़े स्तर पर धांधली करवाने में समर्थ है और केवल विदेशी कम्पनियाँ , जो बहुत सारे चैनल और समाचार पत्र को पैसा देते हैं , ये यू-ट्यूब वीडियो को मीडिया में आने से रोकने में समर्थ हैं  

मैंने जुलाई 31, 2009 को एक समाचार पत्र में एक प्रचार दिया था जिसमें सभी कार्यकर्ताओं को विनती की थी कि वे चुनाव का फॉर्म भरें और ये प्रयत्न करें कि एक चुनाव क्षेत्र में 65 या ज्यादा उम्मीदवार खड़े हों ताकि चुनाव आयोग को मतदान पत्रों का उपयोग करने पर मजबूर होना पड़े | मेरी आवाज अकेली थी लेकिन कम से कम मैंने अपना कर्तव्य निभाया |

 

चुनावी यंत्र के साथ रसीद क्यों बेकार है –

रसीद देने वाले चुनावी यंत्र, चुनाव यंत्र की 1% भी धांधली नहीं रोक सकते | क्या यदि कोई व्यक्ति रसीद लेकर चला जाता है, बिना उसको जमा करे ? क्या यदि किसी व्यक्ति ने भा.जा.पा. के लिए बटन दबाया, मशीन ने रसीद में भा.जा.पा. लिखा और व्यक्ति ने झूठ बोला कि उसने कांग्रेस को वोट दिया था ?

और यदि ये रसीद देने वाले चुनावी यंत्र चुनाव की गोपनीयता को सुरक्षित रख सकते हैं कि नहीं, ये प्रक्रिया या ड्राफ्ट की घोषणा की जाने पर ही पता चल सकता है |

12) जनहित याचिका की फिक्सिंग (परिणाम का पहले से निश्चित करना) के बारे में और बात करते हैं

भ्रष्ट विदेशी कंपनियों के समूह या लॉबी ये सुनिश्चित करते हैं कि जज केवल उन्हीं व्यक्तियों की जनहित याचिका जज आने दें जिन्हें ये भ्रष्ट विदेशी कम्पनियाँ उनके द्वारा प्रायोजित , बिकी हुए मीडिया द्वारा श्रेय दिलवाना चाहते हैं | ये विदेशी कंपनियों के लॉबियां जजों से अपने काम निकालती हैं उनके रिश्तेदारों को अपने यहाँ नौकरी देकर और उन्हें साल के करोड़ों रुपये देकर या जजों का कोई और काम करवा कर | जनहित याचिका इस आधार पर स्वीकार नहीं की जाती कि उसमें क्या लिखा है लेकिन याचिका को कौन व्यक्ति दे रहा है, उसके आधार पर स्वीकार या अस्वीकार की जाती है |

12.1 पहला उदहारण

2003 में राजीव दीक्षित जी ने एक जनहित याचिका डाली थी मौरिशियस मार्ग बंद करने और टैक्स की चोरी मौरिशियस मार्ग द्वारा रोकने के लिए | लेकिन सुप्रीम-कोर्ट ने उनकी जनहित याचिका को रद्द कर दिया और ये संविधान के खिलाफ फैसले ने मौरिशियस टैक्स चोरी के मार्ग को जारी रखा |

http://www.hindu.com/biz/2003/11/17/stories/2003111700010300.htm

12.2 एक उदहारण प्रस्तुत करते हैं कि कैसे सेतुसमुद्रम की जनहित-याचिका पूर्व-निर्धारित(फिक्स) की गयी और रामसेतु मुद्दे को सुब्रमनियम ने चुरा लिया था और विदेशी कंपनियों ने अपने प्रोजित मीडिया और जजों द्वारा अपने एजेंट सुब्रमनियम को हीरो बना दिया

हम अकसर सुनते हैं सुब्रमनियम और `बिकी हुई मीडिया` से कि सेतुसमुद्रम योजना को रुकवाने का और रामसेतु को बचने का श्रेय सुब्रमनियम को जाता है | हम कुछ तथ्य देखते हैं |

1) सेतुसमुद्रम योजना भा.जा.पा-द्रमुक गठबंदन (एन.डी.ए.) द्वारा 2002 में शुरू की गयी थी | लेकिन बहुत सारे कार्यकर्ताओं ने भा.जा.पा को मजबूर कर दिया था कि वे इस योजना को रोकें | इसके कारण भा.जा.पा-द्रमुक गठबंदन टूट गया था और जब भा.जा.पा. सत्ता में नहीं रही, तो उसने खुले-आम इस योजना का विरोध करना शुरू कर दिया |
सेतुसमुद्रम योजना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं है , ऐसा बहुत से विशेषज्ञ कहते हैं | इसीलिए, ऐसी सम्भावना नहीं है कि ये सफलतापूर्वक लागू हो सके लेकिन अभी तक करोडों रुपये खर्च हो चुके हैं |
http://internationalpost.blogspot.com/2007/10/dream-and-reality-sethusamudram-ship.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Sethusamudram_Shipping_Canal_Project

2) सेतुसमुद्रम योजना पर अन्यायपूर्वक तरीके से हो रही जनसुनवाई के विरुद्ध जनहित-याचिका ख़ारिज कर दी गयी |

ए.सुब्रमणि द्वारा

चेन्नई,दिसम्बर 17,2004
मद्रास हाई कोर्ट ने ये सेतुसमुद्रम जहाज नहर योजना पर अन्यायपूर्व तरीके से हो रही जनसुनवाई के विरुद्ध जनहित याचिका को `समयपूर्व` कहते हुए ख़ारिज कर दी और 6 समुद्रतटीय इलाकों के कलेक्टरों को निर्देश दिया कि वो जनसुनवाई जल्दी से समाप्त करें |
http://www.hindu.com/2004/12/18/stories/2004121807760100.htm

सालों से , विशेषज्ञ ये कह रहे हैं कि

·       ये योजना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है और वैकल्पिक रास्ते का प्रयोग होना चाहिए

·       ये योजना स्थानीय मछली पकड़ने का कार्य को नुकसान करेगा , उस स्थान के पर्यावरण को बरबाद करके

·       रामसेतु करोडों हिंदुओं द्वारा पवित्र माना जाता है और संविधान इसकी किसी प्रकार से हानि की स्वीकृति नहीं देता

लेकिन कोर्ट स्थानीय लोगों की जनहित-याचिकाओं को नजरंदाज करते आ रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई भी वास्ता नहीं है लेकिन 2008 में सुब्रमनियम स्वामी आता है और वो बिलकुल ये ही मुद्दों पर बहस करता है और कोर्ट रोकादेश दे देते हैं !!!

क्यों ? कैसे ?

ये स्पष्ट है कि जजों ने सुब्रमनियम की जनहित-याचिका पर कुछ काम किया , उनके विदेशी कंपनियों के प्रयाजकों के इच्छा अनुसार | और विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित मीडिया ने सुब्रमनियम को हीरो बना दिया और इस बात को दबा दिया कि इससे पूर्व, वर्षों से दूसरे लोग भी जनहित-याचिका की अर्जी दे रहे थे |

12.3  एक और जनहित-याचिका के पूर्व-निर्धारण (फिक्सिंग) का मामला देखिये
2 मार्च, 2012 को “अडवोकेट मनोहर लाल शर्मा ने अपने जनहित-याचिका में कहा था कि वोडाफोन टैक्स मामले में हितों का आपस में टकराव है क्योंकि सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज कपाड़िया का बेटा एक परामर्श देने वाली कंपनी में काम करता है, जिसने भूतकाल में अपनी सेवाएं वोडाफोन को दी थी और इसीलिए वोडाफोन टैक्स मामले को अमान्य दे देना चाहिए ”

“शर्मा ने कहा कि जज कपाड़िया उस बेंच का हिस्सा था , जिसने वोदफोन मामले की सुनवाई की थी लेकिन सुप्रीम-कोर्ट ने इस जनहित-याचिका को मिथ्या लांछन लगाने वाला, ओछा और गारी जिम्मेदार” बताते हुए ख़ारिज कर दिया  और याचिका डालने वाले पर 50,000 रुपयों का जुर्माना डाल दिया”  

http://www.moneycontrol.com/news/business/sc-dismisses-pilvodafone-tax-verdict_675875.html

http://www.livemint.com/2012/02/23004840/Vodafone-tax-saga-takes-a-new.html

12.4 कोर्ट को लिखा गया पत्र भी जनहित-याचिका के जैसे दर्ज किया जा सकता है

हाई-कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज कोर्ट को लिखे गए पत्रों को भी जनहित-याचिका के जैसे दर्ज करते हैं | हमने हाई कोर्ट जज को जनहित-याचिका पत्र भेजे हैं ; वे जवाब भी नहीं देते | केवल उनकी ही जनहित-याचिकाएं ली जाती हैं, जिनकी जजों के साथ सेट्टिंग है और हमारी कोई भी जजों को नहीं जानते |

इसीलिए, जनहित याचिका बेकार है और कानून-ड्राफ्ट समाधानों पर विज्ञापन-पर्चे देना और जन-आन्दोलन खड़ा करना ही लाभदायक तरीका है |   

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12.5 जनहित याचिकाओं को दर्ज करवाने के लिए जजों के सेट्टिंग या रिश्वत देने की जरुरत है

गुजरात हाई-कोर्ट में जज 5 लाख तक की रिश्वत लेते हैं जनहित याचिका दर्ज करने के लिए और ये केवल करने के लिए रिश्वत है, कोई गारंटी नहीं कि याचिका सफल होगी कि नहीं |

हाँ, या तो रिश्वर देनी पड़ती है या तो जजों के रिश्तेदारों या मित्रों के साथ सेट्टिंग होना जरुरी है जनहित-याचिका दर्ज करवाने के लिए
     एक बार सुब्रमनियम कोर्ट में जनहित याचिका दर्ज करता है, तो विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित जज दूसरी वैसे ही याचिका आने नहीं देते | और सुब्रमनियम उस मामले को कमजोर कर देता है और जज उस मामले को सालों तक लटका देते हैं |

     यदि आप 2 जी की जनहित-याचिका के साथ सुप्रीम-कोर्ट जाते, तो जज आप को उसी समय बाहर का रास्ता दिखा देते | और जब सुब्रमनियम उसी जनहित-याचिका के साथ गए , तो उसका स्वागत किया गया | क्यों ? क्योंकि सुप्रीम-कोर्ट के जज चाहते थे कि सुब्रमनियम स्वामी को नाम मिले, आपको नहीं |
     अभी, सुप्रीम-कोर्ट के जज क्यों चाहेंगे कि सुब्रमनियम स्वामी को नाम मिले ? देखिये, सुप्रीम-कोर्ट के जजों को परवाह नहीं है | उनको तो विदेशी कंपनियों के समूह से समर्थन और पैसा मिलता है और इसीलिए वो ही करते हैं जो ये विदेशी कंपनियों के समूह (लॉबी) कहते हैं
और तो और
, आप कोई भी बहादुरी का काम क्यों न करो, आप पर मीडिया कभी भी ध्यान नहीं देगी | और सुब्रमनियम केवल कोर्ट ही तो गए हैं | देखिये, हर महीने एक करोड़ भारतीय कोर्ट जाते हैं |
     और आश्चर्य!! मीडिया के पास सुब्रमनियम स्वामी की तारीफ़ के अलावा कुछ नहीं है | क्यों ? क्योंकि मीडिया वाले नहीं चाहते कि आप हीरो बनें , वे चाहते हैं कि सुब्रमनियम स्वामी हीरो बनें | क्यों ? एकबार फिर, उनको इसकी कोई परवाह नहीं है --- वे तो उन लोगों के अनुसार चलते हैं जो उनको पैसे देते हैं | उदहारण – राजीव दीक्षित जी , जिन्होंने कांग्रेस के खिलाफ काफी काम किया और नुकसान पहुँचाया था , का फोटो एक भी बड़े पत्रिका में नहीं आया क्योंकि वे सच्चे देश भक्त थे लेकिन सुब्रमनियम का फोटो मिलेगा |
     तो कुल मिलाकर, कोर्ट और मीडिया ड्रामा का परिणाम है --- जज और मीडिया को समर्थन करने वाले विदेशी कंपनी-समूह(लॉबी) अपने एजेंट हीरो के रूप में रख देंगे |

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     एक ही कारण है
, क्यों मीडिया वाले सुब्रमनियम स्वामी को बढ़ावा देते हैं, है कि जो लोग मीडिया का प्रयोजन करते हैं , देखते हैं कि सुब्रमनियम कार्यकर्ताओं का समय बर्बाद कर रहा है और कार्यकर्ताओं की सुस्ती को बढ़ावा दे रहा है , कोर्ट के मामलों से झूठी उम्मीदें लगवा कर |
     कार्यकर्ता ये देखते हैं कि सुब्रमनियम ऊंचे-दर्जे के मामले दर्ज कर रहा है और बिके हुए मीडिया वाले झूठी आशाएं पैदा करते हैं कि इन मामलों का कुछ अच्छा परिणाम आएगा |

इसीलिए वे सुस्त हो जाते हैं |
     सुब्रमनियम के चुनाव यंत्र के मामले में समय बर्बाद करने वाले तरीकों पर विचार करें | यदि कोई बड़े स्तर पर चुनाव यंत्रों में धांधली करवा सकता है , तो वो विदेशी कंपनी या अमेरिकी ख़ुफ़िया संस्था है
, सरकार नहीं | आज के समय में, अधिकतर मीडिया और न्यायपालिका पर विदेशी कम्पनियाँ का नियंत्रण है और सरकार का कोई भी नियंत्रण नहीं है | बिना मीडिया और नयायपालिका पर नियंत्रण के, सरकार के पास पर्याप्त शक्ति नहीं है कि वो चुनाव मशीनों में धांधली करवा सके | और सुब्रमनियम हम को ये विश्वास दिलवाना चाहते हैं कि भ्रष्ट और भाई-भतीजेवाद करने वाले (रिश्तेदारों की तरफदारी करने वाले) हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जज विदेशी कंपनियों और अमेरिकी ख़ुफ़िया संस्था का विरोध करेंगे !!

    और जब सुब्रमनियम ने चुनाव यंत्र का मामला दर्ज किया और बिकी हुई मीडिया ने उसको हीरो बनाया, तो चुनाव यंत्र के खिलाफ असली काम (मतलब कि जिम्मेदार नागरिक एक चुनाव क्षेत्र में 65 से ज्यादा उम्मीदवार खड़े करवाएं) समाप्त हो गया | दूसरे शब्दों में चुनाव यंत्रों को जीवन मिला स्वामी के बेकार के कोर्ट ड्रामा के कारण | 

13) समय बरबाद करने वालों को पैसा और मीडिया प्रचार देना का सामान्य तरीका 

     कुछ नागरिक ऐसे होते हैं जो कुछ हद तक अपना पेशा छोड़ कर थोड़े में रहने के लिए तैयार हो जाते हैं | और इस तरह समाज और देश के लिए कार्य करने के लिए समय निकाल लेते हैं | विदेशी कंपनियों के मालिक और भारतीय उच्च वर्ग के लोगों को ऐसे तरीके चाहिए जिससे कार्यकर्ता को समय बेकार, बरबाद करने वाले कार्यों में लगाया जाये | एक तरीका जो उन्होंने सिद्ध कर लिया है, वो है समय बरबाद करने वाले कार्यकर्ता-नेताओं को पैसे और मीडिया प्रचार देना | ऐसे समय बरबाद करने वाले कार्यकर्ता-नेता, कार्यकर्ताओं को बेकार के समय-बरबाद करने वाले कार्यों में लगा देते हैं , जिससे देश के व्यवस्था में कोई भी सुधार नहीं होता हो |

ये पूरा तरीका शुरू से लेकर अंत तक कैसे काम करता है ?

1. जूनियर कार्यकर्ताओं की संख्या जो देश के लिए समय और पैसा देने के लिए तैयार हैं
और बदले में कोई भी नाम, पैसा , प्रशंसा नहीं चाहते, कुछ लाखों में ही होती है |
इसीलिए देश की व्यवस्था को सुधारने के लिए सबसे ज्यादा प्रभाव शाली कार्य करने
चाहिए |
जूनियर कार्यकर्ता ये गलत सोचते हैं कि वे अकेले कुछ कर नहीं सकते, अनेक कारणों के 
वजह से जैसे-उनके पास समय नहीं है, उनके पास इतनी क्षमता नहीं है आदि., और
इसीलिए वे एक समूह से जुड़ने का निर्णय लेते हैं |


ये एक अपने आप में एक बहुत बड़ी गलत सोच है |


  मैंने
www.righttorecall.info/301.h.pdf  के चैप्टर 13 में दिखाया है कि कैसे 2 से 4 लाख कार्यकर्ता , अकेले , बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में 15-20 घंटे काम कर सकते हैं और भारत की व्यवस्था को सुधार सकते हैं और भारत को कुछ ही सालों में पश्चिम के सामान विकसित बना सकता है | फिर भी कार्यकर्ता कोई समूह से जुड़ना चाहते हैं ,इसीलिए वे कार्यकर्ता-नेताओं की खोज करते हैं |

यदि आपके पास देश के लिए पांच-दस मिनट भी हैं , तो भी आपके योगदान से देश की व्यवस्था सुधर सकती है |

 

2. कार्यकर्ता-नेताओं को संस्था के लिए पैसे चाहिए, इसीलिए वे दानकर्ता खोजते हैं- चाहे वे
विदेशी दानकर्ता हों या भारतीय दानकर्ता | फिर कार्यकार्ता नेताओं के पास कोई चारा नहीं   
होता कि वे अपने कार्य-सूची में से कुछ कार्य कम कर दें, जो दानकर्ताओं को पसंद नहीं
आयेंगे, चाहे वे कार्य भारत के लिए बहुत जरूरी और तुरंत चाहिए हों | इस तरह कार्यकर्ता-नेता  समय बरबाद करने वाले हो जाते हैं | उच्च वर्ग के लोगों से कोई आदेश नहीं होता है --- कार्यकर्ता-नेता अपने मर्जी से समय बरबाद करने वाले हो जाते हैं, दानकर्ताओं के पसंद या झुकाव के अनुसार होने के लिए |


3. कार्यकर्ता-नेता ऐसी पोशाक या पहनावा, रूप और बोली का प्रयोग करते हैं जिससे लगे कि
कार्यकर्ता-नेता “सरकार-विरोधी” है | उनको ऐसा करने की जरुरत जूनियर कार्यकर्ताओं को
आकर्षित करने के लिए पड़ती है |


4. अब उच्च-वर्ग के लोग ऐसे कार्यकर्ता-नेताओं की खोज कर रहे होते हैं जो समय बरबाद करने वाले हों | इसीलिए जब उच्च-वर्ग के लोग `समय बरबाद करने वाले कार्यकर्ता-नेता` को ढूँढ लेते हैं तो उन्हें पैसे देते हैं या मीडिया वालों को पैसे देते हैं मीडिया में कार्यकर्ता-नेता का
अच्छा, अनुकूल प्रचार करने के लिए ताकि उसका नाम जूनियर कार्यकर्ताओं तक पहुंचे और
अधिक से अधिक जूनियर कार्यकर्ता उसके साथ जुड़ें | इस तरह मीडिया प्रचार और पहनावा,
रूप, बोली आदि द्वारा कार्यकर्ता-नेता को जूनियर कार्यकर्ता मिल जाते हैं और वो जूनियर
कार्यकर्ताओं को कहता है कि अच्छे क़ानून-ड्राफ्ट जो भारतीय राजपत्र में डाले जा सकें उनपर
ध्यान केंद्रित ना करें और केवल समय-बरबाद करने वाले और देश के समस्यों को सुलझाने
में कम प्रभावशाली कार्य जैसे नारे लगाना, पढ़ाना, स्वास्थ्य सुधार , अनशन-धरना, चरित्र-
निर्माण, समाज-सेवा , कोर्ट के चक्कर लगाना आदि |

5. इस तरह वर्तमान खराब क़ानून चलते रहते हैं और नए खराब कानून बिना कोई विरोध के आ जाते हैं और उच्च-वर्ग और विदेशी कंपनियों के समूह का राज और लूट चलती रहती है |  
 
   
इस तरह “ समय बरबाद करने वालों को पैसे और मीडिया प्रचार देना” का तरीका काम करता है | और आजकल , मीडिया में प्रचार करवाना सीधे पैसे देने से ज्यादा होता है |  मीडिया प्रचार करवाने के लिए जो पैसा दिया जाता है , वो कुल खर्चे का 95% होता है | उदहारण , जनलोकपाल ड्रामा में , फेर्वरी-4-2011 और फरवरी-8-2011 के बीच , विदेशी कंपनियों के मालिकों ने 2000 करोड़ रुपयों से ज्यादा टी.वी. चैनल को पैसा दिया होगा अन्ना के प्रचार के लिए |

     मोहनभाई गाँधी सबसे अच्छा उदहारण है समय-बरबाद करने वालों का जो मैं सोच सकता हूँ | उसको मालूम था कि यदि वो भजन-गाने, चरखा-चलाने , अनशन-धरना और दूसरे समय बरबाद करने वाले कार्यों को बढ़ावा देगा, तो अंग्रेज मीडिया को पैसे देंगे उसका प्रचार करने के लिए | इसीलिए मोहनभाई ने युवकों का समय बरबाद करने वाले कार्य शुरू किये |
अंग्रेजों ने पैसे दिए मोहनभाई का देश-विदेश में प्रचार करवाने के लिए | और अंग्रेजों ने भारतीय व्यापारियों को भी कहा मोहनभाई के समय-बरबाद करने वाले कार्यों के लिए पैसे देने के लिए |
 
   
     अन्ना अगला सबसे अच्छा उदहारण है | अन्ना चाहता था कि उसकी फोटो टी.वी पर आये, और कुछ नहीं चाहता था | विदेशी कंपनियों के मालिकों को कोई ऐसा चाहिए था जो पहनावे से , देखने में और बोली से भ्रष्टाचार का विरोधी , भारत के लोगों का समर्थक लगे और इसीलिए उन्होंने अन्ना को चुना और टी.वी. वालों को पैसे दिए ताकि उसका पूरे देश में नाम हो जाये | 

      भारत में 10,000 से ज्यादा कार्यकर्ता-नेता हैं, और मेरे विचार में, 9900 से ज्यादा जान-बूझ कर कार्यकर्ताओं का समय बरबाद कर रहे हैं और उन्हें सुस्त बना रहे हैं , ताकि विदेशी कंपनियों के मालिक और भारतीय उच्च-वर्ग के लोग उनका मीडिया में प्रचार करें | विदेशी कंपनियों के मालिक और भारतीय उच्च-वर्ग के लोग उनके मीडिया में प्रचार के लिए पैसे देते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि कुछ लाख युवक जो देश के लिए काम करना चाहते हैं, उनका समय बेकार या देश के समस्याओं को सुलझाने में कम प्रभावशाली तरीकों में बिगड़े | इसीलिए कार्यकर्ताओं को खुद ढूँढना और परखना होगा कि कौन समय बरबाद करने वाला है और कौन नहीं |

 

14) अभी हम सुब्रमनियम और सनातन धर्म और दूसरे मुद्दों के बारे में बात करते हैं

    सुब्रमनियम स्वामी ने नवंबर 2011 के अहमदाबाद के अपने भाषण में एक मजेदार बात कही थी | उसने कहा था कि क़ानून की शिक्षा स्कूल में दी जानी चाहिए | मैं इससे पूरी तरह सहमत हूँ और ये मेरी ये वर्षों से मांग रही है | लेकिन यदि ध्यान दें कि सुब्रमनियम 1990-91 में मंत्री-मंडल में क़ानून मंत्री थे | क्यों उन्होंने स्कूल में क़ानून पढाने का प्रस्ताव नहीं रखा उस समय ? और 1977-80 में भी जनता पार्टी में उनका अच्छा पद था | तब उन्होंने संसद में कोई क़ानून बनाने का प्रस्ताव क्यों नहीं रखा था ? और बाद में भी वे सांसद रहे थे | तो फिर उन्होंने स्कूल में क़ानून पढ़ाने का कोई प्रस्ताव क्यों नहीं रखा था संसद में ? दूसरे शब्दों में, वे सिर्फ बातें ही करते हैं ---- जब क़ानून बनाने की बात आती है, तो वो कुछ नहीं करते हैं | क्यों ? उनसे पूछिए |

     अहमदाबाद की उसी सभा में , सुब्रमनियम ने बताया कि जुलिया रोबर्ट्स हिंदू बन गयी है और वहाँ बैठा आर.एस.एस. के जनसमूह ने तालियाँ बजानी शुरू कर दी | स्वामी ने जान-बूझकर ये नहीं बताया कि आंध्र प्रदेश के 15% की आबादी से ज्यादा और कुछ 35% आन्ध्र की दलित जनसंख्या इसाई बन गयी है !!!   

     और अंत में, जब सुब्रमनियम से भ्रष्टाचार समाप्त करने का रास्ता पूछा गया, तो सुब्रमनियम ने एक बहुत ही चतुर जवाब दिया | उसने कहा “ सनातन धर्म और सनातन मूल्य को बढ़ावा देना ही एक रास्ता है !!!” दूसरे शब्दों में, हमें व्यवस्था में कोई भी परिवर्तन नहीं चाहिए , हमें जूरी सिस्टम नहीं चाहिए, हमें भ्रष्ट जनता के नौकरों को बदलने के तरीके  नहीं चाहिए , हमें अपनी पोलिस और कोर्ट को सुधारने की कोई जरुरत नहीं, हमें केवल सनातन मूल्यों को बढ़ावा देने कि जरुरत है.....और अचानक, अपने आप भ्रष्टाचार कम हो जायेगा, बांग्लादेशियों को निकाल दिया जायेगा , सेना में सुधार आ जायेगा आदि, आदि |

         सच तो ये है कि जब तक आम-नागरिकों के पास अपने बुनियादी अधिकार नहीं होंगे, अधिकार पारदर्शी तरीके से शिकायत या राय देना का जो दबाया नहीं जा सके, भ्रष्ट को बदलने और सज़ा देने का अधिकार , भ्रष्टाचार और देश के दूसरे बहुत बड़ी समस्याएं हल नहीं होंगी और आम-नागरिक को गुलाम बनाया जायेगा, जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन किया जायेगा और लूटा जायेगा जैसे की दक्षिण कोरिया और इराक में हुआ | कृपया इसके लिंक चैप्टर 1,6,21, www.righttorecall.info/301.h.pdf में देखें |

15) अभी बात करते हैं सुब्रमनियम स्वामी के डी.एन.ए. समाचार पत्र के इस्लाम विरोधी लेख के बारे में –

http://atlasshrugs2000.typepad.com/atlas_shrugs/2011/07/dr-subramaniam-swamy-how-to-wipe-out-islamic-terror.html

     प्रश्न ये है कि क्या ये या कोई दूसरे लेख में सुब्रमनियम ने कोई कानून-ड्राफ्ट बताया है सेना को मजबूत करने के लिए ? नहीं | (कृपया www.righttorecall.info/301.h.pdf का चैप्टर 24 देखें कानून-प्रक्रियाएँ सेना को मजबूत करने के लिए) सुब्रमनियम राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री का विरोध करता है – तो प्रधानमंत्री भ्रष्ट रहेगा और सेना को कभी भी सुधरने नहीं देगा | सुब्रमनियम आम-नागरिकों को हथियार देने के विरोधी है, तो फिर हम पाकिस्तानी सेना के खिलाफ कैसे लड़ेंगे, यदि उसके पास चीन के आधुनिकतम हथियार हुए तो ?
     और हम पाकिस्तान के साथ बिना भारतीय सेना को सुधारे लड़ नहीं सकते | सुब्रमनियम क्या कदम बताता है सेना को सुधरने के लिए ?
और जब वो सांसद/मंत्री था 1990 में, तो उसने कितने कानून-ड्राफ्ट का प्रस्ताव किया था संसद में सेना को सुधरने के लिए ? क्या उसने कोई कानून का प्रस्ताव किया था उस समय संविधान का अनुच्छेद-370 रद्द करने के लिए ?
    
सुब्रमनियम अवैद्य बंगलादेशियों को भारत से निकालने की बात करता है | लेकिन वो उन सभी कानून-ड्राफ्ट का विरोध करता है जो अवैद्य बंगलादेशियों को देश से बहार निकालने के लिए जरुरी है ., उदहारण यदि कोई आरोपी बंगलादेशी है या भारतीय, ज्यूरी द्वारा मुकद्दमा बहुत जरूरी है क्योंकि अधिकतर जज भ्रष्ट होते हैं और केस को जान-बूझकर लटकाते रहते हैं | और सबसे जरूरी --- बंगलादेशियों की पब्लिक में नार्को-जाँच आवश्यक है , ये सिद्ध करने के लिए कि वो बंग्लादेशिहाई | और सुब्रमनियम स्वामी ने खुले-आम नार्को जांच का विरोध किया है | असल में, सुब्रमनियम हसन अली, ए.राजा आदि पर नार्को-जांच का भी विरोध करता है | 
      इसके अलावा सुब्रमनियम दावा करते हैं कि वे हिंदुत्व को बढ़ावा देने वाले हैं लेकिन ऐसे क़ानून प्रस्ताव करने से मना करते हैं जिनसे बंगलादेशी का देश में गैर-कानूनी तरीके से घुसना रुक सके और मौजूद / वर्तमान अवैद्य बंगलादेशियों को खोजा जा सके, उनकी राष्ट्रीयता साबित करके उनको देश के बहार निकाला जा सके या हिंदुओं का जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कैसे रोका जा सके |
    
जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन, अवैद्य बंगलादेशियों की समस्या, ईसाई धर्म-प्रचारकों और विदेशी कमापनियों का मंदिरों पर कब्ज़ा करके उसका पैसा धर्म-परिवर्तन में लगाना, ये सब समस्याओं का समाधान कोर्ट के चक्कर लगाने से नहीं होगा | कृपया हमारे प्रस्ताव www.righttorecall.info/301.h.pdf में देखें और हमारा विडियो भी देखें इसी चैनल में जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन और अवैद्य बंगलादेशियों को रोकने के लिए |

    मैंने स्वयं सुब्रमनियम स्वामी से बात की है | वो किसी भी कानून में परिवर्तन का विरोध करता है , विशेषकर पारदर्शी शिकायत /प्रस्ताव प्रणाली (कृपया चैप्टर 1, www.righttorecall.info/301.h.pdf देखें)

    केवल हिंदू मानसिकता जो बदलने की जरूरत है, वो है कि कानून-प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करने की है | हिंदुओं को अपने संस्कृति के ओर वापस लौटना होगा, जिसमें व्यक्ति की नहीं व्यक्ति के गुणों की पूजा करने होती है | उनको सभी अंध-भक्ति रोक देनी चाहिए |

सुब्रमनियम स्वामी के सारे कोर्ट के मुकद्दमों का परिणाम एक बड़ा शून्य है |

     और फिर भी , मीडिया के सामने, सुब्रमनियम स्वामी दावा करते हैं, कोर्ट में मामले दर्ज करके भ्रष्टाचार को खुला करके भ्रष्टाचार को कम करेंगे |
     सुब्रमनियम को अच्छी तरह से मालूम है कि ये संभव नहीं है क्योंकि उनके
15 सालों के कोर्ट की करवाई के एक भी आरोपी को सज़ा नहीं हुई है | बिना सज़ा के भ्रष्टाचार कम होगा नहीं लेकिन वे सच्चे कार्यकर्ताओं को भटका रहे हैं उन रास्तों से जो भ्रष्टाचार कम करेंगे जैसे पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली, मजबूत जूरी सिस्टम, प्रधानमंत्री, सांसदों, लोकपाल, जज आदि को आम-नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार (रिकॉल) की अच्छी प्रक्रियाएँ |

16) सुब्रमनियम कार्यकर्ताओं को क्यों भटका रहे है?

    
साफ़ है, कि वे ऐसा पैसे के लिए नहीं कर रहे हैं, शायद वे नाम पाने के लिए कर रहे हैं , लेकिन जो भी कारण हो, ये साफ़ है कि उनका कोर्ट का ड्रामा ,कोर्ट का अभियान  केवल कार्यकर्ताओं का समय बरबाद कर रही है और उससे भ्रष्टाचार बिलकुल भी कम नहीं हो रहा है |
    
सच्चाई ये है कि 99% बड़े भ्रष्टाचारों में कोई भी सबूत नहीं होता | बिना सबूतों के भ्रष्ट को कभी सज़ा नहीं होगी | इसीलिए सुब्रमनियम अपने 15 सालों की कोर्ट की करवाई में एक भी आरोपी को सज़ा नहीं दिलवा सके हैं | और बिना भ्रष्ट को सजा हुए, भ्रष्टाचार कम नहीं होगा |  इसीलिए जो कोर्ट के चक्कर लगा कर भ्रष्टाचार से लड़ने का रास्ता सुब्रमनियम दिखा रहे हैं और बढ़ावा दे रहे हैं, वो एकदम बेकार है |

     एक और झूठ जो सुब्रमनियम और दूसरे नेता, कार्यकर्ताओं और आम-नागरिकों को बोलता है - `अपने पसंद के नेता आर पार्टी को बहुमात से चुना कर जितवाओ और हम सभी अच्छे कानून बनायेंगे` ये पूरी तरह से असंभव है | क्यों ? मान लीजिए, किसी तरह एक पार्टी को लोकसभा में बहुमत भी मिल जाती है, लेकिन उसको 5-10 साल या ज्यादा चाहिए राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए और कानूनों को पारित करने के लिए | यदि ये भी किसी तरह संभव हो गया कि कोई कानून दोनों सदनों में पारित हो गया, तो विदेशी कम्पनियाँ सुप्रीम-कोर्ट में अपने एजेंट जजों द्वारा उस कानून को रद्द करवा सकती हैं | इसीलिए केवल कुछ गिने-चुने लोग ही शक्तिशाली विदेशी कंपनियों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि आज विदेशी कंपनियों का अधिकतर मीडिया और न्यायपालिका पर प्रभाव है |

       अकेले, बिना किसी समूह में, प्रभावशाली तरीकों का उपयोग करके महीने में
15-20 घंटे काम करने वाले, केवल 2-4 लाखों कार्यकर्ता और कुछ करोड़ आम-नागरिक चाहिए देश के लिए अच्छे कानून-प्रक्रियाओं पर जन-आन्दोलन खड़ा करने के लिए और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को मजबूर करने के लिए कि वे इन कानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें | मैं श्रोताओं से विनती करूँगा कि वे अध्ययन करें कि कैसे बदलाव आये थे असली, सफल जन-अन्दोलान के द्वारा, जैसे भारतीय नौसेना विद्रोह, 1946 , आपातकाल जन-आन्दोलन, 1977 आदि |   

16.1 आपातकाल जन-आन्दोलन -

http://en.wikipedia.org/wiki/The_Emergency_%28India%29

http://www.facebook.com/notes/right-to-recall-against-corruption/0152-common-citizens-mass-movement-against-emergency-india-1977/491139864238353

16.2  ारतीय नौसेना विद्रोह के लिंक -

a) RIN mutiny gave a jolt to the British-

http://www.tribuneindia.com/2006/20060212/spectrum/main2.htm

b) http://en.wikipedia.org/wiki/Royal_Indian_Navy_Mutiny

अन्य विस्तृत लिंक इस विषय पर -

c) RIN 1946 - Book by victimized RIN Ratings, Oct 1954 (Part)

https://docs.google.com/open?id=0B7R8KcZtJUs3TlVTTlhfeVliWjA

d) THE RIN strike by a group of victimized R.I.N. Ratings (1954) (Full)

https://docs.google.com/file/d/0B7R8KcZtJUs3LUxiRVdnczJza1E/edit?pli=1

(Google Docs, 20 MB)

e) RIN : 1946 (References and guide for all) by Biswanath Bose

 https://docs.google.com/file/d/0B7R8KcZtJUs3XzFkd0VTN1B5ODA/edit

(Google docs, 48 MB)

f) INDIAN NAVY REVOLTED AGAINST BRITAIN IN 1946 AND FORCED IT TO GIVE FREEDOM TO INDIA IN 1947-

http://oldphotosbombay.blogspot.in/2008/07/indian-naval-mutiny-of-1946-against.html

http://howindiagotfreedom.blogspot.in/2011/04/how-india-got-freedom-real-story.html

 

17) कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए ?

     कार्यकर्ताओं को अब क़ानून-ड्राफ्ट (कानून का नक्शा) और प्रक्रियाओं पर ध्यान देना चाहिए , जो देश की बड़ी समस्यों को हल करेंगे बजाय कि कोर्ट ड्रामा के या नेताओं और बुद्धिजीवियों को अंधे होकर मानना |

उनको लोकतान्त्रिक तरीके अपनाने चाहिए, देश के लिए अच्छे प्रक्रियाएँ और देश में व्यवस्था परिवर्तन लाने के लिए --- विज्ञापन / पर्चे द्वारा समाधान क़ानून-ड्राफ्ट जन-समूह को बताना चाहिए |

ये लोकतान्त्रिक तरीके हैं देश के लिए अच्छे प्रक्रियाएँ लाने के लिए , जो सफल होंगी यदि कार्यकर्ता इसमें भाग लें तो | गैर-लोकतान्त्रिक तरीके जैसे अपने प्रिय नेता के नारे लगाना, भाषणबाजी , बंद दरवाजों के पीछे चर्चा, किसी नेता के लिए चुनावी प्रचार करना, अनशन, मोमबत्ती रैली, आदि., से देश और व्यवस्था में कोई भी सकारात्मक परिवर्तन नहीं आएगा | 

इन तरीकों में जनसमूह सक्रिय रूप से शामिल होता है, जो देश में बराबर के हिस्सेदार और इसीलिए ये लोकतान्त्रिक तरीके शक्तिशाली और सफल होते हैं | दूसरी ओर, वो तरीके जिनके द्वारा जनसमूह नहीं, कुछ ही लोग सक्रीय रूप से शामिल होते हैं, वे कमजोर और गैर-लोकतान्त्रिक हैं और व्यवस्था में कोई सकारात्मक परिवर्तन लाने में विफल हो जाते हैं |

ये जन-हित कानून-प्रक्रियाएँ भारतीय राजपत्र में डाली जाएँगी उससे पहले ही, जब जन-समूह को देश के ज्वलंत समस्याओं के समाधान क़ानून-प्रक्रियाओं के बारे में पता चलेगा जैसे पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली, राईट टू रिकॉल-प्रधानमंत्री, राईट टू रिकॉल-जज, राईट टू रिकॉल-पोलिस अध्यक्ष, आदि , नेता, जज, पोलिस डरेंगे कि अब लोगों को इन प्रक्रियाओं के बारे में पता चल गया है और अब यदि उन्होंने अपना काम सही से नहीं किया, तो करोड़ों लोग इन प्रक्रियाओं की मांग करेंगे, जिससे जनता की राय नहीं दबेगी और आम-नागरिक भ्रष्ट को बदल सकते हैं, सज़ा दे सकते हैं |

दूसरे शब्दों में, इन कानून-प्रक्रियाओं के आने का डर भी प्रभावशाली है और जनता के नौकरों को सुधर जाने के लिए मजबूर करेगा |

     आम-नागरिकों को केवल उन नेताओं या बुद्धिजीवियों का समर्थन करना चाहिए जिनके घोषणा-पत्र या वेबसाइट पर अच्छे प्रक्रियाएँ हों जिससे देश की बड़ी समस्यों का हल हो सके , ना कि उन नेताओं/बुद्धिजीवियों का समर्थन करें जो केवल बिके हुए मीडिया द्वारा प्रचार किये गए भाषण देते हैं | और ये सभी आम-नागरिकों का कर्तव्य है कि ऐसे नेताओं और बुद्धिजीवियों की पोल खोलें जो कार्यकर्ताओं को झूठ बोलें और उनको ऐसे समय बरबाद करने वाले कार्य जैसे कोर्ट ड्रामा में लगाये और असली समाधान जैसे भ्रष्ट को बदलने के आम-नागरिकों के लिए प्रक्रियाएँ और अन्य जनहित के क़ानून-ड्राफ्ट से भटकाएँ |    

18)  देश के मीर जाफरों और ओमी-चंद को सन्देश

मीर जाफर और ओमिचंद कौन थे ?

विस्तृत जानकारी के लिए कृपया विवरण में लिंक देखें |

संक्षिप्त में, मीर जाफर सिराज-उद-दौला का सेना पति था और ओमी-चंद एक व्यापारी था,  जो सरकार और बड़े व्यापारियों को सूद पर पैसा देता था |  सिराज-उद-दौला बंगाल का नवाब था 18 वी शताब्दी में | मीर जफ़र और ओमी-चंद ने देश और देश के लोगों के साथ गद्दारी की और ये सोचा कि हम और हमारे परिवारों को कुछ नहीं होगा |

लेकिन अंग्रेजों ने उनको ही धोखा दे दिया | अंग्रेज मीर जाफर से ज्यादा चतुर और शक्तिशाली थे और ओमिचंद से ज्यादा होशियार | मीर जाफर और उसके परिवार को अंग्रेजों ने मार दिया और सूद देने वाले व्यापारी, ओमी-चंद को अंग्रेजों ने धोखा दे दिया और वो पागल हो गया |

संक्षिप्त में, गद्दारी करने वालों ने  खुद ही अंग्रेजों द्वारा धोखा खाया |

आज भी मीर जाफर हैं और आज भी ओमी-चंद हैं देश में, जो सोचते हैं कि वे देश के लोगों के साथ गद्दारी करके भ्रष्ट विदेशी कंपनियों का साथ देंगे और उन्हें या उनके परिवार-जन को कुछ नहीं होगा | मैं उनसे विनिम्र विनती करता हूँ कि कुछ इतिहास से सीखें |  देश तो बरबाद होगा, आप और आप के प्रियजन को भी भ्रष्ट विदेशी कम्पनियाँ छोडेंगी नहीं, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में हों |  और दूसरे नागरिक कृपया ऐसे गद्दार लोगों को (उनको कोई भी नाम दिए बिना) एक बार जरूर समझाएं  कि वे सुधर जायें, उसी में उनका भला है |

और साथ ही देश के भलाई के लिए जन हित प्रक्रियों का प्रचार करें |

 

19) आप आम-नागरिक कैसे निर्णय करेंगे कि कौन से नेता या बुद्धिजीवी को समर्थन करें और किस का विरो?

 

समर्थन करेंगे उन व्यक्तियों का , अंधे हो कर जिन्हें बिके हुए , जांचे न जा सकने वाले समाचार बढ़ावा देते हैं और जो केवल भाषण देते हैं और बिकी हुई मीडिया में खाली वायदे करते हैं , कोई भी कार्य नहीं करते 

या
समर्थन करेंगे उन व्यकियों का , जिन्होंने अपने घोषणा-पत्र में या वेबसाइट पर ऐसी प्रक्रियाएँ डाली हैं जो देश की बड़ी समस्याएं को हल कर सकें और जो आम-नागरिकों को उनके बुनियादी अधिकार दे सकें जैसे पारदर्शी शिकायत/ प्रस्ताव प्रणाली, भ्रष्ट को बदलने के तरीके, जूरी सिस्टम, सेना और नागरिकों के लिए खनिज आमदनी , सरल , बिना कोर्ट-कचहरी के चक्करों के, चुनाव यंत्रों की धांधली रोकने का तरीका , आदि |
(ऐसे प्रक्रियाओं को
www.righttorecall.info/301.h.pdf  में देखें)

 

विरोध करेंगे उन व्यक्तियों का , जो यूरिया वाले दूध को बेचते हैं , यानी जनसमूह को बेकार समय-बरबाद करने वाले तरीके बताते हैं जैसे कोर्ट ड्रामा, लोकपाल ड्रामा, मोमबत्ती वाले प्रदर्शन, पहले से निश्चित परिणाम वाले अनशन , विरोधी पार्टियों या नेताओं के खिलाफ नारे लगाना, चरित्र निर्माण, बिना ड्राफ्ट के चर्चा, आदि ., जो देश के बड़ी-बड़ी समस्यों का हल नहीं करेंगे | 

या
विरोध करेंगे उन व्यक्तियों का , जो शुद्ध दूध बेचते हैं, यानी अच्छे प्रक्रियाएँ जो आम-नागरिकों को लाभ करें और उनके अधिकार दें और जो उनकी पोल खोलें जो नकली यूरिया वाला दूध शुद्ध दूध बताकर बेचते हैं |

आप निर्णय करें |