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सिर्फ तीन लाइन का कानून, कुछ ही महीनों में

गरीबी और भष्टाचार कम कर सकता है

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-------स्वामी दयानंद सरस्वती(स्वामी रामदेव जी के गुरु) द्वारा कृत सत्यार्थ प्रकाश छटवां अध्याय , शतपथ कांड १३, (प्रपाटक २),ब्राह्मण ३.

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1.  `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) के प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को इस क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए पत्र

 

मैंने सिर्फ 3 लाईन के एक कानून की मांग की है। इस कानून को मैं `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कहता हूँ। इस कानून को पारित करने के लिए मात्र पधानमंत्री या मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर चाहिए। यह प्रस्तावित `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कानून मात्र 3-4 महीने में गरीबी कम कर सकता है; शिक्षण की कीमत कम कर सकता है, पुलिस आदि में भ्रष्टाचार नहीं के बराबर कर सकता, और सेना मजबूत कर सकता है

 

मांग किये गये इस `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) सरकारी आदेश का सार है :-

1.      यदि नागरिक चाहे तो अपनी फरियाद 20 रूपये हर पेज देकर कलेक्टर की कचहरी जाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर रखवा सकेगा।

2.      यदि नागरिक चाहे तो 3 रुपये का शुल्क देकर फरियाद पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकेगा।

3.      हाँ/ना पधानमंत्री पर अनिवार्य नहीं है।

सम्पूर्ण ड्राफ्ट

 

अधिकारी

प्रक्रिया

1.

कलेक्टर (और उसके क्लर्क)

कोई भी महिला, दलित मतदाता, गरीब मतदाता, वृद्ध (बूढ़ा) मतदाता, मजदुर मतदाता, किसान मतदाता या कोई भी नागरिक मतदाता यदि खुद हाजिर होकर यदि अपनी सूचना अधिकार का आवेदन अर्जी या भ्रस्टाचार के खिलाफ फरियाद या कोई भी हलफ़नामा / एफिडेविट कलेक्टर को देता है तो कोई भी दलील दिये बिना कलेक्टर ( या उसका क्लर्क ) उस हलफ़नामा / एफिडेविट को प्रति पेज 20 रूपये का लेकर सीरियल नंबर दे कर पधानमंत्री वेबसाइट पर रखेगा।

2.

पटवारी (तलाटी लेखपाल)

कोई भी महिला मतदाता, दलित मतदाता या कोई भी मतदाता यदि धारा-1 द्धारा दी गई अर्जी या फरियाद या हलफ़नामा / एफिडेविट पर आपनी हाँ या ना दर्ज कराने मतदाता कार्ड लेकर आये, 3 रुपये का शुल्क(फीस) लेकर पटवारी नागरिक का मतदाता संख्या, नाम, उसकी हाँ या ना को कंप्यूटर में दर्ज करेगा। नागरिक की हाँ या ना प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर आएगी। पटवारी नागरिक की हाँ या ना 3 रूपये देकर बदलेगा। गरीबी रेखा नीचे के नागरिको से शुल्क 1 रूपये का होगा।

3.

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ये कोई रेफेरेनडम/जनमत-संग्रह नहीं है.यह हाँ या ना अधिकारी, मंत्री, न्याधीश, सांसद, विधायक, अदि पर अनिवार्य नही होगी। लेकिन यदि भारत के 37 करोड़ मतदाता, वृद्ध(बूढ़ा) मतदाता या कोई भी 37 करोड़ नागरिक मतदाता कोई एक अर्जी, फरियाद पर हाँ दर्ज करे तो पधानमंत्री उस फरियाद, अर्जी पर ध्यान दे सकते हे या नही दे सकते, या इस्तीफा दे सकते हें । उनका निर्णय अंतिम होगा।

 

आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय,

कृपया ऊपर लिखित सरकारी अधिसूचना पर अगले 21 दिनों के भीतर हस्‍ताक्षर करें |

आपका विश्‍वासभाजन,

 

नाम:...............................

पता:.............................................................

वोटर आई कार्ड/मतदाता पहचान-पत्र:.........................

(कृपया वोटर आई कार्ड की कॉपी साथ लगाएं )

इसी तरह मुख्यमंत्री, महापौ/मेयेर,जिला पंचायत अध्यक्ष, हाई-कोर्ट के जज, और बुद्धिजीवियों को भी पत्र लिख सकते हैं |

 

2. `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) का क्या मतलब है और ये कैसे काम करेगा ?

 

ये पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) ये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत/प्रस्ताव हमेशा देखी जा सकती है और जाँची जा सकती है कभी भी ,कहीं भी, किसी के भी द्वारा ताकि शिकायत को कोई नेत्ता, कोई बाबू(लोकपाल आदि) ,कोई जज या मीडिया न दबा सके | अब मान लीजिए के प्रधान मंत्री ने इसपर हस्ताक्षर कर दिए हैं, और पहले वाले उदहारण के अनुसार यदि आप के यहाँ का मंत्री भ्रष्ट है , तो आप या कोई भी ,किसी भी कलेक्टर के दफ्तर जा कर मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकता है और उसे हटाने के लिए भी लिख सकता है | इस शिकायत को कलेक्टर या उसका क्लेर्क स्कैन कर लेगा और प्रधान मंत्री के वेब-साईट पर डाल देगा | अब क्योंकि इस शिकायत का एक-एक शब्द दुनिया के लाखों-करोड़ों लोग देख सकते हैं, कभी भी, इसीलिए इस शिकायत को जरा भी छेड-छाड नहीं किया जा सकता है बिना लाखों लोगों को पता लगे | और इसके समर्थन में व्यक्ति को कलेक्टर के दफ्तर नहीं जाना है, केवल अपने पास के पटवारी या तलाटी , जो भूमि का रिकॉर्ड रखता है और कलेक्टर के द्वारा ही रखा गया होता है, के पास जाना है और अपना वोटर आई.डी. के जानकारी आर अंगुली की छाप देगा और वो भी वेब-साईट पर आ जायेगी | इस तरह कोई भी ये नहीं कह सकता कि समर्थक जाली हैं| उल्टा जो व्यक्ति या मीडिया इस को नहीं उठाएगा , उसकी भरोसा कम हो जायेगी

इसिलिए मीडिया वाले भी उठाएंगे और देश भर में लोग जान जाएँगे कि इस मंत्री के खिलाफ लाखों लोगों की शिकायत है और संभव है कि और लोग भी इसका फिर पटवारी के दफ्तर जा कर इस शिकायत के साथ नाम जोड़ें| और ये लाखों लोग शिकायत करने के बाद ऐसे ही नहीं बैठे रहेंगे, वो अपने स्थान के विधायक,सांसद, आदि लोगों पर दबाव डालेंगे कि देखो, लाखों लोग बोल रहे हैं कि इस भ्रष्ट मंत्री को निकालो, तो फिर ये दबाव उन सांसदों और उन सांसदों द्वारा प्रधान-मंत्री पर भी आएगा| सांसद प्रधान-मंत्री को बोलेंगे कि हमारी लोकप्रियता दिनों दिन कम होती जा रही है| ऐसा ना हो कि हम अगले चुनाव तक बिलकुल ही जीरो हो जाएँ या उससे पहले भी लोगों का गुस्सा हमें झेलना पड़े, इसीलिए आप ये मंत्री पर कार्यवाई करें | इस प्रकार जनता के दबाव से ये प्रक्रिया काम करेगी और लाखोंकरोड़ों लोगों की शिकायत या प्रस्ताव को सरकार को सुनना होगा |

 

3.  क्या, सिर्फ इतना ही?

हाँ, सिर्फ इतना ही। अब सवाल आता है कि क्या मात्र फरियाद और हाँ/ना प्रधानमत्री के वेबसाईट पर आने करने से गरीबी, पुलिस का भ्रष्टाचार, अदालतों का भाईभतिजावाद आदि समस्याओ का हल आ जायेगा? इस चार पेज के लेख में मेनें समझने का प्रयास किया है। वाचक के मन में अनेक प्रश्न आ सकते है, जिनमें से अनेक का जवाब अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (www.righttorecall.info/004.h.pdf) पर दिया है । और वाचक को जवाब न मिले, तो मिलकर या http://forum.righttorecall.info / पर सवाल रखने की विनती है ।

 

4.  क्या प्रत्येक नागरिक के पास इन्टरनेट होना आवयश्क है?

यह सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला गलत सवाल है। मैं इसे गलत सवाल इसलिए कहता हूँ क्योकि `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) में मतदाता के पास इन्टरनेट होना कोई आवश्यक नही है। उनके पास इन्टरनेट हो या न हो, उन्हें कलेक्टर या पटवारी की कचहरी में जाना आवश्यक है । यानि इस कानून के लिए इन्टरनेट की आवश्यकता नही है।

 

5.  `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) से गरीबी कैसे कम होगी?

 

जिस दिन प्रधानमंत्री `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) पर हस्ताक्षर करेंगे, उसी दिन में करीब 200 हलफ़नामा / एफिडेविट वेबसाईट पर दर्ज करूँगा। उनमें से प्रथम हलफ़नामा / एफिडेविट होगी `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) इस सात पेज की एफिडेविट का सम्पूर्ण ड्राफ्ट `जनता की आवाज़ 301`(www.righttorecall.info/301.h.pdf) के अध्याय 5 पर दिया है। यह हलफ़नामा / एफिडेविट एक व्यवस्था का वर्णन है जिसके द्धारा खनिज रोयल्टी और सरकारी जमींन का किराया सीधा नागरिको को मिलेगा। यदि मानो की अक्टुबर-2009 में खनिज रोयल्टी और सरकारी की जमींन का किराया रु 30,000 करोड़ आया। तो रु 20,000 करोड़ सेना के लिय जायेगा ओए हरेक नागरिक के पोस्ट या स्टेट बैंक के खाते में रु 200 जमा हो जायेगा। यदि हर नागरिक महीने में एक बार नगद लेने जाता है तो मात्र 1 लाख क्लर्क चाहिए। आज सरकारी बैंको के पास 6 लाख क्लर्क है । इसका मतलब कि `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` व्यवस्था में कोई बहुत बड़ी परेशानी नही हें।

अब मैं वाचक से एक प्रश्न पूछता हूँ :-

1.   भारत के नागरिक प्रधानमत्री के पास पर `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) हस्ताक्षर कराने में सफल हुए।

2.   किसी ने `सेना और नागरिकों के लिए रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) की हलफ़नामा / एफिडेविट प्रधानमंत्री को वेबसाईट पर रखा।

3.   अब इस एफिडेविट के बारे में भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता को जानकारी कैसे मिलेगी यह में बाद में कहूँगा।

4.   अब आप भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता से आर्थिक स्थिति से नीचे के ५५ करोड़ मतदाता ध्यान में रखना।

 

वाचक को प्रथम सवाल : भारत के कुल 72 करोड़ मतदाता में से आर्थिक में से गरीबी की रेखा से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने लोग यह कहेंगे कि खनिज रोयल्टी(आमदनी) और सरकारी जमीन के किराये से महीने के 300-400 रुपये प्रति व्यक्ति आ सकता है, वह मुझे नही चाहिये, यह सरकार की तिजोरी में ही रहने दो? ऐसा आर्थिक स्थिति से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने यह कहेंगे?

मेरा जवाब है कि 5 प्रतिशत से कम लोग ही ऐसे कहेंगे। यानि `जनता की आवाज़` पर प्रधानमत्री के हस्ताक्षर आने के बाद `एम.आर.सी.एम` की एफिडेविट के बारे में जानने पर सोचेंगे कि इसमें मेरा 3 रुपये के शुल्क में ज्यादा क्या नुक्सान है? अब में आप वाचक से दितीय सवाल पूछता हूँ: `जनता की आवाज़` की दूसरी धारा साफ़ कहती है कि हाँ/ना प्रधानमंत्री पर बंधन करने वाला नही है। लेकिन यदि 72 करोड़ नागरिक मतदाता में से यदि 50-55 करोड़ मतदाता MRCM हलफ़नामा / एफिडेविट पर हाँ दर्ज करते है तो क्या प्रधानमंत्री कि हिम्मत होगी कि वह `एम.आर.सी.एम` हलफ़नामा / एफिडेविट पर हस्ताक्षर करने से मना करे? यदि प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करने से मना करते है तो ये 50-55 करोड़ नागरिक, जिन्हें खनिज रोयाल्टी और सरकार जमीन का किराया चाहिए ये हाथ पर हाथ रखकर बेठे नही रहेंगे। इन मे से 1 प्रतिशत ने भी आन्दोलन आदि किया तो प्रधानमंत्री के लिए सरकार चलाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए प्रधानमंत्री विवश होकर `एम.आर.सी.एम` पर हस्ताक्षर कर देंगे। और 1-2 महीनो में ही नागरिको को खनिज रोयाल्टी मिलनी शुरू हो जायेगी और गरीबी कम हो जायेगी। इस तरह तीन लाइन का `जनता की आवाज़` कानून 3-4 महीने में ही गरीबी कम कर देगा।

 

6.  `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) से पुलिस आदि, में भ्रष्टाचार कैसे कम होगा?

 

वाचक को तीसरा सवाल : अमेरिका की पुलिस में भारत की तुलना में भ्रष्टाचार कम क्यों है?

इसका एक मात्र है - अमेरिका में नागरिक के पास बहुमति के द्धारा उनके जिला पुलिस के कमिश्नर नौकरी से निकालने की राइट टू रिकोल / प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल ) प्रक्रिया है। यह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया (राइट टू रिकोल) एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर रिश्वत कम लेता है और यदि उसे पता चले कि स्टाफ में कास्टेबल या इंस्पेक्टर रिश्वत ले रहा है तो जाल बिछाकर, सबुत इकट्टाकर उन्हें अदालत में ले जाकर नौकरी से निकलवा देता है। और यहा भारत में हम नागरिको के पास जिला पुलिस कमिश्नर को नौकरी से निकलने का तरीका नही है और इसी कारण है कि कमिश्नर नीचे के अघिकारियों को हफ्ता लेने को कहता है वह आधा रख लेता हें और आधा मंत्री को भेज दें। हम अकसर कहते है कि इसका कारण है कि अमेरिका में पुलिस की तनख्वाह ज्यादा है यदि यह एकमात्र कारण होता तो लाख करोड़ कमा कर रिश्वत लेना बंद कर देते, और क्या तनख्वाह ज्यादा करने के बाद भ्रष्टाचार कम हो जायेगा? पुलिस कर्मियों का वेतन बढाना आवश्यक है, परन्तु मात्र वेतन बढाने से भ्रष्टाचार नही घटेगा।

अब में वाचक को चोथा सवाल पूछता हूँ क्या पाठ्यपुस्तिका या अखबार के लेख लिखने वाले बुद्धिजीवी ने यह जानकारी आपको दी थी कि अमेरिका में नागरिको के पास जिला पुलिस कमिश्नर, जिला न्यायाधीश, जिला शिक्षण अधिकारी, विधायक को नौकरी से निकालने कि प्रक्रिया है या नही? क्योकि ये बूद्धिजिवी नही चाहते कि भारत के नागरिको को यह जानकारी मिले कि अमेरिका में राइट टू रिकोल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) है, और राइट टू रिकोल से अमेरिका ने भ्रष्टाचार और उनकी समस्याओं का हल किया हें। बुद्धिजीवी यह जानकारी इसलिए छिपाना चाहते है क्योकि भारत के धनिक राइट टू रिकोल के कानून नही चाहता।

अमेरिका में कुछ 2000 जिले है। करीब-करीब हर जिले में नागरिको के पास कमिश्नर को निकलने की बहूमति आधारित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में नागरिको को अदालत-कहचरी के धक्के खाने कि जरूररत नही, न ही मुख्यमंत्री के आगे अर्जी करनी होती है या हाथ फेलाने पड़ते है। जिले के नागरिको को बहुमति साबित करना होता, और यदि जिला पुलिस कमिश्नर के खिलाफ बहुमत साबित हो जाये, तो फिर कोई अदालत या मुख्यमंत्री कोई भी उसे बचा नही सकता और उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है एवं यह राइट टू रिकोल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर भ्रष्टाचार कम करता है, और इस राइट टू रिकोल की कमी एकमात्र वजह है कि भारत में अधिकतर जिला पुलिस कमिश्नर अपने और मुख्यमंत्री के कलेक्शन एजेन्ट बन गये है।

अब पुलिस के भ्रष्टाचार कि समस्या का अति सरल उपाय है भारत तमाम 700 जिलो में नागरिक पुलिस कमिश्नर बदल सके ऐसी प्रक्रिया बनाना। अनेक संभव तरीकों में से एक तरीका, प्रजा अधीन-जिला पोलिस कमिश्नर अथार्त जिला पुलिस कमिश्नर बदलने की प्रक्रिया मैंने अपने वेबसाइट,www.righttorecall.info पर रखी है। इस ड्राफ्ट पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर आने मात्र पर नागरिको को दूसरे दिन जिले के पुलिस कमिश्नर को बहुमति द्धारा नौकरी से निकलने प्रक्रिया मिल जायगी. और यह प्रक्रिया आने के मात्र 1 महीने में पुलिस का भ्रष्टाचार नही बराबर हो जायेगा। अब मैं वांचक को पाचँवा सवाल पूछता हूँ : क्या भारत के मुख्यमंत्री जिला पुलिस कमिश्नर बदलने की प्रक्रिया ( याने राइट टू रिकोल जिला पुलिस कमिश्नर ) पर खुशी से बिना नागरिको के आन्दोलन या दबाव से हस्ताक्षर करेंगे?

मेरा मानना है नहीं। बिना लोक दबाव या जन-आन्दोलन के भारत का शायद ही कोई मुख्यमंत्री राइट टू रिकोल जिला पुलिस कमिश्नर की प्रक्रिया/तरीके पर हस्ताक्षर देगा। क्योकि यदि बहुमति नागरिको के पास कमिश्नर को निकलने प्रक्रिया है, तो जो कमिश्नर महीने का 1 करोड़ रुपये इकट्टा करता है, वह 1 लाख रूपये पर आ जायेगा। और 1 करोड़ रूपये में से मुख्यमंत्री, ग्रहमंत्री या विधायक को जो रु 50 लाख रूपये मिलते है, वह भी 50,000 रूपये हजार हो जायेगा। इसीलिए यदि कोई नागरिक यदि राइट टू रिकोल कमिश्नर की बर्खास्त लेकर मुख्यमंत्री, विधायक के पास जाता है तो वे सिर्फ गोल-गोल बातें करेंगे लेकिन यदि नागरिक प्रधानमत्री या मुख्यमंत्री को `जनता की आवाज़` पर हस्ताक्षर करने के लिय मजबूर कर देते है, तो उसके बाद अघिकतर नागरिक राइट टू रिकोल कमिश्नर पर अपनी हाँ दर्ज करा देंगे, और जब करोडो नागरिक हाँ दर्ज कराएँगे, तो विवश होकर मुख्यमंत्री को इस प्रक्रिया के ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर करने पडेगे। यह हस्ताक्षर आने के दूसरे दिन नागरिकों को कमिश्नर को निकालने की प्रक्रिया मिलेगी। और

यह राइट टू रिकोल कमिश्नर की प्रक्रिया आने के मात्र 2 महीनो में पुलिस में भ्रष्टाचार नही के बराबर हो जायेगा। और उसके मात्र 2-3 महीनो में और 200 राइट टू रिकोल तरीकों /प्रक्रियाएँ (जेसे नागरिक प्रधानमत्री बदल सके, आरबीआई गवर्नर बदल सके, जिला शिक्षण अधिकारी बदल सके सके, जिला सरकारी वकील बदल सके) आ जाएँगी, और इनसे सबसे इन विभागों में भ्रष्टाचार नही के बराबर हो जायेगा। राइट टू रिकोल के आने से नागरीको को हजारों अधिकारी बदलने की जरुरत नही पड़ेगी। अधिकतर अधिकारी समझदार है और काम करना जानते है। इसलिए 50 प्रतिशत अधिकारी राइट टू रिकोल आने के 15 दिन में काम सुधार देंगे, और जब 1-2 प्रतिशत की नौकरी जायेगी तो अन्य 48 प्रतिशत भी काम सुधार लेंगे और भ्रष्टाचार कम कर देंगे।

सार

इस 4 पेज के लेख में मेनें यह बताने की कोशिश की है कैसे यह मात्र तीन लाइन का `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) का कानून गरीबी और भ्रष्टाचार भी कम कर सकता है। वाचक के मन में कानून की असर-कारकता और विपरीत असर पर सवाल होंगे, जिनके लिए में उन्हें मेरा या अन्य राइट टू रिकोल पार्टी के सदस्य का संपर्क करने के लिए विनती करता हूँ। और यदि आप राइट टू रिकोल के कानून को भारत में लाने में हमारी मदद करना चाहते है, तो आपसे http://www.petitiononline.com/rti2en पर हस्ताक्षर करने की विनती है।

इस कानून का समर्थन करने वाले हम सभी नागरिकों से हम विनती करेंगे कि वे वैसे किसी भी उम्मीदवार को वोट दें जो `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` का समर्थन करता है। और हम नागरिकों से यह भी विनती करते हैं कि वे उस नेता को तंग करने के लिए सभी तरह के विरोध प्रदर्शन करें। और यदि किसी नागरिक को यह विश्वास हो जाता है कि नेता जनता की मांग पर कोई जवाब नहीं देगा तो वे उन सभी तरीकों का इस्तेमाल करने को आज़ाद है जो वह करना चाहता है

 

7) महंगाई का असली कारण क्या है और इसका उपाय क्या है ?

 

सामान्य तौर पर महंगाई तभी बढ़ती है जब रुपये (एम 3) बनाये जाते हैं लोन,आदि के रूप में और भ्रष्ट अमीरों को दिए जाते हैं, जिससे प्रति नागरिक रुपये की मात्रा बढ जाती है और रुपये की कीमत घाट जाती है और दूसरे चीजों की कीमत बढ जाती है जैसे खाद्य पदार्थ / खाना-पीना, तेल आदि | भारतीय रिसर्व बैंक के आंकडो के अनुसार, प्रति नागरिक रुपये की मात्रा (देश में चलन में कुल नोट,सिक्कों और सभी प्रकार के जमा राशि का कुल जोड़ को कुल नागरिकों की संख्या से भाग किया गया ) 1951 में 65 रुपये प्रति नागरिक थी और आज, 2011 में लगभग 50,000 रुपये है प्रति नागरिक |

सब चीजों का दाम सापेक्ष / तुलनात्मक है और मांग और सप्लाई के अनुसार निर्धारित / पक्का होता है |

प्रश्न- रिसर्व-बैंक और अनुसूचित बैंक रुपये क्यों बनाते हैं ?

वे ऐसा अमीर ,भ्रष्ट लोगों के लिए करते हैं | ये सब कुछ भ्रष्ट अमिर आदमी , रिसर्व बैंक गवर्नर और सरकार की मिली-भगत से होता है | मान लीजिए एक अमीर कंपनी एक सरकारी बैंक से 1000 करोड़ रुपयों का कर्ज लेते हैं और वापस 200 करोड़ रुपये चूका देती है और बाकी के 800 करोड़ रुपये ,भ्रष्ट अमीर आदमी , सरकार और रिसर्व-बैंक गवर्नर कंपनी को झूठ-मूठ का दिवालिया घोषित करके आपस में बाँट लेते हैं |

प्रश्न- इसका कोई उपाय है ?

बिलकुल है|

इसके दो उपाय हैं- पहला कि रिसर्व बैंक के गवर्नर और प्रधानमंत्री को निकालने / बदलने का अधिकार आम नागरिकों को होना चाहिए यानी राईट टू रिकाल-रिसर्व बैंक गवर्नर और राईट टू-रिकाल-प्रधानमंत्री |इसका ड्राफ्ट आगे देख सकते हैं |

दूसरा उपाय है कि नए रुपये बनने के लिए कम से कम 51 % नागरिक स्वकृति दें | इसके लिए हमें तीन लाइन क़ानून या `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` को प्रधानमंत्री को हस्ताक्षर करने के लिए कहना होगा |

ये सन्देश कि महंगाई का असल कारण क्या है और इसका समाधान क्या है ,घर-घर तक पहुंचाएं और देश को समृद्ध बनाएँ|

(8) प्रजा अधीन - भारतीय रिजर्व बैंक गवर्नर (आर बी आई) के लिए सरकारी अधिसूचना का क़ानून-ड्राफ्ट

 

नागरिकों को `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) के प्रभावी हो जाने के बाद ही इस परिवर्तन को लाना चाहिए/ करना चाहिए। और `जनता की आवाज़` का प्रयोग करते हुए इस परिवर्तन का सृजन करना चाहिए । उस प्रक्रिया जिसका उपयोग करके हम आम लोग भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर को बदल/हटा सकते हैं, उसका के लिए जरूरी कानून का ड्राफ्ट निम्‍नलिखित है-

 


#

निम्नलिखित के लिए प्रक्रिया

प्रक्रिया / तरिका

1

-

नागरिक शब्‍द का मतलब रजिस्टर्ड वोटर / मतदाता है।

2

जिला कलेक्‍टर

यदि भारत का कोई भी नागरिक भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) का गवर्नर बनना चाहता हो तो वह जिला कलेक्‍टर के समक्ष , कार्यालय स्‍वयं अथवा किसी वकील के जरिए एफिडेविट लेकर जा सकता है। जिला कलेक्‍टर सांसद के चुनाव के लिए जमा की जाने वाली वाली धनराशि के बराबर शुल्‍क/फीस लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर पद के लिए उसकी दावेदारी स्‍वीकार कर लेगा।

3

तलाटी /पटवारी /लेखपाल (अथवा तलाटी का क्‍लर्क)

यदि उस जिले का नागरिक तलाटी/ पटवारी के कार्यालय में स्‍वयं जाकर 3 रूपए का भुगतान करके अधिक से अधिक 5 व्‍यक्‍तियों को भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर के पद के लिए अनुमोदित / स्वीकृत करता है तो तलाटी उसके अनुमोदन / स्वीकृति को कम्‍प्‍युटर में डाल देगा और उसे उसके वोटर आईडी / मतदाता पहचान-पत्र, दिनांक और समय, और जिन व्‍यक्‍तियों के नाम उसने अनुमोदित किए है, उनके नाम, के साथ रसीद देगा।

4

तलाटी

वह तलाटी नागरिकों की पसंद / प्राथमिकता को प्रधानमन्त्री के वेबसाइट पर उनके वोटर आईडी / मतदाता पहचान-पत्र और उसकी प्राथमिकताओं के साथ डाल देगा।

5

तलाटी

यदि कोई नागरिक अपने अनुमोदन / स्वीकृति रद्द करने के लिए आता है तो तलाटी उसके एक या अधिक अनुमोदनों को बिना कोई शुल्‍क लिए बदल देगा।.

6

मंत्रिमंडल सचिव

प्रत्‍येक महीने की पांचवी / 5 तारीख को मंत्रिमंडल सचिव प्रत्‍येक उम्‍मीदवार की अनुमोदन / स्वीकृति की गिनती पिछले महीने की अंतिम तिथि की स्‍थिति के अनुसार प्रकाशित करेगा / छापेगा ।

7

प्रधानमंत्री

यदि किसी उम्‍मीदवार को किसी जिले में सभी दर्ज / रजिस्‍टर्ड मतदाताओं के 51 प्रतिशत से ज्‍यादा नागरिक-मतदाताओं (केवल वे मतदाता ही नहीं जिन्‍होंने अपना अनुमोदन/स्वीकृति फाइल किया है बल्‍कि सभी दर्ज मतदाता) का अनुमोदन/स्वीकृति मिल जाता है तो प्रधानमंत्री ,वर्तमान भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर को हटा सकते हैं या उन्‍हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है और उस सर्वाधिक अनुमोदन/स्वीकृति प्राप्‍त उस उम्‍मीदवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर के रूप में रख(नियुक्‍त) सकते हैं या उन्‍हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री का निर्णय / फैसला अंतिम होगा।

8

जिला कलेक्‍टर

यदि कोई नागरिक इस कानून में कोई बदलाव चाहता है तो वह जिलाधिकारी/डी सी के कार्यालय में जाकर एक एफिडेविट जमा करा सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रूपए प्रति पृष्‍ठ / पेज का शुल्‍क लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।

9

तलाटी (या

पटवारी)

यदि कोई नागरिक इस कानून या इसकी किसी धारा के विरूद्ध अपना विरोध दर्ज कराना चाहे अथवा वह उपर के धारा में प्रस्‍तुत किसी एफिडेविट पर हां नहीं दर्ज कराना चाहे तो वह अपने वोटर आई कार्ड के साथ तलाटी के कार्यालय में आकर 3 रूपए का शुल्‍क देगा। तलाटी हां-नहीं दर्ज कर लेगा और उसे एक रसीद/पावती देगा। यह हां नहीं प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाला जाएगा।

Text Box: कृपया ध्यान दें कि 
1) इसी तरह का क़ानून-ड्राफ्ट ,नागरिकों द्वारा भ्रष्ट जिला शिक्षा-अधिकारी ,भ्रष्ट जिला पोलिस कमिश्नर, भ्रष्ट मुख्यमंत्री, भ्रष्ट प्रधानमंत्री, भ्रष्ट लोकपाल आदि को बदलने के लिए भी बनाया जा सकता है, जो प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर करने पर भारतीय राजपत्र में आ कर लागू हो सकते हैं |
2) भ्रष्ट सांसद, विधायक और सरपंच को भी निकालने का इसी तरह का क़ानून-ड्राफ्ट चाहिए, केवल वर्त्तमान सांसद,विधायक के हटाये जाने के बाद, नए चुनाव होंगे | 
3) इन क़ानून-ड्राफ्ट के साथ `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली भी जोड़ा गया है , जिससे अन्य कोई देश और जनता का हित का क़ानून , करोड़ों नागरिकों की स्वीकृति और दबाव द्वारा आ सकते हैं |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

(9) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के समर्थन से आरक्षण कम करना, `आर्थिक विकल्प / चुनाव` अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के `समर्थन / हाँ` से |

 

मैंने एक सरकारी अधिसूचना का प्रस्‍ताव किया है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के हां द्वारा आरक्षण कम कर देगा। यह प्रणाली/तरीका, जिसका प्रस्‍ताव मैंने किया है, उसे मैंने आर्थिक-विकल्‍प(चुनाव) का नाम दिया है।

अधिक जानकारी के लिए अध्याय 8 देखें www.righttorecall.info/301.h.pdf का |

 

(10) ज्यूरी सिस्टम=प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र

 

पश्चिम के देशों में भारत के मुकाबले में भ्रष्टाचार क्यों कम है ? उसका कारण है कि वहाँ के नागरिको के पास उनके राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी एवंम जजों को नौकरी से निकालने की और उनको सजा देने की प्रक्रिया / तरीका है और उनको यह करने के लिए जजों के सामने गिडगिडाना या अनुरोध नहीं करना पड़ता |

इस नागरिकों द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया / तरीके को राईट टू रिकोल कहते हैं और इस क्रम-रहित तरीके (बिना लाइन के ) चुने गए नागरिकों द्वारा सजा देने की प्रक्रिया / तरीके को ज्यूरी सिस्टम कहते हैं | मतलब की वहाँ के राजनेता, मंत्री, सरकारी कर्मचारी एवंम जजों के सर के ऊपर दो लटकती तलवार रेहती है कि अगर में ठीक से काम नही करूँगा तो मुझे नागरिक नौकरी में से निकाल देंगे और अगर मैं भ्रष्टाचार करूँगा तो नौकरी में से निकाल देंगे और नौकरी में से निकलने के बाद मुझे सजा भी 15-20 दिन में देंगे|

अभी हम भारत का देखें तो हमें जजों, सी.बी.आई और पुलिस पर निर्भर रेहना पड़ता है | हम अपने आप राजनेता, मंत्री , सरकारी कर्मचारी, जजों को काम से या नौकरी से निकाल नहीं सकते और उनको सजा 15-20 दिन में नहीं दे सकते |

अधिक जानकारी के लिए अध्याय 7,21 देखें www.righttorecall.info/301.h.pdf का |

 

(11) प्रिय नागरिक, कृपया राइट टू रिकॉल-लोकपाल ,नागरिकों द्वारा(प्रजा अधीन-लोकपाल) के धाराओं के साथ वाला जनलोकपाल / लोकपाल बिल का समर्थन करें

 

बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल,नागरिकों द्वारा और पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) के , लोकपाल उन शिकायतों को दबा सकता है जो लाखों करोड़ों की है और ईमानदार अफसर और छोटे-माध्यम व्यापारियों को बरबाद कर सकता है | और विदेशी कंपनियों से रिश्वत लेकर , गुप्त विदेशी खातों में जमा कर देगा , जिससे कोई सबूत भी नहीं होगा उसके खिलाफ ,और विदेशी कंपनियों का एजेंट बन कर, लोकपाल, मंत्री आदि मिलकर पुरे देश को बेच सकते हैं , विदेशी कंपनियों के हाथ | देश गुलाम हो जायेगा और देश के 99 % लोग लूट लिए जाएँगे | ऐसे क़ानून का क्या आप समर्थन करेंगे ?
अधिक जानकारी के लिए
www.righttorecall.info/406.pdf देखें |

(12).`प्रजा अधीन-राजा`/`राईट टू रिकाल`(भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) के विरोधी , नकली `प्रजा अधीन-राजा`-समर्थक के लक्षण / चिन्ह

कृपया ध्यान दें कि अभी `राईट टू रिकाल`/`प्रजा अधीन-राजा` नाम लोगों में बढ़ता जा रहा है | और नेताओं पर, अपने कार्यकर्ताओं द्वारा दबाव पड़ रहा है , `राईट टू रिकाल , नागरिकों द्वारा ` के बारे में बात करने के लिए | इसीलिए , नेताओं को अब मजबूरी से `प्रजा अधीन-राजा`/`राईट टू रिकाल, नागरिकों द्वारा` के बारे में बात करने पर मजबूर हो जाते हैं | लेकिन `आम-नागरिक`-विरोधी लोग असल में `भ्रष्ट को नागरिक द्वारा बदलने/सज़ा देने के तरीके/प्रक्रियाएँ`(राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन राजा) नहीं चाहते |
65 सालों से , लोग ऐसी प्रक्रियाएँ/तरीके मांग रहे हैं , जिसके द्वारा आम नागरिक भ्रष्ट को बदल सकते हैं /सज़ा दे सकते हैं और पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) की भी मांग कर रहे हैं ,लेकिन इस मांग को दबाया जा रहा है .`प्रजा अधीन-राजा` के विरोधियों द्वारा |

उसके लिए वे कुछ तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उन में से कुछ की लिस्ट यहाँ नीचे है-

1) वे अपने कार्यकर्ताओं को क़ानून-ड्राफ्ट(नक्शा) की बात करने के लिए भी मना करते हैं, क़ानून-ड्राफ्ट(नक्शा)
को पढ़ने के लिए भी मना करते हैं, क़ानून-ड्राफ्ट(नक्शा) लिखना तो दूर की बात है | वे अक्सर `हवा में`,
यानी बिना क़ानून-ड्राफ्ट के बात करते हैं ताकि अच्छे ड्राफ्ट पास ना हो सके |
2) वे हमेशा कहते हैं कि वे `प्रजा अधीन-राजा`/`राईट टू रिकाल` का समर्थन करते हैं लेकिन कभी भी नहीं
बताते कि कौन से पद के लिए वे `प्रजा अधीन राजा` का समर्थन करते हैं ? वे छोटे पदों के लिए अभी
`प्रजा अधीन-राजा`/राईट टू रिकाल लाना चाहेंगे और ऊपर के पदों जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकपाल,
आदि के लिए अगले जन्म में राईट टू रिकाल लाना चाहेंगे ,ताकि बड़े पद वाले लोग विदेशी कंपनियों के
एजेंट बन कर देश को विदेशी देशों/कंपनियों के हाथ बेच सकें |
3) `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी कहेंगे कि कि एक नेता को समर्थन करो, जो क़ानून-ड्राफ्ट को लागू कराएगा 4) `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी कहते हैं कि वे `प्रजा अधीन-राजा` को समर्थन करते हैं, लेकिन कभी भी
उसको समर्थन करने या उसके क़ानून-ड्राफ्ट लागू करवाने के लिए कुछ भी नहीं करते |
5) `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी / नकली `प्रजा अधीन-राजा`-समर्थक घंटो-घंटो देश की समस्याओं पर बात
करेंगे , लेकिन एक मिनट भी समाधान पर बात नहीं करेंगे और कभी भी वे क़ानून-ड्राफ्ट नहीं देते जो
गरीबी, भ्रष्टाचार आदि कम करेंगे | वे कुछ प्रस्ताव जरुर दे सकते हैं |
6) `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी बहुत बार ये दावा करते हैं कि `भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने`की
परक्रियें/तरीके संभव नहीं हैं या संविधान के खिलाफ हैं |

क़ानून-ड्राफ्ट को पढ़ना और लिखना वकीलों का काम नहीं है, ना ही जजों का , ना ही सांसदों का , लेकिन नागरिकों का काम है !! जी हाँ, आप नागरिकों को क़ानून-ड्राफ्ट सांसदों को देना होता है, जो तब क़ानून-ड्राफ्ट पास करवाते हैं सांसद में | वकीलों का काम क़ानून-ड्राफ्ट (नक्शा) बनाना नहीं है, उनका काम मामले लड़ना है, जजों का कम क़ानून बनाना नहीं, उनका काम फैसले देना है |
इन राईट टू रिकाल / `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधियों के साथ `हवा में `चर्चा करने से बचें और हमेशा उनसे कहें कि किस ड्राफ्ट और धाराओं की बात कर रहे हैं, वे पहले बताएं | उनसे कहें कि बताएं , कौन सी धाराएं संभव नहीं हैं और संविधान के कौन सी धारा के खिलाफ है और कैसे , आज के लागू क़ानून से तुलना करते हुए बताएं | और उनसे पूछें की कौन से क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं और कौन से ड्राफ्ट का विरोध,अपना रुख साफ़ करें | यदि वे कहते हैं कि प्रजा अधीन-राजा की प्रक्रियाएँ / तरीकों का समर्थन करते हैं , तो उनसे पूछें कि वे और उनके नेता क्या कर रहे हैं, उनको लागू करने के लिए | क्या वे अपने और साथियों को इनके बारे में बता रहे हैं, कोई प्रचार कर रहे हैं या अपने घोषणा-पत्र या अपने क़ानून-ड्राफ्ट में जोड़ा है | यदि नहीं, तो ये नकली `प्रजा अधीन-राजा` समर्थक हैं | ऐसे लोगों के साथ अपना समय व्यर्थ ना करके अन्य नागरिकों को ये प्रक्राएं / क़ानून-ड्राफ्ट बताने में समय लगाएं |

यदि कुछ लाख लोग भी अपना महीने का
10 घंटा दें इन जन-हित के प्रक्रियाओं को बताने के लिए , तो कुछ ही महीनों में , ये पूरे देश-वासियों को पता चल जायेगा | पता चलने पर करोड़ों लोग इसकी मांग करेंगे और प्रधान-मंत्री को इन जन-हित की प्रक्रियाओं पर हस्ताक्षर करना पड़ेगा |