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यह लेख २ भाषा में हे | पेहले हमने हिंदी में शुचना दी ये और बाद में अंग्रेजी में भी अनुवाद हे |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय 32 - `जनता द्वारा राईट टू रिकाल-लोकपाल` - लोकपाल / जनलोकपाल को विदेशी कंपनियों के एजेंट बनने से रोकने के लिए जरूरी है `भ्रष्ट लोकपाल / जनलोकपाल को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार`

 

स्वामी दयानद सरस्वती जी ने अपनी पुस्तक `सत्यार्थप्रकाश` के अध्याय 6 के पहले पन्ने में कहा है कि “राजा प्रजा-अधीन होना चाहिय और यदि राजवर्ग प्रजा-अधीन नहीं होगा , तो जैसे माँसाहारी पशु दूसरे छोटे पशुओं को खा जाते हैं, उसी तरह राजवर्ग नागरिकों को लूट लेगा और देश को बरबाद कर देगा “ |

 

यहाँ `राजवर्ग` का अर्थ प्रशासन करने वाले , यानी मंत्री,जज और अफसर हैं | और `अधीन` का अर्थ मंत्रियों, जजों और अफसरों को बदलना/सज़ा देना है |

 

ये लोकपाल के लिए भी लागू होता है | यदि लोकपाल प्रजाधीन नहीं है, तब लोकपाल धन-लोकपाल हो जायेगा, यानी रिश्वत लेकर भ्रष्ट हो जायेगा | विदेशी कंपनियों से रिश्वत लेकर विदेशी बैंक में पैसा रखेगा, और उसे कभी भी सज़ा नहीं होगी क्योंकि विदेशी बैंक, बैंक खाते के रिकोर्ड नहीं देते और कोई सबूत नहीं होगा लोकपाल के खिलाफ | इसके बावजूद, अन्ना और `इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्शन ` के सबसे बड़े नेताओं का अभी तक कोई  आशावादी जवाब नहीं आया है `प्रजा अधीन-लोकपाल` और पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) के खंड/धाराओं पर |

 

(32.1) माननीय अन्ना जी, कृपया पारदर्शी शिकायत/सुझाव प्रणाली के खंड/धारा और राइट टू रिकॉल लोकपाल खंड/धारा को जनलोकपाल बिल में जोड़े

 

वंदे मातरम |
    
मैं अन्ना जी से निवेदन करता हूँ की वे इन खंडों को सम्मिलित करें क्योंकी वे सरकार के द्वारा नियुक्त  लोकपाल ड्राफ्ट समिति के सदस्य थे और सरकार से बातचीत कर रहे हैं (अगस्त 24,2011 की तारीख को) I मेरे विचार से, इन खण्डों से पारदर्शिता बढ़ेगी और लोकपाल के भ्रष्ट और तानाशाही होने की सम्भावना को कम करेगी Iअधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) इन प्रस्तावित ड्राफ्ट पर www.righttorecall.info/004.h.pdf में दिए गए हैं  | इस लेख्य पत्र को लोकपाल परामर्श  वेबसाइट पर प्रस्तुत किया गया है जिसका सिरिअल नम्बर है- #A247LB I यदि आपको सुझाव अच्छे लगे जो यहाँ दिए गए हैं, अच्छे लगें , तो कृपया इसे (#A247LB) अन्नाजी को भेजिए |

 

1) मैं सबसे निवेदन करता हूँ की निम्नलिखित सन्देश को लोकपाल परामर्श साईट पर पोस्ट करे या अन्नाजी को पोस्टकार्ड लिखें-
माननीय अन्नाजी,
                         
मेरी 3 विनती है आपसे –   

1. कृपया नागरिकों को देखने दीजिए जो सुझाव दिए जा रहा हैं, ड्राफ्ट कमिटी के वेबसाइट पर और उन सुझावों पर  अन्य लोगों अपने कमेन्ट डाल सकें , ऐसी व्यवस्था करें |
2.
कृपया वे खंड/धारा जोड़े लोकपाल बिल में ,जिससे यह सुनिश्चित हो कि नागरिक एक एफिडेविट लोकपाल के वेबसाइट पर रख सकें और अन्य नागरिक अपना नाम उसके साथ जोड़ सकें, उस एफिडेविट का समर्थन करने के लिए  I
3. कृपया राइट टू रिकॉल खंड/धारा को आज ही जोड़े ,अगले जन्म में नहीं I बिना राइट टू रिकॉल जन लोकपाल संभव है कि वो धन लोकपाल बन जाएगा I नागरिकों कों 10 लोकपाल सदस्य और एक लोकपाल अध्यक्ष में से एक को के द्वारा बदलने का अधिकार हो I
नमस्कार, _________________________(अपना नाम)

 

(32.2) तीन पारदर्शी शिकायत/सुझाव प्रणाली के खंड/धारा

 

निम्नलिखित खंड/धारा जोड़े जाने के लिए प्रस्तावित हैं लोकपाल बिल में, शिकायत/सुझाव प्रणाली में पारदर्शिता देने के लिए |

 

धारा–NN : पारदर्शी शिकायत/सुझाव प्रणाली के खंड/धारा

खंड/धारा # -(अधिकारी जिसके लिए निर्देश है)

प्रक्रिया/पद्धति

 

खंड/धारा 1- (कलेक्टर(या उसके द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट) को निर्देश)

राष्ट्रपति के द्वारा यह आदेश दिया जाता है कि : यदि कोई दलित वोटर या वरिष्ठ वोटर या गरीब वोटर या किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर उनके जिला में यदि कोई शिकायत देना चाहता है लोकपाल को ,तो वह कलेक्टर (या उसके द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट) को शिकायत वेबसाइट पर रखने की विनती करेगा| कलेक्टर या उसका द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट एक सीरियल नंबर/क्रमांक संख्या देकर वह एफिडेविट लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा  रु. 20 प्रति पन्ना लेकर I एफिडेविट को कार्यकारी मेजिस्ट्रेट के मुहर लगाने से पहले ही तैयार कर लेना पड़ेगा जो की रु. 20 में लिया जाएगा और दो साक्षी द्वारा हस्ताक्षर किये गए हों I शिकायत करने वाला और दोनों साक्षीयो के पास मतदाता पहचान पत्र होना अनिवार्य है I

 

खंड/धारा 2- (तलाटी/पटवारी/गांव के अधिकारी/लेखपाल (या उसका क्लर्क) को निर्देश)

राष्ट्रपति पटवारी को यह आदेश देता है की :

(2.1) यदि कोई दलित वोटर या वरिष्ठ वोटर या गरीब वोटर या किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर अपने मतदाता पहचान पत्र के साथ आता है और स्पष्ट रूप से किसी शिकायत ,जो लोकपाल के वेबसाइट पर दर्ज है ,पर अपना हाँ/ना करवाना चाहता है, तो पटवारी उसका हाँ/ना दर्ज करेगा लोकपाल के वेबसाइट पर ,उस नागरिक के मतदान पहचान पत्र/वोटर ID के साथ और उससे 3 रुपये की फी/शुल्क लेकर रसीद देगा  I

(2.2) नागरिक अपने हाँ/ना को बदल भी सकता है पटवारी को रु. 3 की फी देकर  I

(2.3) `गरीबी के नीचे रेखा`(बी.पी.एल) कार्ड धारक के लिए यह फी/शुल्क रु 1. होगी I

 

खंड/धारा 3-( प्रत्येक नागरिक, लोकपाल)

 

यह खंड/धारा केवल पारदर्शी शिकायत प्रणाली के लिए ही है Iयह मत-संग्रह/रेफेरेंडम नहीं है I हाँ/ना लोकपाल इत्यादि पर बंधनकारी/बाध्य नहीं है I यदि  “एक निश्चित संख्या” से ज्यादा महिला वोटर, दलित वोटर ,वरिष्ठ नागरिक वोटर, गरीब वोटर, किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर `हाँ`  दर्ज करवाते हैं किसी दी गयी एफिडेविट पर ,तो लोकपाल कार्यवाही कर सकता है दो महीने में या उसको ऐसा करने की जरुरत नहीं है I या तो लोकपाल इस्तीफा दे सकता है I “निश्चित संख्या” का निर्णय लोकपाल करेगा I इसमें लोकपाल का निर्णय अंतिम होगा Iऔर प्रत्येक नागरिक से यह ध्यान देने की विनती है कि यह प्रक्रिया/पद्धति लोकपाल चयन समिति को सुझाव देने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं I

 

ये पारदर्शी शिकायत प्रणाली/सिस्टम ये सुनिश्चित करेगा कि नागरिकों की शिकायत दृश्य हो और जाँची जा सके कभी भी , कहीं भी और किसी के भी द्वारा ताकि कोई नेता, कोई बाबू (लोकपाल आदि), कोई जज या मीडिया उस शिकायत को दबा नहीं सके |

ये सैक्शन सुनिश्चित करेगा कि यदि लोकपाल करोड़ों लोगों की शिकायत को नजरंदाज कर रहा है तो उसकी पोल खुल जायेगी और उसकी पोल खुल सकती है इसलिए वो करोडो की शिकायतें को नजरंदाज नहीं करेगा |

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प्रश्न : क्या कोई व्यक्ति मतदाताओं को खरीद सकता है ऊपर दिए हुए प्रक्रिया/पद्धति में ?

उत्तर : नहीं | कृपया (2.2) देखिये Iयदि ऐसा मान लें कि कोई धनी/पैसे वाला व्यक्ती 100 रुपया देता है एक करोड नागरिकों को `हाँ` दर्ज करवाने के लिए तो खंड/धारा 2.2 के अनुसार वोटर अपने `हाँ` दर्ज किये हुए को अगले दिन बदल सकता है I अब यदि 1000 धनी व्यक्ती मिलकर अपना सारा पैसा भी खर्च करें, फिर भी वे हर नागरिक को प्रतिदिन 100 रुपया नहीं दे सकते I इसी लिए `हाँ` दर्ज करवाने के लिए किसी को खरीदना, ऊपर दिए हुए पारदर्शी शिकायत प्रणाली में संभव नहीं है I

प्रश्न : खंड/धारा-2 का महत्व क्या है ?

उत्तर : लोकपाल बिल पर ध्यान दीजिए जिसमें लिखा है : लोकपाल के कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत वेबसाइट पर रखी जाएगी I अब यदि 1,00,000 नागरिकों की एक ही शिकायत है तो ? तो क्या हर कोई शिकायत की कॉपी भेजेंगे लोकपाल को ? इससे पूरी तरह लोकपाल का कार्यलय शिकायतों से भर जाएगा I और क्या होगा यदि एक करोड नागरिकों की शिकायत एक ही है लोकपाल के विरुद्ध ? तो क्या हर एक को लोकपाल के कार्यलय में व्यक्तिगत रूप से बुलाना पड़ेगा ? या कलेक्टर के कार्यलय में बुलाएं , शिकायत जमा करने के लिए ? यह क़ानून-व्यवस्था के समस्या को बढ़ावा देगा I खंड/धारा-2 समस्याओं को सरल करेगा – कुछ व्यक्ती अपने शिकायत को जमा करेंगे और बाकि सभी तलाटी के कार्यलय जाकर अपना नाम शांतिपूर्वक जोड़ देंगे I

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उत्तर के लिए कृपया www.righttorecall.info/004.h.pdf देखें |

 

(32.3) राइट टू रिकॉल खंड/धारा - दस में से एक लोकपाल को बदलने का अधिकार नागरिकों को होना चाहिए

 

मान लीजिए कि आपकी एक फैक्ट्री/कंपनी है जिसमें 100 कर्मचारी हैं और सरकार एक कानून बनाती है की आप किसी भी कर्मचरी को ना ही निकाल सकते और ना नहीं निलंबित कर सकता हैं अगले 5 से 25 वर्षों तक उच्च न्यायलय/सुप्रीम-कोर्ट के बिना सहमति लिए हुए I तब अनुशासनहीनता बढ़ेगी या कम होगी ? हम नागरिक 10 लोकपाल को नियुक्त कर रहे हैं और जनलोकपाल ड्राफ्ट यह कहता है की हम नागरिक उन 10 में से 1 लोकपाल को भी नहींनिकाल सकते हैं बिना उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीश की अनुमति के बिना !!

तो मेरा यह सुझाव है की कम से कम 10 में से 1 लोकपाल नागरिकों द्वारा हटाने/बदलने का अधिकार होना चाहिए यदि सभी 10 को न बुलाया जा सके I `सिविल सोसाइटी` में से अधिकतर यह विश्वास करते हैं कि हम आम नागरिक किसी बेईमान को ही नियुक्त करेंगे I पहले तो ऐसा है नहीं,लेकिन यदि उनकी बात मानें तो भी 10 में से 1 ही बेईमान होगा I बाकि बचे हुए लोकपाल नियुक्त किये जाएँगे `खोज और चयन समिति` के द्वारा और इसी लिए वो सभी ईमानदार होंगे I तो केवल एक बेईमान लोकपाल अधिक हानि नहीं पहुंचा सकता I तो 10 में से 1 के ऊपर राइट टू रिकॉल/`भ्रष्ट कों बदलने का आम नागरिकों का अधिकार` का विरोध क्यों है ?

 

धारा-NN : नागरिक का लोकपाल को बदलने/निकालने/ख़ारिज करने/रखने का अधिकार (नागरिक का राईट टू रिकाल/रिजेक्ट/रिटेन लोकपाल सदस्य)

खंड/धारा #-(अफसर जिसके लिए निर्देश)

प्रक्रिया/पद्धति

 

खंड/धारा 1-

नागरिक शब्द का अर्थ होगा रजिस्ट्रीकृत मतदाता/रजिस्टर्ड वोटर  I यह पद्धति लागू होगी लोकपाल के केवल एक सदस्य के ऊपर जिसे `नागरिक द्वारा नियुक्त/रखा गया लोकपाल सदस्य` भी कहा जाता है I शुरुवात में वह नियुक्त किया जएगा लोकपाल चयन समिति द्वारा I  इस धारा में “कर सकता है” का मतलब “ कर सकता है या करने की जरुरत नहीं है “ है और इसका मतलब किसी प्रकार से बाध्य/बंधनकारी नहीं है |

 

खंड/धारा 2-( कलेक्टर को निर्देश)

राष्ट्रपति कलेक्टर को यह निर्देश देता है की यदि कोई भरतीय नागरिक जिसकी आयु 40 वर्ष से अधिक हो और वह लोकपाल समिति/कमिटी में `नागरिकों द्वारा नियुक्त/रखा गया लोकपाल सदस्य` बन्ने की इच्छा रखता है और वह जिला कलेक्टर के कार्यालय में स्वयं/खुद आता है, जिला कलेक्टर उस उम्मीदवार को स्वीकार करेगा लोकपाल का सदस्य के लिए, सांसद चुनाव के जमा राशि जितनी राशि जमा करने के बाद I कलेक्टर उसके नाम और क्रमांक संख्या/सीरियल नंबर लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा | कोई भी चिन्ह नहीं दिया जायेगा |

 

खंड/धारा 3-(तलाटी या पटवारी या लेखपालको निर्देश)   

यदि किसी जिले का कोई नागरिक , अपने नजदीक के तलाटी के कार्यालय जाकर 3 रुपये का शुल्क/फी देकर और किसी भी 5 व्यक्ति को `नागरिक द्वारा रखे गए/नियुक्त लोकपाल सदस्य` के लिए पसंद/अनुमोदन दे सकता है, तलाटी उसके अनुमोदन को कम्पुटर पर रखेगा और उसे एक रसीद देगा जिसमें समय/दिनांक और व्यक्ती की भी पसंद/अनुमोदन लिखी होगी I` गरीबी रेखा से नीचे` (बी पी एल) राशन कार्ड वाले के लिए शुल्क/फी  रु. 1 होगा I 

 

खंड/धारा 4-(पटवारी को निर्देश)

पटवारी या तलाटी लोकपाल के वेबसाइट में नागरिको की पसंद/अनुमोदन को रखेगा नागरिको के मतदान-पत्र संख्या के साथ I

 

खंड/धारा 5-(पटवारी को निर्देश)

चुनाव कमिटी/समिति 10 लोकपाल नियुक्त करेंगे और ऊपर दिए हुए प्रस्ताव को जोड़कर 10 में से किसी 1 लोकपाल को नागरिकों द्वारा बदला जा सकता है I और ऐसी ही एक प्रक्रिया/पद्धति है जिसमे नागरिक `ना` रजिस्टर दर्ज करके `राइट टू रिजेक्ट` लोकपाल की तरह भी उसे प्रयोग कर सकते हैं|

 

खंड/धारा 6-(लोकपाल को निर्देश)

प्रत्येक महीने की 5 वीं तारीख को लोकपाल अध्यक्ष पिछले महीने के आखरी दिन तक के अनुमोदन/पसंद को वेबसाइट पर रखेगा I

 

खंड/धारा 7-( लोकपाल चयन समिति को निर्देश)

यदि कोई  उम्मीदवार को 24 करोड से अधिक अनुमोदन/पसंद मिले और वो वर्त्तमान `नागरिकों द्वारा रखा गया/नियुक्त लोकपाल सदस्य` के अनुमोदन से एक करोड़ भी ज्यादा है ,तब लोकपाल चयन समिति वर्तमान `नागरिकों द्वारा रखे गए/नियुक्त लोकपाल सदस्य` को इस्तिफा देने के लिए कह सकता है और सबसे द्वारा अनुमोदन प्राप्त उम्मीदवार को लोकपाल का `नागरिकों द्वारा रखे गए/नियुक्त लोकपाल सदस्य` बनाएगा I लोकपाल चयन समिति 24 करोड की सीमा रेखा को कम या बढ़ा सकता है 12 करोड और 36 करोड के बीच |

 

खंड/धारा 8-(`नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को बनाये रखने का अधिकार)

नागरिक यह प्रक्रिया/पद्धति का प्रयोग किसी `नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को बनाये रखने के लिए या वापस लाने के लिए, यदि कोई `नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को निकाल दिया गया था परन्तु नागरिक उसे पद पर बनाये रखना चाहते हैं I अतः यह खंड/धारा `लोकपाल को बनाये रखने का अधिकार`(राईट टू रिटेन) के लिए भी निर्दिष्ट किया जाता है/जाना जायेगा I

 

खंड/धारा 9-( लोकपाल को ख़ारिज करने का अधिकार(राईट टू रिजेक्ट))

यदि कोई नागरिक पटवारी के दफ्तर जाकर और किसी लोकपाल के कमिटी/समिति के सदस्य जो नागरिकों द्वारा रखा गया है ,का नाम लेकर उसके विरोध में `ना` दर्ज करवाना चाहे तो पटवारी उसका नाम दर्ज करेगा, मतदाता संख्या/नंबर और उम्मीदवार की संख्या/नंबर और 3 रुपया का शुल्क/ फी लेकर उसे रसीद देगा I और यदि 24 करोड नागरिक उस `नागरिकों द्वारा रखा गया लोकपाल सदस्य` के ऊपर `ना` दर्ज करवाते हैं, तो  लोकपाल चयन समिति उसे लोकपाल सदस्य समिति से इस्तीफा देने के लिए विनती कर सकती है  I

 

खंड/धारा 10-( कलेक्टर को निर्देश)

यदि कोई नागरिक इस कानून में बदलाव करना चाहे, तो वे अपना एफिडेविट जिला कलेक्टर के दफ्तर पर जमा करेगा और जिला कलेक्टर या उसके क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रुपये प्रति पन्ना का शुल्क/ फी लेकर लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा |

 

खंड/धारा 11-( तलाटी या पटवारी को निर्देश)

यदि कोई नागरिक इस कानून या इसके किसी खंड/धारा के विरोध दर्ज करवाना चाहे या किसी ऊपर दिए हुए खंड/धारा के द्वारा गए किसी जमा किये हुए एफिडेविट पर अपना हाँ/ना दर्ज करवाना चाहे तो वह तलाटी के दफ्तर जाकर ,अपने मतदान पत्र लेकर, तलाटी को 3 रुपये का शुल्क/ फी देना पड़ेगा | तलाटी हाँ/ना को लोकपाल के वेबसाइट पर दर्ज करेगा और उसे रसीद देगा |

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प्रश्न : क्या कोई व्यक्ती मतदाताओं को खरीद सकता है ऊपर दिए हुए प्रक्रिया/पद्धति में ?

उत्तर : नहीं | क्यों? Iयदि ऐसा मान लें कि कोई धनी/पैसे वाला व्यक्ती 100 रुपया देता है एक करोड नागरिकों को `हाँ` दर्ज करवाने के लिए तो खंड/धारा 5 के अनुसार वोटर अपने `हाँ` दर्ज किये हुए को अगले दिन बदल सकता है I अब यदि 1000 धनी व्यक्ती मिलकर अपना सारा पैसा भी खर्च करें, फिर भी वे हर नागरिक को प्रतिदिन 100 रुपया नहीं दे सकते I इसी लिए `हाँ` दर्ज करवाने के लिए किसी को खरीदना, ऊपर दिए हुए राईट टू रिकाल/`भ्रष्ट कों नागरिकों द्वारा बदले जाने का अधिकार`में संभव नहीं है I

 

प्रश्न : क्या करोडो नागरिक एक लोकपल उम्मीदवार कों पसंद करेंगे/अनुमोदन देंगे ?

उत्तर : निर्भर करता है कि लोकपाल कितने बुरे हैं और अच्छे विकल्प कितने हैं Iकुछ 60% से 75% नागरिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोट देते हैं बावजूद इसके कि उनके सामने जो विकल्प होते हैं, उनसे कोई नागरिकों कों कोई आशा नहीं होती Iइससे यह पता चलता है कि नागरिक बदलाव करने के लिए पहल जरूर करते हैं Iयदि विकल्प में उम्मीदवार होनहार/आशाजनक हैं, और यदि लोकपाल भ्रष्ट है तो नागरिक बदलाव करने के लिए  पहल करेंगे I

 

प्रश्न : राइट टू रिकॉल जैसे कानून को अमरीका जैसे शिक्षित देश में ही सिमित रखना चाहिए न की भारत जैसे अनपढ़ देश में

उत्तर : अमरीका के पास अच्छी शिक्षा है क्योंकि वहाँ के नागरिकों के पास उनके जिला शिक्षा अधिकारी पर राइट टू रिकॉल है !! पर हमारे पास जिला शिक्षा अधिकारी पर राइट टू रिकॉल नहीं है और इसी कारण भ्रष्ट शिक्षा, शिक्षा के ऊपर खर्च होने वाले राशि को गायब कर देता है इसिलए अधिकतर नागरिक अशिक्षित रह जाते हैं I जब अमेरिका में राईट तो रिकाल आया था, वहाँ शिक्षित लोग बहुत कम थे |

 

राईट टू रिकाल और पारदर्शी शिकायत प्रणाली पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए www.righttorecall.info/004.h.pdf देखें |

 

(32.4) पारदर्शी शिकायत/सुझाव प्रणाली के खंड/धारा पर अधिक जानकारी

 

वर्ष 2004 में मैंने अनेक कार्यकर्ताओं को सुझाव दिया कि हमें पारदर्शी शिकायत प्रणाली को भी उस समय के प्रस्तावित `सूचना के अधिकार अधिनियम(आर.टी.आई)` में जोड़ना चाहिए I अन्य शब्दों में, `सूचना के अधिकार` में एक खंड/धारा जोड़ीं जाये कि यदि कोई व्यक्ति/आवेदनकर्ता चाहता है कि उसकी शिकायत कोई सार्वजनिक वेबसाइट(जैसे प्रधान-मंत्री/लोकपाल की वेबसाइट) पर आये और जागरूक नागरिक अपना नाम तलाटी/पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जाकर जोड़े Iमुझे यह उत्तर मिला की अभी के लिए `सूचना के अधिकार अधिनियम(आर.टी.आई)` बिना पारदर्शी शिकायत प्रणाली के रखेंगे और इसे हम बाद में जोड़ देंगे I 6 वर्ष बीत चुके है लेकिन वो `बाद` हमें अभी तक देखने को नहीं मिला I तो इस समय मैं सभी नागरिकों से विनती करता हूँ कि सुनिश्चित करें कि यह खंड/धारा 15 अगस्त के पहले तक जोड़ दिया जाए ना की बाद में | मैं पुनः विनती करता हूँ की आप भी मेरे खंड/धारा का समर्थन करे लेकिन 15 अगस्त के निश्चित समय के पहले कोई बेहतर खंड/धारा अवश्य लायें I मै विरोध करता हूँ ये तर्क का कि `प्रक्रियात्मक विवरण/जानकारी को अगले जन्म में आना चाहिए I मेरे विचार से सभी प्रक्रियात्मक विवरण/जानकारी 15 अगस्त के निर्धारित समय से पहले निश्चित कर लिए जाए I
        
लोकपाल बिल कहता है नागरिक अपने सुझावों को `खोज और चयन समितियों` में भेज सकते हैं I लेकिन इसके लिए कोई भी प्रक्रिया/पद्धति नहीं दी गयी है I मान लीजिए 1 लाख या 50 लाख या 20 करोड नागरिक अपने सुझाव भेजना चाहते हैं I सुझाव -मेल के द्वारा भेजना सही विकल्प नहीं होगा क्योंकी अनेक व्यक्ती हजारों जाली -मेल भेज सकते है I चिट्ठियाँ भेजना भी सही विकल्प नहीं होगा क्यूंकि `खोज और चयन समितियों` के पास इतना समय नहीं है की वह 1 लाख चिट्ठियों को खोले और पढ़े |और चिट्ठियों को नष्ट भी किया जा सकता है, `खोज और चयन समितियों` में पहुँचने के पहले | यदि `खोज और चयन समितियां` भ्रष्ट हों ,तो  वे यह कह सकते हैं कि उन्हें किसी भी तरह के सुझाव नहीं मिली हैं | तो ये हमारा प्रस्ताव है की नागरिक एक एफिडेविट (अपनी सुझाव के साथ) जमा कर सकता है लेक्टर के दफ्तर में और कलेक्टर उसे स्कैन करके लोकपाल की वेबसाइट पर रखेगा | यह सबसे अच्छा रास्ता है जो मैं सोच सकता हूँ , हालाँकि यदि कोई इससे अच्छी प्रक्रिया/पद्धति जनता है तो मैं उससे विनती करता हूँ की वह 15 अगस्त निर्धारित समय से पहले सबके सामने रखे, ि अगले जन्म की प्रतीक्षा करे I
             
इस प्रस्ताव की दूसरी खंड/धारा यह है की नागरिक को यह अनुमति दी जाए कि कलेक्टर के दफ्तर में जमा कोई भी शिकायत पर अपने हाँ/ना को दर्ज कर सके ,तलाटी के दफ्तर जाकर | यह तब उपयोगी है जब  हजारों, लाखों या करोड़ों नागरिकों की एक ही शिकायत है I वह सभी को एक सी शिकायत भेजने की जरुरत नहीं पड़ेगी I खंड/धारा 2 के हटने से केवल सिस्टम और देश को नुकसान हो जाएगा I

 

(32.5) राइट टू रिकॉल लोकपाल, राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, राइट टू रिकॉल न्यायधीश इत्यादि पर अधिक जानकारी

 

      राइट टू रिकॉल/प्रजा अधीन राजा/`भ्रष्ट को निकालने का अधिकार` कोई विदेशी विचार नहीं है I सत्यार्थ प्रकाश कहता है की राजा को प्रजा के अधीन होना ही चाहिए अन्यथा वह नागरिकों को लूट लेगा और और इस तरह देश का नाश हो जाएगा | दयानंद सरस्वती जी ने यह श्लोक अथर्ववेद से लिए हैं | तो राइट टू रिकॉल/प्रजा अधीन राजा कोई अमरीकी या विदेशी विचार नहीं है ,यह सम्पूर्ण भारतिय  है I

अमरीका में नागरिकों के पास पुलसी कमिश्नर को निकलने का अधिकार है और यही एक मात्र कारण है की अमरीका के पोलिस में भ्रष्टाचार कम है इसी तरह अमरीका के नागरिकों के पास उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश और जिला न्यायधीशों को भी निकलने का अधिकार है |यही कारण है की कार्यवाही बहुत तेज होती है और अमेरिका के निचली अदालतों में भ्रष्टाचार बहुत कम है I अमरीका के नागरिकों के पास राज्यपाल, विधायक, जिला शिक्षा अधिकारी , मेयेर/महापौर, जिला/राज्य सरकारी दंडाधिकारी इत्यादि पर राइट टू रिकॉल है I यह ध्यान दें कि अमरीका में कोई भी लोकपाल (ओम्बुड्समेन/ प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी) नहीं है इसके बावजूद अमरीका के राज्य/जिलों में अधिकतर विभागों में भ्रष्टाचार कम है क्योकि अधिकतर राज्य/जिलो में राइट टू रिकॉल/`भ्रष्ट कों बदलने का अधिकार` है I वही अमरीका में केंद्र के मंत्रियों(सीनेटरों) और केन्द्र के अधिकारियो में भ्रष्टाचार अधिक मात्रा में है क्योंकि केंद्र के मंत्रियों और केन्द्र के अधिकारियो पर राइट टू रिकॉल नहीं है I

वर्ष 2004 में मैंने सुझाव दिया था कि हमें `राइट टू रिकॉल-सूचना अधिकार कमिश्नर(भ्रष्ट सूचना अधिकार कमिश्नर कों बदलने का नागरिकों का अधिकार)` के खंड/धारा `सूचना अधिकार अधिनियम(आर.टी.आई)` में लाया जाए अन्यथा ज्यादातर सूचना अधिकार कमिश्नर भ्रष्ट और बेकार/अयोग्य हो जाएँगे और सूचना अधिकार अधिनियम (आर.टी.आई) के आवेदकों(उपयोग करने वाले) कों यहाँ-वहाँ भटकते ही रहना पड़ेगा जानकारी प्राप्त करने के लिए I लेकिन पुनः मुझे यह उत्तर मिला की हम एकता पर  ही अधिक ध्यान देना चाहिए हम सूचना अधिकार अधिनियम (आर.टी.आई) को बिना राइट टू रिकॉल के समर्थन करते हैं और अभी हम सूचना अधिकार कमिश्नर पर राइट टू रिकॉल का विरोध करते हैं हम सूचना-अधिकार कमिश्नर पर राइट टू रिकॉल बाद में लायेंगे Iयह बाद क्या है ? अगले जन्म में ?  मेरे विचार से इस बार हमें यह मांग करनी होगी कि लोकपाल में राइट टू रिकॉल की खंड/धारा का ड्राफ्ट 15 अगस्त के पहले जुड जाना चाहिए I मै यह नहीं निवेदन/प्रार्थना करता हूँ कि मेरे राईट टू रिकाल-लोकपाल का ही समर्थन करें, मै यह विनती करता हूँ की आप इससे भी अच्छा प्रस्ताव प्रस्तुत करने की कोशिश करें I
        कुछ व्यक्तियों ने जोर दिया है की वे राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं पर वे लोकपाल में राइट टू रिकॉल लाने की चर्चा का भी विरोध करते हैं इस जन्म में
Iवे यह बात पर जोर डालते हैं कि राइट टू रिकॉल ,सरपंच से शुरू होकर ऊपर की ओर जाना चाहिए | मुझे आश्चर्य है कि क्यों वे राइट टू रिकॉल लोकपाल पर नहीं लाना चाहते हैं वे कहते है कि यह पहले गांव और फिर तहसील और फिर जिला और फिर राज्य ,तब राष्ट्र स्तर पर लागू होना चाहिए I क्यों सर्वप्रथम केंद्र के लोकपाल पर नहीं मांग करते ?
         उनका कहना कि राइट टू रिकॉल, सरपंच के स्तर पर ही होना चाहिए ना की केन्द्र/राज्य स्तर पर, यह तो ऐसा कहना हुआ की “एक रुपये का सिक्का लो और
100 रुपये , 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट को भूल जाओ ” और यह भी कहना है कि राइट टू रिकॉल आज से ही सरपंच पर ही होना चाहिए और राइट टू रिकॉल लोकपाल, राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, राइट टू रिकॉल न्यायधीश पर बाद में लागू होना चाहिए | बाद में का अर्थ अगले जन्म भी हो सकता है |

राइट टू रिकॉल की अनुपस्थिति/गैर-हाजिरी में एक व्यक्ती जो पद में है , भ्रष्ट होकर सारी सीमाएं पार कर जाता है I उदाहरण के लिए , हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश (सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज) खरे ने एक स्विट्ज़रलैंड के अरबपति व्यक्ती को जिसने 38 वर्षीय बच्चियो का बलात्कार किया था और इसे वीडियो टेप किया था ,उसी निर्दयी व्यक्ती को जमानत दे दी थी I माननीय जज खरे ने वीडियो टेप होने के बावजूद उस अरबपति को जमानत दे दी जब कि निचली अदालत ने उसे अपराधी घोषित किया था I इस तरह के  दुर्भाग्यपूर्ण फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज के ऊपर राइट टू रिकॉल न होने के कारण का फल है I इसी तरह यदि नागरिकों के पास लोकपाल को निकलने/बदलने का अधिकार ना हो तो वह भी माननीय सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज की तरह भ्रष्ट/भाई-भतीजावाद वाला हो जाएगा I

अभी, `सिविल सोसाइटी` के कमिटी के सदस्य अभी पद में हैं और यह स्थिति में हैं कि वे पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) और राइट टू रिकॉल-लोकपाल खंड/धारा को लोकपाल ड्राफ्ट में जोड़ सकते हैं I वह 5 मंत्री इस बात को स्वीकार कर या नहीं भी कर सकते है – यह एक अलग बात है I लेकिन यदि `सिविल सोसाइटी` के सदस्य खुद पारदर्शी शिकायत प्रणाली/ राइट टू रिकॉल-लोकपाल को 15 अगस्त के पहले जोड़ने का विरोध करेंगे, यह पूरी तरह दर्शाता है की राइट टू रिकॉल लाने की इनकी कोई मंशा नहीं है | मैं यह आशा करता हूँ की ऐसी बात न हो  I

     

जय हिंद |

 

(32.6) लोकपाल बोल सकता है : तुमने शिकायत कभी नहीं भेजी |

 

हमने से कई लोगों  ने ये देखा है कि सूचना अधिकार के लिए हम को एक जगह से दूसरी जगह भागना पड़ता है और सुचना अधिकार का कमिश्नर तारीख पर तारीख देता रहता है | अभी जनलोकपाल ड्राफ्ट कहता है कि परिणाम एक साल में आ जाएँगे | लेकिन ड्राफ्ट में, लोकपाल के खिलाफ  कोई भी सज़ा नहीं बताई गयी , यदि लोकपाल मामले को सुलझाने के लिए 10 साल भी लगाता है | तो फिर, यदि हमारे लोकपाल ,हमारे प्रिय सूचना अधिकार के कमिश्नर जैसे ही हों , तो वे तारीख पर तारीख दे सकते हैं और सालों बिता सकते हैं | इसको रोकने के लिए कोई खंड हैं क्या ?

पहले , हम शिकायत करने के जनलोकपाल में दिए गए तरीके से शुरू करते हैं | उसमें लोकपाल को लिखित भेजनी होगी| मान लें कि आपने पचास पन्नों का  पत्र रेजिस्ट्री से भेजा है , जिसमें शिकायत की अधिक जानकारी है | यदि लोकपाल शरद पवार जितना ईमानदार है ,तो फिर वो पहले 10 पन्ने निकाल देगा और तीन महीनों बाद, एक पत्र लिखेगा आपको कि आपने पूरी शिकायत नहीं भेजी” |

इस तरह से ये एक चल/तरीका है जिसके द्वारा लोकपाल या लोकपाल का कोई भ्रष्ट कर्मचारी आप के साथ खेल सकता है , वो है  कि ये आप की गलती है- आपने पूरी शिकायत नहीं भेजीऔर फिर वो आप पर जुर्माना भी डाल सकता है , उसी तरह जैसे जज , जन-हित याचिका दायर करने वालों पर जुर्माना डालते हैं |

 

(32.7) प्रस्तावित प्रजा- अधीन लोकपाल के खंड को और अच्छे से समझाना चाहूँगा

 

प्रस्तावित प्रजा अधीन-लोकपाल के खंड जनलोकपाल के किसी भी खण्डों को समाप्त नहीं करेगा , यानी कि ये खंड सिर्फ जनलोकपाल या सरकारी लोकपाल के साथ जोड़े जाएँगे और जनलोकपाल या सरकारी ड्राफ्ट में से कुछ भी घटाया नहीं जायेगा | अब 24 करोड़ नागरिक कैसे निर्णय करेंगे कि कोई लोकपाल अच्छा है या नहीं इस पर निर्णय करता है कि आज का (वर्त्तमान) लोकपाल कितना अच्छा या बुरा है |

यदि आज का लोकपाल अच्छा है (या बुरा है ,लेकिन बुरा एक सीमा में है) , तो नागरिक कोई ध्यान नहीं देंगे | लेकिन यदि वर्त्तमान लोकपाल बहुत बुरा है, तो वो दूसरे लोकपाल के लिए देखेंगे/ढूंढेंगे | और इस प्रक्रिया/तरीके में पांच लोगों को स्वीकृति/समर्थन दे सकते हैं, इसीलिए एक अच्छे उम्मीदवार को समर्थन देने से दूसरे अच्छे उम्मीदवार को भी समर्थन दिया जा सकता है, ये कृपया ध्यान दीजिए |

और असल में , मुद्दा क्या है ? यदि नागरिकों के पास कोई व्यक्ति के लिए आम सहमति नहीं है, तो दूसरा व्यक्ति नहीं आएगा और बदलाव नहीं होगा | ये तो प्राकृतिक है | मुद्दा ये है कि क्या यदि नागरिकों कि कोई आम सहमति हो तो ? उदाहरण के लिए हम लोग अलग-अलग हैं लेकिन बहुत लोग `नरेंद्र मोदी ` को पसंद करते हैं | तो मेरे अनुसार आम सहमति हमेशा गायब नहीं रहेगी | और यदि आम सहमति है , तो क्या कोई दूसरे व्यक्ति को नहीं आने देना चाहिए ?

और कृपया अपना मन बनाएँ | एक तरफ कहते हैं --- अमीर आम सहमति बना कर मतदाताओं को खरीद लेंगे और अगले पल, हम सुनते हैं कि कोई आम सहमति नहीं होगी | जहाँ तक मैं सोचता हूँ , अमीर आदमी मतों को खरीद नहीं पाएंगे प्रस्तावित प्रजा अधीन-लोकपाल/राईट टू-लोकपाल की प्रक्रिया में, क्योंकि मतदातों को अपने मत/स्वीकृति रद्द करने की छूट है | इसलिए अमीर व्यक्ति को रोज 100 रुपये देना होगा करोड़ों लोगों को , जो संभव नहीं है ,यदि भारत के सारे अमीर भी एक साथ अपना पैसा लगाएं तो | तो पैसे से मतदातों को खरीदना प्रश्न से बाहर है |

इसी तरह , गुंडों और मीडिया द्वारा भी मतदाताओं को खरीदना संभव नहीं है क्योंकि गुंडे पालने के लिए भी पैसे लगते हैं और कोई महीनों के लिए इतने गुंडे नहीं रख सकता कि करोड़ों मतदातों को प्रभावित कर सके | और ये प्रक्रियाएँ आने पर मीडिया का `पैसे लेकर समाचार देना` बंद हो जायेगा क्योंकि पारदर्शी शिकायत प्रणाली (सिस्टम) खुद एक मीडिया होगा क्योंकि ये एक ऐसी जानकारी देगा जो कोई भी जांच सकता है , जो मीडिया नहीं देता |  

 

प्रश्न- नागरिक लोकपाल के उम्मीदवार के बारे में कैसे जानेंगे ?

ये प्रक्रियाएँ/तरीके पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) के साथ या द्वारा आएँगी | जिससे उसको ऐसी जानकारी मिलेगी जो वो स्वयं जांच सकता है क्योंकि हर शिकायत करता को अपना समर्थन देने के लिए अपना वोटर आई.डी और अंगुली की छाप देना होगा और वो सब वेबसाइट पर आ जायेगा |

इसीलिए फर्जी समर्थक ना के बराबर होंगे और मतदाता ये निर्णय कर सकता , इस के सहारे कि कौन सबसे अच्छा उम्मीदवार है, किसके खिलाफ सबसे कम शिकायतें आई हैं, किसको सबसे ज्यादा समर्थन मिले हैं  , आदि |

 

(32.8) कैसे जनलोकपाल भारत को कमजोर बना सकता है और भारत विदेशी कंपनियों का गुलाम बनने में मदद कर सकती हैं

 

बहुत कम भारत के नागरिकों को ये सच्चाई समझ आई है कि भ्रष्टाचार से दस गुना भारत में हो रहा है|  क्या ? हमारी खेती, हथियार बनाने का सामर्थ्य/क्षमता और गणित/विज्ञानं की शिक्षा दिन बार दिन कमजोर हो रही है | ये इसीलिए क्योंकि विदेशी कम्पनियाँ, केंद्र और राज्य में हमारे मंत्रियों, बाबूओं को रिश्वत दे रही हैं , हमारी खेती, हथियार बनाने की ताकत और गणित/विज्ञान की शिक्षा को कमजोर बनाने के लिए | और जनलोकपाल इस स्थिति को और खराब बना सकती है | कैसे ?

लोकपाल चुनाव समिति में कोई 10-12 लोग हैं, जो बहू-राष्ट्रीय/विदेशी कम्पनियाँ आसानी से खरीद सकती हैं या धमकी दे सकती हैं , राडिया जैसे दलाल/बिचौलियों द्वारा | और इस तरह विदेशी कम्पनिय ये पक्का कर सकते हैं की विदेशी कंपनियों के एजेंट , साफ़-सुथरी छवि/नाम के साथ, लोकपाल बनें | इन लोकपाल के एजेंटों के साथ , विदेशी कंपनियां निचले स्तर के भ्रष्टाचार (कलेक्टर के स्तर के नीचे) को दबाएंगे, क्योंकि निचले स्तर के भ्रष्टाचार विदेशी कंपनियों को अधिक नुकसान करती हैं छोटे-माध्यम स्तर के व्यापारियों के मुकाबले | औरसाथ ही, लोकपाल खेती, हथियार बनाने की ताकत और गणित/विज्ञान शिक्षा को कमजोर बनने वाली नीतियां/तरीके को बढ़ावा देंगे , ताकि भारत और ज्यादा विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहें | विदेशी कम्पनियाँ ऐसी नीतियां को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं ? लोकपाल द्वारा बाबू, जज, मंत्रियों को परेशान करके(उनके खिलाफ झूठे मामले बनाकर) जो इन नीतियों/तरीकों का विरोध करते हैं और उन मंत्रियों, जज, बाबूओं का पक्ष/तरफदारी लेकर, जो ऐसी नितियों का समर्थन/मदद करते हैं |  

(अलग से : मुझे समझाने दीजिए क्यों निचले स्तर का भ्रष्टाचार छोटे-माध्यम स्तर के व्यापारियों को फायदा करते हैं विदेशी कंपनियों के मुकाबले | मान लीजिए एक व्यक्ति दिल्ली, अहमदाबाद जैसे शहर में 5-10 होटलों का मालिक है | और एक और होटल खोलना चाहता है और स्थानीय अफसर उससे रिश्वत मांगते हैं, कहें 5 लाख की | तो वो रिश्वत दे देता है |

अब दूसरी और, एक विदेशी व्यापारी/मालिक अमेरिका में बैठा है और उसको भी एक और होटल खोलना है | मान लीजिए स्थानीय अफसरों को 5 लाख की रिश्वत चाहिए इस के लिए | अब विदेशी व्यापारी सीधे तो स्थानीय अफसर से सौदा नहीं कर सकता , इस के लिए उसे दलाल चाहिए | अब दलाल कहेंगे कि अफसर 50 लाख रिश्वत मांग रहे हैं !! विदेशी व्यापारी जो अमेरिका में बैठा है,को कोई साधन नहीं है , ये जानने का और वो 10 गुना रिश्वत देता है , उस के मुकाबले जो स्थानीय/देशी व्यापारी को देना होता है |

इसी तरह, छोटे-मध्यम व्यापारी बिक्री-कर/उत्पादन शुल्क आदि टैक्स/कर की चोरी करने में सफल हो जाता है, उस जगह भ्रष्टाचार होने के कारण, लेकिन विदेशी कम्पनियाँ 5-10 गुना ज्याद खर्चा करते हैं , क्योंकि उन्हें दलालों को बहुत हिस्सा देना पड़ता है | इसी लिए निचले स्तर की भ्रष्टाचार भारत के लिए लाभ/फायदा करेग , केवल तभी , यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रियों,सुप्रीम कोर्ट और हाई-कोर्ट के जजों, सचिवों का भ्रष्टाचार कम हो तो | यदि मंत्रियों, जजों, आदि का भ्रष्टाचार वैसा ही रहता है और निचले स्तर का भ्रष्टाचार कम हो जाता है, तो इससे भारत देश को कोई फायदा नहीं होगा ) 

 

(32.9) क्या अन्ना राईट टू रिकाल (जनलोकपाल) के बारे में गंभीर ह, और क्या जनलोकपाल/लोकपाल केवल टाइम-पास है ?

 

मान लीजिए मेरा समय बुरा है और मैंने आपसे एक लाख रुपये उधार लिए हैं | फिर मान लीजिए के मेरा समय बदल कर अच्छा हो जाता है , और आप मेरे से पैसे वापस देने के लिए कहते हैं| मैं आप को तुरंत एक लाख का एक चेक देता हूँ , लेकिन उसपर हस्ताक्षर करना भूल जाता हूँ| आप मेरे पास पचासों बार आते हैं और याद दिलाते हैं , लेकिन हर बार मैं चेक पर हस्ताक्षर करने से मना कर देता हूँ और कहता हूँ कि मैंने चेक तो आपको दे दिया है और आप का सारा पैसा दे दिया है |

हर बार ,जब मैं आप को चेक पर हस्ताक्षर करने के लिए कहता हूँ, तो आप कहते हैं क्या मैंने तुम्हें चेक नहीं दिया ?अब मुझे तरीका सम्बन्धी विवरण(जानकारी) और तकनिकी जानकारियां बता कर परेशान मत करो , आदि आदि | तो ऐसे में आप के पास , मेरे द्वारा दिया गया एक लाख का चेक है ,और उस चेक पर कोई हस्ताक्षर नहीं है ! 

 आप उस चेक के बारे में क्या कहोगे ? आप मेरी पैसा लौटाने की नियत के बारे में क्या कहेंगे ? क्या आप मुझे ढोंगी/पाखंडी कहेंगे ?

उसी तरह अन्ना हजारे राईट टू रिकाल के ढोल इतनी जोरों से पीटता है कि बदल का गरजना भी कम पढ़ जाये | लेकिन अन्ना जी जनलोकपाल/लोकपाल ड्राफ्ट में राईट टू रिकाल-लोकपाल/प्रजा अधीन-लोकपाल के खंड डालने से मना करते हैं | बिकी हुई मीडिया (अखबार, टी.वी आदि) उनकी ये पोल नहीं खोलती है , और इसीलिए बहुत से लोगों को ये नहीं पता कि अन्ना ने राईट टू रिकाल-लोकपाल के खण्डों का विरोध किया है | क्या वो अगले जन्म में ये खंड डालेंगे ? ये मुझे नहीं पता | लेकिन अभी , अन्ना ने कोई भी रूचि नहीं दिखाई है प्रजा अधीन-लोकपाल/राईट टू रिकाल-लोकपाल के खंड डालने के लिए जनलोकपाल ड्राफ्ट में | तो आप अन्ना हजारे के नियत के बारे में क्या कहते हैं ? कृपया आप ये लेख सब को बांटें |और मैं `इंडिया अगेंस्ट कर्र्रप्शन` के कार्यकर्ताओं से विनती करूँगा कि अन्ना इस इमानदारी से पूछें कि प्रजा अधीन-लोकपाल/राईट टू रिकाल-लोकपाल पर अपना रुख स्पष्ट/साफ़ करें मीडिया के सामने | अन्ना क्यों मीडिया को नहीं कहते कि वे राईट टू रिकाल-लोकपाल/प्रजा अधीन-लोकपाल का विरोध करते हैं , जब वो असल में राईट टू रिकाल-लोकपाल की कलमों का विरोध कर रहे हैं ?

इसी तरह अन्ना ने जनलोकपाल बिल में `पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम)` के खंड डालने से मना कर दिया है , जो एक नागरिक को कोई मौजूदा शिकायत के साथ अपना नाम जोड़ने देता है , ताकि उसकी शिकायत ना दबे कोई नेता,बाबू, जज या मीडिया द्वारा और उसे नयी शिकायत डालने के लिए उसका धन बचे | ये ही है अन्ना की गरीब व्यक्तियों के लिए हमदर्दी !!

 

टाइम-पास जन लोकपाल बिल पर और जानकारी

 

1.) दिसम्बर-2010 में, अन्ना ने जनलोकपाल क़ानून के लिए मांग की | फरवरी-2010 तक , उन्होंने कानों की मांग की| मार्च-2010 के मध्य में, उन्होंने पलती मारी और समिति/कमीटी की मांग की !!! दूसरे शब्दों में टाइम-पास जून-जुलाई अन तक |

 2.) उसके बाद सांसदों ने और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने महीनो तक चर्चा की| अब , अन्ना कहते हैं कि वे दोबारा अनशन करेंगे यदि उनकी मांगें पूरी नैन हुई अगस्त-15 तक |

आशा करते हैं कि उनकी मांगें पूरी हो जायें |

 3.) फिर बिल में लिखा है कि वो 4 महीनों बाद लागू होगा पारित होने के बाद !! तो ये एक और 4 महीनों का टाइम-पास |

 4.) फिर बिल में लिखा है कि उप-राष्ट्रपति चुनाव समिति बनायेंगे और उप-राष्ट्रपति पर कोई समय-सीमा नहीं है | उसे महीनों लग सकते हैं चुनाव समिति बनने के लिए |

 5.) क्या चुनाव समिति 11 लोकपाल की नियुक्ति तुरंत कर देगी? नहीं | जनलोकपाल बिल में लिखा है कि चुनाव समिति एक खोज-समिति बनाएगी !! फिर, चुनाव्व समिति को महीनों-महीनों लग सकते हैं खोज समिति चुनने के लिए |

 6.) खोज समिति कई 100 की सूचि/लिस्ट को छांट कर 33 उम्मीदवार चुनेगी | फिर स, अन्ना का जनलोकपाल इसके लिए कोई समय सीमा नहीं देता | इस तरह खोज समिति को महीनों-महीनों लग सकते हैं |

 7.)ोज समित इन 33 में से 11 चुनेगी | फिरसे कोई समय सीमा नहीं दी गयी है और ये भी एक टाइम-पास है | यदि 3-4 सदस्यों ने एक मिली-भगत बना ली और 33 नामों का विरोध किया , तो सभी चुने हुए नाम रद्द कर दिए जाएँगे !!

 8.) इसके बाद लोकपाल आयेंगे और उनको छह महीने लग जाएँगे दफ्तर जमाने में और स्टाफ /कर्मचारियों की भर्ती करने में |

तो कुल मिलकर, हमारे पास कुछ नहीं , एक 2 सालों से लेकर दर्जों साल तक टाइम-पास ही है |

कोई हैरानी नहीं की सोनिया गाँधी ने अन्ना हजारे की मांगों को मान लिया क्योंकि ये टाइम-पास था | और कोई हैरानी नहीं कि सोनिया ने 5000 पुलिसवालों को रामदेवजी के समर्थकों को आधी रात को पीटने के लिए कहा और मंडप को जला देने के लिए कहा | क्योंकि रामदेव जी ने कहा मुझे काम चाहिए , समिति नहींजबकि अन्ना ने कहा कि मुझे (टाइम-पास) समितियां ही चाहिए |

 

(32.10) मुझ सताया गया ह, इसीलिए मेरा प्रस्तावित क़ानून सही है !!

 

इतिहास को समझने के लिए सबसे अच्छा तरीका वर्त्तमान(आज) को समझना है |

 

बहुत लोगों ने मुझसे ये प्रश्न पूछा “ 1947 में, लाला लाजपत राइ, भगत सिंह जी, सुभाष चन्द्र बोस जी, आदि ने सही कहा था कि केवल बंदूकें ही हमें आजादी दे सकती हैं और फिर मोहनभाई(गाँधी) आये जिसने कहा कि हमको बंदूकें नहीं चाहिए, लेकिन चरखा-चलाने और भजन गाने से हमें आजादी मिलेगी | ऐसे फ़ालतू विचार पर लोगों ने विश्वास कैसे कर लिया | क्या सभी लोग उस समय मूर्ख थे ?”

असलियत ये है : 1930 और 1940 के दशक में भारतियों ने कभी भी ये फ़ालतू विचार को स्वीकार/माना नहीं | इसका सबूत ये है ---- सुभाष जी ने 1939 कांग्रेस के चुनाव जीते और मोहनभाई का चमचा पट्टाभाई हार गया , क्योंकि कांग्रेस कार्यकर्ता को कोई विश्वास नहीं था मोहनभाई के चरखा-चलाने और भजन-गाने में | लेकिन अंग्रेजों ने मीडिया को पैसे दिए मोहनभाई का गुण-गान करने के लिए और मोहनभाई के लिए एक भावनात्मक/भावुक समर्थन बनाया , और मोहनभाई ने इस भावात्मक समर्थन को ,चालाकी से प्रयोग/इस्तेमाल किया अपने खतरनाक अहिंसासिद्धांत/असूल को आगे बढाने के लिए |

 

मैं क्यों `अहिंसा` को एक खतरनाक सिद्धांत/असूल कहता हूँ ?

 

इस अहिंसा के सिद्धांत/असूल के कारण , हिंदुओं ने फैसला किया कोई भी हथियार नहीं रखने के लिए | और केवल हथियार कि कमी के कारण, कुछ 10 लाख हिंदू मारे गए, कुछ एक करोड़ इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर हो गए और 4 करोड़ हिंदुओं ने अपनी सारी संपत्ति खो दी और 1947 के बंटवारे में , भागने के लिए मजबूर हो गए | और इसकी कोई गिनती नहीं कि कितने लाख महिलाएं/औरतों का बलात्कार हुआ, अफारण हुआ, जबरदस्ती/जबरन धर्म-परिवर्तन हुआ, और जबरदस्ती/जबरन शादी कराई गयी | ये मार-पीट और अव्यवस्था मोहनभाई के प्रस्तावित `अहिंसा` के बकवास के कारण ही था |

सब मिलाकर, अहिंसा सबसे ज्यादा खतरनाक असूल साबित हुआ जो भारत ने कभी देखा था |

क्या 1930 और 1940 के दशक में भारतीय इतने मूर्ख/बेवकूफ थे कि उन्होंने ये बकवास को देखा नहीं ? फिर क्यों उन्होंने इस बकवास के खिलाफ बोला नहीं ? ऐसा है, वे बेवकूफ थे | उन्होंने देखा था कि अहिंसा बकवास है, उन्होंने देखा था कि भजन-गाना, चरखा-चलाना बेकार है ,केवल टाइम-पास हैताकि कार्यकर्तओं के पास कम समय हो राजनीति और अन्य जरूरी विषय/मुद्दों पर बात करने के लिए | लेकिन समाचार-पत्रों ने इतना भावात्मक माहौल बना दिया मोहनभाई के लिए और मोहनभाई ने ये भावात्मक/भावुक माहौल का उपयोग/इस्तेमाल किया अपनी बात पर जोर डालने के लिए कि देखो, मैं अंग्रेजों द्वारा गिरिफ्तार किया जा रहा हूँ, मुझे सताया जा रहा है, इसीलिए मैं सही हूँ “ | 

आज, हम वो ही घटना दोहराते हुए देख रहे हैं | कांग्रेस ने अन्ना हजारे को गिरफ्तार/कैद किया 6 बजे सुबह,आधी रात को नहीं, ताकि सारा देश टी.वी पर लाइव देख सके | उन्हें तिहार जेल में भेजा गया बजाय कि सरकारी गेस्ट-हाउस/अतिथि-गृह के , ताकि अन्ना हजारे जी को  ज्यादा हमदर्दी/सहानुभूति मिले | हम सब को मालूम है कि कांग्रेस के बड़े नेता विदेशी कंपनियों के एजेंट है | ये सब ने अन्ना हजारे यानी मोहनभाई-2 के लिए हमदर्दी/सहानुभूति बड़ा दी| और अब अन्ना के साथी , चालाकी से ये हमदर्दी का दुरुपयोग कर रहे हैं बिना राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल/प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल के जनलोकपालके लिए समर्थन दिखाने के लिए | 

लगबग सभी लोगों ने , बहुत वफादार `इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्शन` के कार्यकर्ताओं सहित, इस बात पर सहमत हैं कि सुप्रीम कोर्ट के जज पुलिस-कर्मियों जितने ही भ्रष्ट हैं | जिन लोगों से मैंने बात की , वो इस बात से सहमत हैं कि लोकपाल भ्रष्ट हो सकता है, वैसे ही जैसे मंत्री, सांसद, सुप्रीम-कोर्ट के जज ,सभी भ्रष्ट हो गए हैं | और इसीलिए वे राईट टू रिकाल भ्रष्ट लोकपाल/प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल(भ्रष्ट लोकपाल को आम नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) के साथ जनलोकपाल की कीमत समझते हैं | 

लेकिन अभी भावुक अपील/विनती का उपयोग करके , `बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल के जनलोकपाल`के प्रायोजक इस बात को आगे बढ़ावा दे रही है कि देखो , अन्ना जी को सताया जा रहा है और इसीलिए `बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल के जनलोकपाल` सही है “ | ये तो ऐसा हुआ जैसे कहना कि  देखो , राजीव गाँधी ने अपनी माँ खोयी है, इसीलीये हम सब को उसके लिए वोट करना चाहिए “ | विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित टी.वी चैनलों और समाचार-पत्रों ने एक बहुत बड़ा भावुक माहौल खड़ा कर दिया है अन्ना जी के पक्ष में , और बिना राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल /प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल के जनलोकपाल के प्रायोजक इस का उपयोग/इस्तेमाल कर रहे हैं कहने के लिए देखो अन्ना जी को सताया गया , इसीलिए हमें बिना राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल का समर्थन करना चाहिए “|   

 

समाधान :

 

1.) हम `प्रजा अधीन-राजा` के कार्यकर्ताओं को खुले आम मांग करनी चाहिए चिदंबरम की पब्लिक में (सार्वजनिक) नारको-जांच के लि, ताकि हमें उसके इरादे पता चलें अन्ना जी को गिरफ्तार करने में,और हमें सुप्रीम-कोर्ट के जजों को कहना चाहिए प्रभारी को गिरफ्तार/कैद करने के लिए जिसने अन्ना के गिरफ्तारी का गलत आदेश दिया था |

2.) फिर हमें सभी को ये समझाना चाहिये कि अन्ना जी को सताया गया ह, इसका ये मतलब नहीं कि बिना राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल के जनलोकपाल सही है | यदि नागरिकों के पास राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल/प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल नहीं होगा ,तो भ्रष्ट लोकपाल विदेशी कंपनियों के एजेंट बन जाएँगे और दूसरे विदेशी एजेंट के गिरोह जैसे सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मिल जाएँगे और भारत को बरबाद कर देंगे |

3.) इसीलिए हमें राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल/प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल के साथ जनलोकपालका समर्थन करना चाहिए |

 

(32.11) कुछ महत्वपूर्ण सूत्र

 

1) `इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्शन` का सबसे बड़े नेता ये कहते हैं कि यदि लोकपाल अध्यक्ष और सदस्य भ्रष्ट हो जाएँगे , तो सुप्रीम-कोर्ट के जज उन्हें निकाल देंगे |

हमारे पास पहले से ही क़ानून है कि यदि सांसद भ्रष्ट हो जाए, तो हाई-कोर्ट के जज/सुप्रीम-कोर्ट के जज उसे निकाल सकते हैं और इसके लिए *उन्हें किसी की भी इजाजत नहीं लेनी पड़ती | लेकिन हम ये देखते हैं कि हाई-कोर्ट के जज कभी भी सांसदों को जायज सज़ा नहीं देते या सज़ा देते ही नहीं |

इसीलिए ये “ सुप्रीम कोर्ट लोकपाल को सज़ा देंगे “ उतना ही बेकार है जितना कि “हाई-कोर्ट भ्रष्ट सांसदों को सज़ा देंगे” का प्रावधान/क़ानून है |

इसीलिए हमें `राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल/प्रजा अधीन-भ्रष्ट लोकपाल के साथ जनलोकपाल की धाराएं/खंड की मांग करनी चाहिए |

*(“सुप्रीम-कोर्ट के द्वारा प्रयोग/इस्तेमाल की जाने वाले अधिकारों की सीमा ,जब वो अन्याय का पीछा करता है , आसमान जितनी ऊंची है,सुप्रीम-कोर्ट की एक बेंच/खंडपीठ ने कहा है “

 http://www.thehindu.com/news/national/article2288114.ece  )

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2) क्यों जनलोकपाल बिना दांत का (बेकार ) होगा ,बिना नागिकों के द्वारा भ्रष्ट लोकपाल को निकालने/बदलने के अधिकार के ?

दोस्तों, भ्रष्टाचार और रिश्वत देना का पता चल जाता है , और स्पष्ट/साफ़ होता है लेकिन उसका कोई सबूत नहीं होता 99% मामलों में |

इसीलिए यदि,लोकपाल सदस्य भ्रष्ट हो जायें, और कोई शिकायत है , तब सुप्रीम-कोर्ट के जज जांच का आदेश देंगे |

लेकिन कौन ऐसा मूर्ख होगा जो करोड़ों की रिश्वत लेकर , अपने बैंक के खाते में रखेगा? सुप्रीम-कोर्ट कभी भी अपराध साबित नहीं कर पायेगी | क्यों ? कोई सबूत नहीं होगा |

लेकिन यदि नागरिकों के पास भ्रष्ट लोकपाल सदस्य को बदलने का अधिकार हो , `प्रजा अधीन-लोकपाल/राईट टू रिकाल-लोकपाल` के आने से,  नागरिकों को भ्रष्टाचार का पता लग जाये लेकिन कोई साबुत नहीं हो तो भी | कोई भी जांच नहीं, कोई कमिटी नहीं, कोई देरी नहीं---जब करोड़ों लोग बोलेंगे तो सामूहिक दबाव बनेगा और लोकपाल को बदलना पड़ेगा |

आम नागरिकों को सत्ता |

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3) 65 सालों से , आप ( नेता , उच्च वर्ग और उनके एजेंट बुद्धिजीवी) बोल रहे हैं ` अभी नहीं , बाद में ` जब भी लोग `आम नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने के अधिकारों` की मांग करते हैं |

 

65 साल पहले , एम.एन.रॉय ने ऐसी प्रक्रियाएँ/तरीकों की मांग की थी |

लेकिन एक नेता जिसका नाम नेहरु है,ने भ्रष्ट जजों और जमीन-मालिकों के साथ, बड़ी बेशर्मी से  एक लोक-तांत्रिक प्रक्रिया/तरीका हटा दिया जिसका नाम `उरी सिस्टम` था बजाय कि उसको मजबूत करने के |तब नेताओं ने बोला `अभी नहीं` |

फिर, 1970 के दशक में, ज.पी.नारायणन ने भी ये मांग की थी, लेकिन आप ने बोला`अभी नहीं` |फिर , 2004 में राजीव दिक्सित और दूसरों लोगों ने सूचना अधिकार कमिश्नर के लिए ` भ्रष्ट सुचना अधिकार-कमिश्नर को नागरिकों द्वारा बदलने के अधिकार ` की मांग की, लेकिन जवाब आया `अभी नहीं` |

आप अब सच बोल क्यों नहीं देते `देश को बाढ़ में जाने दो , हम ऐसी प्रक्रियाओं/तरीकों का विरोध करते हैं जिससे आम नागरिकों को भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने का अधिकार मिले |`   

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4) हम पुलिस कमिश्नर,कलक्टर,मंत्रियों, सांसदों,जजों आदि के भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं |

यदि “लोकपाल बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल/प्रजा अधीन-लोकपाल “ पास होता है, तो हम एक और संस्था के भ्रष्टाचार से लड़ना पड़ेगा ---- लोकपाल सदस्यों के भ्रष्टाचार से !!

इसीलिए यदि आपको केवल लड़ने के लड़ना अच्छा लगता है, तो `बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल के जनलोकपाल` को समर्थन करें |                   

लेकिन यदि आपका उदेस्श्य भ्रष्टाचार कम करना है, और सार्थक रूप से ये लड़ाइयां कम करना चाहते हैं ताकि हम कुछ ऐसा काम कर सकें जो आम जनता के फायदे का हो , तो कृपया `राईट टू रिकाल-लोकपाल के खंड/धाराओं के साथ लोकपाल/जनलोकपाल  बिल ` को समर्थन करें |

 

(32.12) कुछ सुझाव `प्रजा अधीन-राजा`कार्यकर्ताओं के लिए `प्रजा अधीन-राजा`-विरोधी लोगों के समय-बर्बादी योजना से  निबटने/पेश आने के लिए

 

जैसे कि `प्रजा अधीन-राजा` के प्रक्रियाएँ/तरीके/ड्राफ्ट को ज्यादा स्वीकृति मिलती है, `प्रजा अधीन-राजा`-विरोधी लोग कोशिश करेंगे कि `प्रजा अधीन-राजा` कार्यकर्ताओं का समय बरबाद करने के लिए बेकार के बहस में , ताकि `प्रजा अधीन-राजा` के ड्राफ्ट-तरीके/प्रक्रियाएँ ज्यादा फैलें नहीं |

इसीलिए कुछ सुझाव दे रहा हूँ , कि किस तरह बहस करना चाहिए `प्रजा अधीन-राजा ` के प्रक्रियाओं/तरीकों पर –

1) आज के प्रक्रियाओं/तरीकों को प्रस्तावित प्रक्रियाओं/तरीकों से तुलना करनी चाहिए और देखना चाहिए कि कैसे वे देश को फायदा या नुकसान करती हैं, कोई परिस्थिति में –

`प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी ये कोशिश करेंगे `प्रजा अधीन-राजा` कि कमियाँ बताने के लिए | वे बहस को एक-तरफा  करने कि कोशिश करेंगे , यानी कि `प्रजा अधीन-राजा` के ड्राफ्ट के कमियां ही कि बात हो ,बिना वर्त्तमान(आज के ) सिस्टम से या उनके पसंद के कानूनों से तुलना करने के |

 

2) कृपया सभी को अपना रूख साफ़ करने के लिए कहें किसी मुद्दे या ड्राफ्ट-क़ानून पर (अभी, अगले जन्म में नहीं) | 

बिना `प्रजा अधीन-राजा`-विरोधी के अपना रुख साफ़ किये , बहस करना समय की बर्बादी है |

उदाहरण – `क्या आप/वे समर्थन करते हैं या विरोध करते हैं `जनलोकपाल बिना राईट टू रिकाल-भ्रष्ट लोकपाल /प्रजा अधिना-भ्रष्ट लोकपाल के खंड/धाराएं का ?

यदि वे कहते है-कि वे उसका विरोध करते हैं, तो पूछें कि वे क्या कर रहे  हैं , उसका समर्थन करने के लिए ?

यदि वे कहते हैं कि वे उसका समर्थन कर रहे हैं, तो उनको कहें उन खंड/धाराओं को कॉपी पेस्ट करने के लिए , जो जनलोकपाल बिल/क़ानून में हैं, जिसके द्वारा लोकपाल रिश्वत लेने और विदेशी बैंकों में जमा करने से रोक सकती हैं और देश को विदेशी कम्पनियाँ आदि, सबसे ज्यादा रिश्वत देने वाले को बेच देंगे | कृपया खंड/धाराएं डालने पर जोर दें क्योंकि धाराओं के बिना , `प्रजा अधीन-राजा`-विरोधी जानबूझ कर या अनजाने में, गलत तथ्य/बातें बता सकते हैं , जो क़ानून के धाराओं/खंड में नहीं लिखी गयी हैं , उदाहरण., वे कहते हैं कि जनलोकपाल बिल/क़ानून के अनुसार `आम नागरिक लोकपाल को निकाल सकते हैं |` लेकिन सच्चाई ये है, कि कोई भी , सुप्रीम कोर्ट के जज के आदमी सहित /समेत, एक याचिका डाल सकता है , जिसके बाद सुप्रीम-कोर्ट जज फैसला करेंगे कि लोकपाल को निकालना है कि नहीं |   

यदि वे खंड/धाराएं दिखाते हैं जो कहती हैं कि सुप्रीम-कोर्ट के जज भ्रष्ट लोकपाल को निकालेंगे , तो पूछें कि सभी शक्तियों/अधिकारों वाले सुप्रीम-कोर्ट के जज क्यों भ्रष्ट सांसद ,मंत्रियों को उचित सज़ा नहीं दे रहे और सुप्रीम-कोर्ट के जज, यदि ईमानदार भी हुए तो भी लोकपाल को बिना सबूतों के सज़ा नहीं दे पाएंगे | क्योंकि विदेशी/स्विस बैंक, स्विस-बैंक खातों और  लेन-देन की जानकारी नहीं देंगे |

यदि वे कहते हैं, कि सुप्रीम-कोर्ट के जज, मंत्रियों, सासदों को सज़ा तो देते हैं, को फिर पूछें कि क्यों उनको लोकपाल बिल को लाने की जरुरत है और क्यों वे सुप्रीम-कोर्ट के जज को नहीं लिखते हैं, जिनपर उनको इतना विश्वास है बजाय कि करोड़ों रुपये लोकपाल पर खर्च करने के ?

यदि वे कहते हैं कि सुप्रीम-कोर्ट के जजों के पास अधिकार नहीं हैं सांसद, मंत्रियों को सज़ा देने या उनपर कार्यवाई करने के लिए तो उन्हें `हिंदू` समाचार पत्र में ये लेख दिखाएँ , जहाँ सुप्रीम-कोर्ट के जज कह रहे हैं कि  `उनके अधिकारों की सीमा आसमान जितनी ऊंची है ` |
(“The limits of power exercised by the Supreme Court when it chases injustice, are the sky itself, a Bench of the apex court has said.
http://www.thehindu.com/news/national/article2288114.ece )

 

3) नाम जरूरी नहीं है, प्रक्रिया/तरीका/विधि जरूरी है |

तीन राज्यों में –राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ में, एक क़ानून है, जिसका नाम है `राईट टू रिकाल-कार्पोरेटर` लेकिन इन तीनों राज्यों में इस के प्रक्रियाएँ/तरीके अलग-अलग हैं और हमारा प्रस्तिवित क़ानून भ्रष्ट कर्पोराटर(पार्षद) को बदलने/निकालने के लिए अलग है | इसीलिए कृपया प्रक्रिया पर ध्यान दें और `प्रजा अधीन-राजा`-विरोधी को बोलें कि ड्राफ्ट/क़ानून के धाराएं को प्रस्तुत करे/बताये , जिसके बारे में बात कर रहा है |

 

4) कृपया केवल प्रक्रिया और धाराओं/खंड पर ध्यान दीजिए , कैसे वे हमारे देश को फायदा या नुकसान करेंगी कोई परिस्थिति में |

`प्रजा अधीन-रजा` के विरोधी अपनी पूरी कोशिश करेंगे असली मुद्दे से हटाने के लिए , व्यक्तियों के बारे में बात कर के और व्यक्तियों को एक दूसरे से तुलना कर के | केवल प्रक्रियाएँ/तरीके सिस्टम में बदलाव ला सकती हैं, अच्छी या बुरी | इसीलिए , कृपया प्रक्रियाएँ/तरीकों पर ध्यान दीजिए |

और, प्रक्रिया/तरीका बताता है कि क़ानून अच्छा है या बेकार | ऊपर लिखित `प्रजा अधीन-कोर्पोरेटर` क़ानून तीनों राज्यों में एक दम बेकार हैं क्योंकि वे आम नागरिकों को भ्रष् कोर्पोरेटर को हटाने/बदलने का अधिकार नहीं देते | उदाहरण- बिहार का `राईट टू रिकाल-कोर्पोरेटर`क़ानून कहता है कि उस क्षेत्र के 66% नागरिक, यदि अपने हस्ताक्षर इकठ्ठा करके कलेक्टर को दें, तो कलेक्टर हस्ताक्षरों की जांच करेगा , और यदि हस्ताक्षर सही पाए गए , तो वो कोर्पोरेटर हटा दिया जायेगा | लेकिन ,हमारे देश में हस्ताक्षरों की जांच नहीं हो सकती क्योंकि सरकार के पास नागरिकों के हस्ताक्षरों का कोई रिकोर्ड नहीं है | इसीलिए हमें, प्रक्रियाएँ/तरीकों और ड्राफ्ट और उनके धाराओं पर ध्यान देना चाहिए, केवल प्रस्ताव पर नहीं | 

5) दो देशों या दो क्षेत्रों के भ्रष्टाचार की तुलना करना -

दो देशों या दो क्षेत्रों के भ्रष्टाचार की तुलना करते समय, भ्रष्टाचार को एक देश/क्षेत्र के विभाग से दूसरे देश/क्षेत्र के विभाग से तुलना करें , जिला,राज्य और राष्ट्र स्तर पर | जो प्रक्रियाएँ/तरीके अभी (वर्त्तमान) हैं, उनकी तुलना प्रस्तावित प्रक्रियाएँ/तरीकों से करें और  सटीक/सही परिस्थिति दें कि कैसे प्रस्तावित प्रक्रियाएँ/तरीके देश को नुकसान या फायदा पहुंचा सकते हैं वर्त्तमान/मौजूदा प्रक्रियाएँ/तरीकों कि तुलना में , प्रक्रियाओं-ड्राफ्ट के खंड/धाराओं को बताते हुए | 

 

(32.13) कुछ और चालें जो `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी जो इस्तेमाल करते हैं असल मुद्दे से हटाने के लिए

 

बहुत जल्दी , सभी नेता `प्रजा अधीन-राजा` की बात करने पर मजबूर हो जाएँगे और असल मुद्दे से ध्यान हटाने से कोशिश करंगे , यानी भ्रष्ट लोकपाल , प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, जज, आदि आम नागरिकों द्वारा से ध्यान हटाने कि कोशिश करेंगे |  

हमें कार्यकर्ताओं को बताना है वे चालें जो `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी इस्तेमाल करते हैं असली मुद्दे से हटाने के लिए | कौन सी चालें ?


1. `प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी बेकार और प्रबंध न किया सकने वाला हस्ताक्षर-आधारित प्रक्रिया पर जोर देंगे और हाजिरी-आधारित भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने की प्रक्रियाएँ/तरीकों का विरोध करेंगे |

और इसीलिए हम कार्यकर्ताओं को बताएँगे कि सच्चे `प्रजा अधीन-राजा` के कार्यकर्ता हमेशा `हाजिरी वाले भ्रष्ट को बदलने के तरीकों ` को समर्थन करेंगे | हजारी वाले तरीकों में ,व्यक्ति को खुद पटवारी/टालती के दफ्तर जाना होता है और अधिकारी के विकल्प को समर्थन देना होता है | जबकि हस्ताक्षर वाले तरीके में, कार्यकर्तओं को हस्ताक्षर इकठ्ठा करना होता है और सरकारी अफसर को हस्ताक्षर जांच करना होता है, जो कि संभव नहीं है क्योंकि हमारे देश में सरकार के रिकोर्ड में नागरिकों का हस्ताक्षर नहीं है |

 

2. `प्रजा अधीन-राजा ` के विरोधी `प्रजा अधीन-सरपंच`,`प्रजा अधीन-कोर्पोरेटर (पार्षद) आदि का समर्थन करेंगे और `प्रजा अधीन-लोकपाल , `प्रजा अधीन-प्रधानमंत्री` का विरोध करेंगे |

हमें सभी कार्यकर्ताओं को बताना है कि ऐसा व्यक्ति जो `प्रजा अधीन-सरपंच` जैसे  भीख और चिल्लर की बात करता है , वो नकली `प्रजा अधीन-राजा` का समर्थक है | क्योंकि ये सब पद-सरपंच , कोर्पोरेटर आदि के पास `प्रधानमंत्री ,मुख्यमंत्री आदि के मुकाबले कुछ खास अधिकार नहीं होते और इसीलिए ऐसे पदों पर `प्रजा अधीन-राजा`भीख समान है |

3. `प्रजा अधीन-राजा` का विरोधी ड्राफ्ट/मसौदे पर चर्चा से बचना कहेगा |

हमें उसका सामना करना चाहिए और उसकी बेइज्जती भी करनी चाहिए कि “ क्या तुम ड्राफ्ट अगले जन्म में दोगे? “

और भी चलें हैं | मैं बाद में सभी चालों की लिस्ट/सूची बनंगा जो ,`प्रजा अधीन-राजा` के विरोधी इस्तेमाल करते हैं | और हमें कार्यकर्ताओं को जवाबी चलें भी पहले से बतानी हैं |

 

(32.14) बिना `राईट टू रिकाल-लोकपाल (प्रजा अधीन-लोकपाल) जनता द्वारा` के जनलोकपाल का खेल और कैसे विदेशी कम्पनियाँ लोगों का गुस्सा का इस्तेमाल कर रही हैं भारत को फिर से गुलाम बनने के लिए

 

क्या होगा यदि जनलोकपाल विदेशी कंपनियों  से रिश्वत लेते हैं और विदेशी बैंकों में पैसा जामा कर देते हैं और इस तरह विदेशी कंपनियां या ईसाई धर्म-प्रचारकों के या सौदी अरब के इस्लाम के धर्म-प्रचारकों के एभ्रष्ट एजेंट बन जाते हैं ?

मैं एक सवाल पूछता हूँ-क्या होगा यदि जनलोकपाल भ्रष्ट हो जाते हैं ? उससे भी बुरा कि वे विदेशी कंपनियों से रिश्वत लेते हैं, और विदेशी बैंकों में पैसा जमा करके , विदेशी कंपनियों ,ईसाई धर्म-प्रचारकों, इस्लामी कट्टरपंथियों के एजेंट बन जाते हैं ?

क्या यदि 2012 की चुनाव समिति, खुद इन एजेंटों से भर जाती है, जो ऐसे व्यक्तियों को लोकपाल बनाये जिनकी साफ़-सुथरी छवि/नाम है , लेकिन अंदर से  विदेशी कंपनियों के एजेंट हैं ? इसका जवाब ये समझायेगा कि क्यों टी.वी चैनल `बिना `नागरिकों द्वारा भ्रष्ट लोकपाल को निकालने के अधिकार (राईट टू रिकाल-लोकपाल) के धाराओं के साथ जनलोकपाल का घंटो-घंटों प्रचार कर रहे हैं |

विदेशी कंपनियों को जनलोकपाल चाहिए ताकि उनको केवल 11 जनलोकपाल को रिश्वत या प्रभावित करने होगा और उनको हज़ारों आई.ऐ.एस(बाबू), पुलिसकर्मी,जज को रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी | हर जिले के आई.ऐ.एस(बाबू),पोलिस-कर्मी,जजों,पार्टियों के 10-15 प्रधान/मुखिया/प्रमुख/अध्यक्ष होते हैं और कुछ 50-75 प्रधान ,हर राज्य में होते हैं | कुल मिलाकर कुछ 10,000 जिले स्तर के प्रधान और कुछ 2000 राज्य स्तर के प्रधान हैं| इनको संभालने के लिए , विदेशी कंपनियों और ईसाई धर्म-प्रचारकों को `राडिया` के तरह के बिचौलिए चाहिए, जो 200-500 % अपना हिस्सा/मुनाफा रखते हैं | लेकिन एक बार 11 जनलोकपाल आ जाते हैं, विदेशी कंपनियों और मिशनईसाई धर्म-प्रचारकों) को केवल 11 जनलोकपाल को ही रिश्वत देनी पड़ेगी और सारे 10,000 जिले स्तर के नेता/आई,ऐ.एस(बाबू)/पोलिस-कर्मी/जज और 2000 राज्य या राष्ट्रिय स्तर के नेता/आई.ऐ.एस/पोलिस-कर्मी/जज ,इन 11 जनलोकपाल के नीचे आ जाएँगे और भारतीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण/शाशन कर पाएंगे अपने एजेंटों द्वारा |    

कई सालों से ,मैं सभी भारत-समर्थक/शुभ-चिन्तक लोगों को बोल रहा हूँ कि ऐसे कानून-ड्राफ्टों की चर्चा करें और पढ़ें जिनके द्वारा वे भारतीय प्रशासन को ठीक कर सकते हैं और सभी साथी नागरिकों को ऐसे कानों-ड्राफ्ट के बारे में बताएं | लेकिन , दुःख कि बात है, कि बहुत कम लोगों ने मुझे सुना | ज्यादातर भारत-समर्थक/शुभ-चिन्तक नागरिकों ने  अपने नेता की बात को सुना, जिन्होंने जोर दिया कि क़ानून-ड्राफ्टों को छोड़ देना चाहिए और इसके बदले हम को ये चीजों पर ध्यान देना चाहिए –

1. राष्ट्रिय चरित्र/व्यवहार बनाना –इसका जो भी मतलब है ( आर.एस.एस का विषय/मुद्दा)

2. नागरिकों को योग, प्राणायाम, आयुर्वेद के बारे में बताना ( भारत स्वाभिमान न्यास  का विषय/मुद्दा)

3. केवल कांग्रेस के खिलाफ नफरत फैलाना (भा.जा.पा. का विषय/मुद्दा)  

4. सदस्य बनाना और दान लेना (आर.एस.एस ,भा.जा.प् , भारत स्वाभिमान का विषय/मुद्दा)

5. आध्यात्मिक उन्नति (आर्ट ऑफ लिविंग और अन्य अआध्यत्मिक संस्थाएं)

6. शिक्षा, पर्वावरण (अलग-अलग स्वयं सेवी संस्थाएं)

7.चुनाव जित्त्ने पर ध्यान (आर. एस.एस, भा.जा.पा.,आदि पार्टियां)

आदि ,आदि  | कुल मिलाकर, 24 घंटे हर दिन, 7 दिन हर हफता , सभी चीजें करें , लेकिन ,एक मिनट भी नहीं लगाएं ड्राफ्ट को पड़ने में , या अन्य नागरिकों को ड्राफ्ट के बारे में | और सालों से ,मैं ये सुझाव दे रहा हूँ कार्यकर्ताओं को नागरिकों को बोलें कि प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री को मजबूर करें कि अच्छे(और कम बुरे) कानूनों को लागू करने के लिए जो भारत की समस्याएं को कम करता है | कौन सांसद, विधायक ,प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री, आदि बनता है , वो इतना जरूरी/महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए |

इस तरह कानूनों में सुधार नहीं आया , नागरिकों का गुस्सा बढ़ता गया और इससे विदेशी कम्पनियाँ/ईसाई मिशनों(प्रचारक) को ये “ जनलोकपाल बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल जनता द्वारा` को लाने के लिए प्रयोजन करने के लिए | हमें क्यों मुश्किल हो रही है “ जनलोकपाल राईट टू रिकाल-लोकपाल नागरिकों द्वारा के साथ “ का प्रचार करने के लिए ? इसीलिए नहीं कि `राईट टू रिकाल` मुश्किल है समझाने के लिए या समझने के लिए | इसलिए कि कार्यकर्त्ता-नेता बोल रहे हैं कार्यर्ताओं को कि क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान नहीं दो |

दशकों से , भारत में माध्यम वर्ग/दर्जे के लोग ,को कष्ट झेलना पड़ रहा है , केवल भ्रष्टाचार से ही नहीं, बल्कि देरी, समय की बर्बादी, और एक सामान्य अनिश्चितता महसूस होती है जब भी सरकारी दफ्तर और कोर्ट जाते हैं |  निचले वर्ग/दर्जे के लोगों को भी ये हर समय सामना करना पड़ता है और इसके अलावा, अत्याचार भी सहना पड़ता है | कार्यकर्ता हर समय उन कानूनों के लिए प्रचार करने के लिए तैयार रहते हैं जो ,इस समस्या को कम कर दे | लेकिन कार्यकर्त्ता-नेता कार्यकर्ताओं को “ठहरो और देखो” के लिए कर पाए और इसीलिए कार्यकर्ताओं ने केवल ठहरा और देखा ,और क़ानून-ड्राफ्ट के लिए प्रचार नहीं किय , जो भ्रष्टाचार, कष्ट, अनिश्चितता, अत्याचार आदि को कम कर सकते थे | इसीलिए गुस्सा बढ़ता गया |

विदेशी कम्पनियाँ और ईसाई मिशन/धर्म-प्रचारकों ने अपने टी.वी. चैनलों को तैनात किया , इस गुस्से को सांसदों केतारफ मोड़ने के लिए और उन पर दबाव डालने के लिए , एक ऐसे क़ानून पास करने के लिए जो विदेशी कंपनियों और ईसाई धर्म-प्रचारकों का भारत पर नियंत्रण को और बढ़ाएगा | कोई देख सकता है कि घंटों-घंटों टी.वी चैनलों ने दिए हैं , जनलोकपाल को बढ़ावा करने में और उन लोगों का प्रचार करने के लिए जो जनलोकपाल का समर्थन करते हैं | भारत के कितने लोग अन्न को मार्च-2011 में जानते थे  ? कुछ 20% लोग महाराष्ट्र में जानते थे और बाकी भारत में केवल 0.1% ही लोग जानते थे | लेकिन अन्ना ने जनलोकपाल का समर्थन किया और विदेशी कंपनियों ने उसे मोहनभाई-2 बना दिया | और अन्ना जी असल में मोहनभाई-2 ही है, क्योंकि मोहनभाई (गांधी) का प्रचार अभियान के लिए पैसे भी अंग्रेजों(उस समय के विदेशी कम्पनियाँ) द्वारा ही किया गया था |

और इस तरह जनलोकपाल का खेल है कि लोगों के गुस्से का प्रयोग/इस्तेमाल करना , सांसदों को मजबूर करना एक ऐसे क़ानून को लागू करने के लिए, जो विदेशी कंपनियों और ईसाई धर्म-प्रचारकों को ज्यादा आसानी से भारत पर नियंत्रण/शाशन करने दे |

इन सब के लिए मीडिया और `इंडिया अगेंस्ट कोर्रुप्शन के नेताओं`  द्वारा बहुत सारे झूठ बोले जा रहे हैं|

उनमें से कुछ ये हैं , सच्चाई के साथ –

 

1)  शिकायत निवारण प्रणाली आने से आप का राशन कार्ड सही बनेगा , रोड सही बनेगी आदि आदि |

सच्चाई – ये सब अधिकार मंत्रियों के पास भी है , लेकिन भ्रष्ट मंत्रियों के पास इन सब के लिए समय नहीं है ,वे विदेशी कंपनियों से रिश्वत लेकर विदेशी गुप्त खाते में रखने में व्यस्त हैं | ऐसे ही लोकपाल भी भ्रष्ट हो कर करेगा |

 

2) हांगकांग जैसा स्वतंत्र लोकपाल सिस्टम हमारे देश में लाया जा रहा है , जिससे भ्रष्टाचार कम होगा |

सच्चाई- हांगकांग में लोकपाल स्वतंत्र नहीं है, विधान सभा द्वारा चुनी जाती है और निकाले जाते हैं |

और हांगकांग में भ्रष्टाचार का कम होने का असली कारण लोकपाल जैसा क़ानून नहीं, मजबूत किया गया जूरी सिस्टम है | 1997 के बाद वहाँ जूरी सिस्टम को मजबूत किया गया और भ्रष्टाचार कम हुआ है | वहाँ का लोकपाल फेल है क्योंकि वहाँ लोकपाल के अध्यक्ष को ही जूरी ने भ्रष्ट पाया |और जिन देशों में जूरी सिस्टम नहीं है और केवल लोकपाल है, वहाँ पर भ्रष्टाचार बढ़ा जैसे फिलिपिन |

 

3) लोकपाल स्वतंत्र होगा, नेताओं से कोई प्रभावित नहीं होगा, सारा सिस्टम पारदर्शी होगा –

सच्चाई- लोकपाल हमेशा जजों , जो लोकपाल को निकाल सकते हैं , के धमकियों के प्रभाव में रहेगा| नेताओं और विदेशी कंपनियों का जजों पर नियंत्रण होता है और उनके द्वारा ,लोकपाल  ,उनके प्रभाव में रहेगा |

 

4) जनलोकपाल की शिकायत प्रणाली(सिस्टम)- जैसे की पहले लिखा गया है, जनलोकपाल में शिकायत डालने के लिए किसी को एफ.आई.आर लिखवाना होगा और फिर उस इफ.आई.आर को लोकपाल को भेजना होगा , शिकायत के साथ  लोकपाल अपनी वेबसाइट पर हर महीने , सारी शिकायतों का सारांश वेबसाइट पर रखेगा |  

सच्चाई- लोकपाल शिकायतों के साथ छेड-छाड कर सकता है बड़ी आसानी से और ऐसी शिकायोतों को दबा सकता है जो लाखों लोगों की है |लोकपाल केवल शिकायतों का केवल सारंश और संक्षिप्त रूप ही दे सकता है और लोकपाल कह सकता है कि उसने मामले की जांच की है, भले उसने जांच की हो या नहीं की हो | ऐसा इसीलिए क्योंकि लोकपाल के पास सर्वाधिकार रहेगा | ऐसा  हो सकता है कि किसी बढ़ी शिकायत की सुनवाई ना करे जो करोड़ों लोगों की हो और जिनके पास महेंगे/बड़े वकील न हों| लोकपाल ऐसी शिकायत परदेरी भी कर सकता है ,उसे महत्वहीन /गैर-जरूरी बताते हुए |

और भी अन्य झूठ बोले जा रहे हैं | इसलिए कृपया पूरा बिल पढ़ें , क्योंकि पूरा बिल पास होना है |

कुल मिलाकर, विदेशी कम्पनियाँ सफल हुई हैं, लोगों को गलत रास्ते पर ले जाने के लिए | ये मुख्य रूप से इसीलिए हुआ क्योंकि नेताओं और कार्यकर्ता-नेताओं ने कार्यकर्ताओं को सही रास्तों की तरफ देखने से रोका | जब ऐसे नेता आस-पास हों , तो विदेशी कंपनियों को ज्यादा मेहनत नहीं करनी है , भारत पर नियंत्रण/शाशन करने , उसको गुलाम बनने के लिए और देश के 99% लोगों को लूटने के लिए |    

 

 

 

 

The  Jan  Lokpal  Conspiracy  and  Praja-adheen  Lokpal  way out


Suggestions on the Lokpal draft

 

The document http://rahulmehta.com/lokpal.pdf has 4 pages -- the exact text of 3 + 12 = 15 clauses I have proposed for addition to the existing proposed Lokpal draft. This document you are reading is chapter-50 of http://rahulmehta.com/301.pdf . It has explanations in detail. Another detailed document is http://righttorecall.com/lokpal2.pdfwill come in April end. The suggestions put in this article have been submitted to Lokpal consultation website and serial number given is #A247LB . So if you like these suggestions, pls send #A247LB to Annaji via SMS, email or postcard.

 

I would try that History doesn’t repeat itself

 

Some 7 years back, when RTI-law-draft was being discussed, I cited 3 fatal flaws  ---

1.               the RTI-law-draft does not enable a citizen to put his RTI application on a GoI website

2.               the RTI-law-draft doesn’t allow citizens to add their names to an existing RTI application and thus lower middle class and lower class citizens cannot prove numerical support to an RTI application and without help of media, which is quite biased in favor of upper class.

3.               the RTI-law-draft doesn’t have procedure by which citizens can  replace/retain Information Commissioners and so almost all Information Commissioners will become corrupt and then RTI will become a useless tool in the fight against corruption.

 

(1) and (2) is what I call as utter lack of Transparent Complaint Filing in the RTI-law-draft and (3) is what I call as lack of Right to Recall (and Reject). The Right to Recall via Jury System or explicit majority approval is must to reduce corruption. No country in world, except Japan has achieved low corruption with Jury or RTR or both. I have explained Right to Recall aka Prajaadheen Raja in chap-1 of  http://rahulmehta.com/301.pdf  and will cite part of it in context of Right to Recall Lokpal. A belief that corruption can reduce without RTR (via Jury or majority approval) by installing super-Gods like Information Commissioners or Lokpals is like hoping that Mafia Chiefs will reduce crimes. But the apex activists in year 2004 said that “we must insist on RTI-law-draft without transparent complaint filing and without Right to Recall clauses, and only after RTI2 passes, we will later make sure that these clauses get added”. In the field of activism, the word “later” means “next life time”. Back then I had less courage to spend my own money in advertising these fatal flaws and remedies. And lesser courage made me put faith in the promise of “later”. The RTI-law-draft passed without any transparent complain filing clauses and without Right to Recall Information Commissioners. Look and see for yourself --- so many RTI-awareness classes has been held , so many RTI applications have been filed and so much time and money has been spent and wasted. But corruption did not decrease by even 1%. The RTI-law-draft today has become a defunct tool in the fight against large cases of corruption/nepotism in judges, Ministers, IAS, IPS.

Today in Apr-2011, many things have changed, but more they change, more they remain same. Back in 2004, RTI was hot and promises were thrown that come RTI and corruption will reduce by 90%. Today (apr-2011), Jan Lokpal is trendy and Annaji says that Lokpal will reduce corruption by 90%. But today, Annaji or his team, who are now members of very powerful Govt Committee to draft Lokpal bill, insist that Lokpal Act should be without Transparent Complain Filing clauses and without Right to Recall Lokpal clauses. And Anna or his team members may say that Transparent Complaint Filing should be put “later” i.e. in the next life time, and oppose the humble request of uncivil society (aka common citizens) to add it “now”. The only change between 2004 and now is a very tiny one --- this time, I have decided to spend my own hard earned post tax money to ensure that at least a few hundred activists do know about these 3 fatal flaws in Lokpal drafts and do know about remedies and also know that Anna added these remedies or Anna refused to add these remedies. Unlike Anna who got backing of 50 TV-channel-sponsors and 400 newspaper-sponsors across India, I am backed only by my own income only. Taking the information about Right to Recall Lokpal clauses to a few hindered activists via newspaper ads and internet -- is as far as I can go with my own limited money. Rest will be decided by the priorities and decisions of activists who come to know about my proposed additions in the Lokpal bill via my limited campaign.

 

Major/minor short-comings in the Lokpal draft

 

The Jan Lokpal proposed by Anna Hazare is a 27-page draft with about 35 clauses, some 200 sub-clauses and 400 sub-sub-clauses. (pls see http://indiaagainstcorruption.org/doc/lokpal_bill_1.3.pdf or see http://rahulmehta.com/lokpal_bill_1.3.pdf  as alternate link). I will focus on the some very critical shortcomings of drafts and I will enumerate the additional proposed clauses which can reduce these fatal shortcomings..

 

Critical comings, and proposed solutions

 

1.               Selection procedures (section-6.6.i) are completely void of transparency : Section-(6)(6)(i) of Jan Lokpal says “i. Public feedback shall be invited on the shortlisted names by putting these names on the website”. But draft is completely void of ways and means by which 75 crore or even 1 crore citizens can send feedback in transparent way. E.g. say I send a letter to Lokpal Selection Committee Chairman that “appoint Mr. NaMo as Lokpal” or “appoint Mr. Nitish as Lokpal”, and the Lokpal Selection Committee Chairman may say – “you never sent such a letter” or replace my letter with letter saying “appoint Mr. X as Lokpal”. This is very much possible. Solution is to have procedure by which citizen can post affidavit on Lokpal’s website by visiting Collector’s office. Likewise, if 50 lakh people send a letter saying “pls appoint Mr. NaMo as Lokpal”, the Committee may say “they got only 10 lakh such letters”. Solution? The Transparent Complaint Filing (described in next point) will almost eliminate this problem.

2.               Transparent Complaint Filing is must : A corrupt Lokpal or Lokpal who is agent of MNCs may say : you never sent me the full complain !! Let me give a detailed example : (i)say I send a 20 page long complaint against a Justice or a Minister by registered ad postal mail (ii)say Honorable Lokpal has nexuses with that Justice or that Minister, or if Lokpal is an MNC agent and those MNCs have asked Lokpal to protect that Justice/Minister (iii)then Lokpal can remove 5-10 key pages from envelope, and then tell me after 3 months, that “you never sent the full complaint and so we had to dismiss your complaint”. In a country where whole files disappear, this is more than likely. Solution I propose is to add 3 clauses in Lokpal draft that would enable citizens to DIRECTLY put affidavits (complaints) on the website of Lokpal via personally visiting Collector’s office. If Lokpal now tries to remove pages, the citizens will come to know immediately because of 100s of backups taken by private and Govt bodies’ software.

3.               Right to Recall Lokpal aka Prajaa-aadheen Lokpal is must  : If Lokpal becomes corrupt then citizens will have to wait for five years, or do another hunger strike. Hunger strike needs support of media. Without support of media, hunger strike doesn’t even kill a mosquito. E.g. Forty lakh people died in Bengal due to hunger and famines in early 1940s and paid or unpaid media did not give any attention. But when Mohanbhai were to stay hungry for even 5 days, British-paid media would create perception of earth-quakes. So hunger strike is not an option for the hungry and poor – it is only for those who are well connected with paid or unpaid media. Now given that selection committee for Lokpal is governed by Speakers, SCjs, HCjs --- the possibility that a person as corrupt as S. Pawar, but with a clean image, will become an Lokpal is real. The solution I propose is : we should add clauses in both Lokpal draft that would enable us citizens to expel/replace Lokpal aka Right to Recall Lokpal.

4.               Right to Retain Lokpal : Say the Lokpal is honest, but SCjs are as non-corrupt as S. Pawar. Now in the proposed IAC  Lokpal draft, SCjs can expel Lokpal (pls see section-7). So if SCjs are as non-corrupt as Pawar, then they may expel Lokpal. Now both Lokpal bills provide no means for citizens to re-install that honest Lokpal back. i.e. both lack Right to Retain Lokpal. In fact, the fact that Lokpal can be expelled by SCjs make him dependent and not independent. The relative-lawyers of SCjs may constantly threaten Lokpal and extort favors from him, just as Ministers’ relative extort favors from officials. Solution I propose is adding Right to Retain clauses, which would enable citizens to re-install a non-corrupt Lokpal expelled by corrupt people in power.

5.               Right to Reject Lokpal : A procedure similar to Right to Recall Lokpal can also work as Right to Reject Lokpal.

6.               The Hindi translation of Jan Lokpal bill is still unavailable as on 12-apr-2011. Some BST activists provided a Hindi translation in Dec-2010, but IAC-apex did not like that translation, and refused to put that translation even as “unofficial work under progress” translation. The unofficial Hindi translation is at http://rahulmehta.com/unofficial.hindi.janlokpal.pdf   . Due to lack of official Lokpal draft in Hindi, it has become impossible to discuss the Lokpal-law-draft with commons. And now that draft committee is re-writing the draft, this issue is serious, but gone. Lets hope that draft committee does give intermediate drafts in Hindi.

Other short comings, and proposed solutions

7.               The two page pamphlet and actual 26 page Jan Lokpal draft are grossly inconsistent with each other. Eg two page pamphlet says that Jan Lokpal will be independent, where as 26-page draft (section-6) says that Supreme Court judges may expel Lokpal. So if SCjs are as honest as S. Pawar, and most of them are like S Pawar, then Lokpal will be dependent on SCjs mercy – not really independent. Again, as on Apr-12-2011, the draft is being re-written and so this becomes old issue.

8.               There is no punishment on the Special Court judges if the deliberately doesn’t dispose the case even in 10 years. The solution I propose is Right to Recall judges, but that is related with Court Reforms and not with Lokpal.

9.               The Lokpal will simply fail to prosecute corrupt SCjs because SCjs can expel Lokpal. The solution I propose is : Right to Retain Lokpal clauses.

10.            Draft committee doesn’t want transparency : The draft committee for Lokpal bill is opposing the proposal that every proposal sent to draft committee as affidavit should at least come on the website of draft committee and visible to public. They insist proposals submitted will not be put on the website of draft committee. So much for transparency !!

 

The 3 proposed remedies

 

I am only requesting all activists, including IAC activists, to request PM, Anna and all Committee Members to add

1.                 Three clauses for Transparent Complaint Filing (aka RTI2 described in chap-1 of this book http://rahulmehta.com/301.pdf )

2.                 Twelve clauses for Right to Recall Lokpal , which will also act as Right to Retain Lokpal. The Right to Recall Lokpal clauses would make the Jan Lokpal a Janaadheen Lokpal, and thus a Jan Lokpal in true sense. If Jan Lokpal is not Janaadheen Lokpal, he will become Dhan Lokpal i.e. agent of MNCs and elitemen lobbies.

3.                 The draft committee should put all proposals sent to it as affidavit on its website, and may charge a fee to scan and upload the affidavits.

So I request all activists to ask PM and Annaji and IAC to add these clauses in Lokpal draft.


Three clauses of Transparent Complaint/Feedback Filing aka Citizen’s Voice

 

Following is the addition is propose in Lokpal bill.

 

Section-NN : Transparent Complain/Feedback Filing

 


#

Officer

Procedure

1

Instruction to Collector

(or Executive Magistrate he designates)

The President hereby orders Collector that : if a woman voter or dalit voter or senior citizen voter or poor voter or farmer voter or ANY citizen-voter in his district submits a complaint to Lokpal to the Collector (or his designated Executive Magistrate) and requests to be put on the website of Lokpal, the Collector or his designated Executive Magistrate will issue a serial number and put that affidavit on the website of the Prime Minister  for a fee of Rs 20 per page. The affidavit must be made before Executive Magistrate on stamp paper of Rs 20 and signed by two witnesses. The complainer and witnesses must have voter-IDs with them.

2

Instruction to Talati, Patwari, Village Officer

(or his clerk)

The President orders Patwari that :

(2.1) if a woman voter or a dalit voter or a senior citizen voter or a poor voter or a farmer voter or ANY citizen-voter comes with voter ID, and specifies YES_NO on a complaint submitted on Lokpal’s website, the Patwari will enter his YES-NO on the Lokpal’s website along with his voter-ID and give a printed receipt for Rs 3 fee.

(2.2) The Patwari will also allow citizen to change his Yes-No for Rs 3 fee.

(2.3) The fee will be Re 1 for BPL card holder

3

[To all Citizens, Lokpal]

This section is for transparent complain filing only for dalit, poor, women or any voters, it is not a referendum procedure. The Yes-No count will not be a binding on Lokpal etc. However, if over “a certain  number” of women voters, dalit voters, senior citizen voters, poor voters, farmer voters or ANY certain number of citizen-voters register YES on a given affidavit, then the Lokpal may or need not take necessary action in two months. Or the Lokpal may resign. The “certain number” will be decided by Lokpal. Lokpal’s decision on this will be final. And all citizens are requested to note that this procedure can be also used to send feedback to Lokpal Selection Committee under section-(6)(6)(i) of this bill.

----- end of addition----

For FAQs, pls see chap-50 of http://rahulmehta.com/301.pdf

 

Summary : I summarize the above proposed clauses in Lokpal draft as : please allow a citizen, if he wants, to put his complaint/affidavit on PM’s website. That’s all. This is less than Pandavas asking for 5 villages --- all this says is that

 

FAQs

 

Q1. What is the purpose of clause-2?  

Clause-2 is because if 10000 citizens have same complaint, all need not go to Collector’s office and spend Rs 40 and create law-order mess. The load is reduced to filing YES and gets divided over 100s of Patwaries. It decreases travel time for citizens, travel expenses, decreases load on system and decreases possibility of crowding at Collector’s office.

 

Q2. Can someone buy votes in this procedure?

The Lokpal Draft Committee Member Shri Annaji says we all 75 crore citizens of India, except handful of wealthy and educated in civil society,  sell our votes for Rs 100, bottle of liquor and a saree. I will gulp this insult thrown on me and my 75 crore fellow voters. But I request Annaji to ask his supporters in USA how much did they sold away Indian citizenship for. Nevertheless, Annaji may be worried about possibility that we all commons would sell our YESes under clause-2.1. To reply --- I request Annaji and all to read clause-2.2 . Clause-2.2 says citizen can change his YES any day. So if a rich man pays a citizen Rs 100, bottle and saree to get a YES, then next day that citizen can change his YES to NO and demand Rs 100, saree and bottle again. Now even if 100 richest men of India start paying Rs 100, bottle and saree everyday to crores of citizens everyday, within month they will all run out of money. So clause-2.2 makes the whole procedure immune to sell-out. 

 

(Following is plain text of above table to copy/paste on internet forums)

 

Section-NN : Transparent Complain Filing

 

1.                [Instruction to District Collectors] The President hereby orders Collector that : if a woman voter or dalit voter or senior citizen voter or poor voter or farmer voter or ANY citizen-voter in his district submits a complaint to Lokpal to the Collector (or his designated Executive Magistrate) and requests to be put on the website of Lokpal, the Collector or his designated Executive Magistrate will issue a serial number and put that affidavit on the website of the Prime Minister  for a fee of Rs 20 per page. The affidavit must be made before Executive Magistrate on stamp paper of Rs 20 and signed by two witnesses. The complainer and witnesses must have voter-IDs with them.

2.                [Instruction to Patwari or his clerk or Village Officer] The President orders Patwari that :

o   (2.1) if a woman voter or a dalit voter or a senior citizen voter or a poor voter or a farmer voter or ANY citizen-voter comes with voter ID, and specifies YES-NO on a complaint submitted on Lokpal’s website, the Patwari will enter his YES-NO on the Lokpal’s website along with his voter-ID and give a printed receipt for Rs 3 fee.

o   (2.2) The Patwari will also allow citizen to change his Yes-No for Rs 3 fee. 3.

o   (2.3) The fee will be Re 1 for BPL card holder

3.               [General instruction to all citizens] This section is for transparent complain filing only for dalit, poor, women or any voters, it is not a referendum procedure. The Yes-No count will not be a binding on Lokpal etc. However, if over “a certain  number” of women voters, dalit voters, senior citizen voters, poor voters, farmer voters or ANY certain number of citizen-voters register YES on a given affidavit, then the Lokpal may or need not take necessary action in two months. Or the Lokpal may resign. The “certain number” will be decided by Lokpal. Lokpal’s decision on this will be final. And all citizens are requested to note that this procedure can be also used to send feedback to Lokpal Selection Committee under section-(6)(6)(i) of this bill.

----- end of addition----

 

For FAQs, pls see http://rahulmehta.com/301.pdf chap-50 or http://rahulmehta.com/lokpal.pdf

 


Ten Right to Recall Lokpal clauses

 

Section-NN : Citizen’s Right to Recall/Retain Lokpal

 

#

Procedure

for

Procedure / instruction

1

-

The word citizen would mean a registered voter. This procedure will apply only for one member of Lokpal called as Citizens’ Appointee. Initially, he will be appointed by the Lokpal Section Committee. And the word “may” in this section means “may or need not” and does not mean binding in any way.

2

Instruction to Collector

The President orders Collectors that if any citizen of India above age of 40 wishes to become a member in Lokpal Committee as Citizens’ Appointee, and he appears in person before the District Collector, DC would accept his candidacy for Lokpal member after taking filing fee same as deposit amount for MP election. The Collector will post his name and serial number on Lokpal’s website. No symbol will be issued.

3

Instruction to Talati or Patwari

If a citizen of that district comes in person to Talati’s office, pays Rs 3 fee , and approves at most five persons for the RBIG position, the Talati would enter his approvals in his computer and would him a receipt with his voter-id#, date/time and the persons he approved. The fee for BPL card holder will be Re 1.

4

Instruction to Talati or Patwari

The Patwari or Talati will put the approvals of the citizen on Lokpal’s website with citizen’s voter-ID number and approvals he gave.

5

Instruction to Talati or Patwari

If a the citizen comes to cancel his Approvals, the Talati will cancel one of more of his approvals without any fee.

6

Instruction for Lokpal Chairperson

On every 5th of month, the Lokpal may publish Approval counts for each candidate as on last date of the previous month.

7

Instruction for Lokpal Chairperson

If a candidate gets approval of over 37 crore voters, and it is also 1 cr more than the approval count of existing Citizens’ Appointee, then Lokpal Chairperson may request existing Citizen’s Appointee and appoint the most approved candidate as Citizens’ Appointee in the Lokpal Committee. The Chairman may lower the threshold from 37 crores to any number over 24 crore.

8

Instruction for Lokpal Chairperson

The Lokpal Chairperson with approval of all existing members and with approval of Lokpal Selection Committee members may increase number of Citizens’ Appointee.

9

Instruction for Lokpal Chairperson

If a candidate gets approval of over 24 crore voters approve a candidate, and is 1 crore more than approval count of existing Citizens’ Appointee, then Lokpal may or need not request Citizens’ Appointee to resign and may or need not appoint the most approved candidate as Lokpal member. The Selection Committee may alter this number from “24 crore” to any number no more than “37 crores” .

10

Instruction for Collector

If any citizen wants a change in this law, he may submit an affidavit at DC’s office and DC or his clerk will post the affidavit on the website of Lokpal for a fee of Rs 20/- per page.

11

Instruction for Talati or Patwari

If any citizens want to register his opposition to this law or any section or wants to register YES-NO to any affidavit submitted in above clause, and he comes to Talati’s office with voter-ID and pays Rs 3 fee, Talati will enter YES/NO and give him a receipt. The YES-NO will be posted on the website of the Prime Minister.

12

Right to Retain Lokpal

The citizens may use this procedure to retain, or bring back, a Lokpal member was expelled but citizens wanted him to continue. Hence this section may also be referred as Right to Retain  Lokpal.

 

For FAQs, pls see chap-50 of  http://rahulmehta.com/301.pdf

 

(Following is in plain txt for copy-paste on internet forums. Following that are FAQs)

 

Section-NN : Citizen’s Right to Recall

 

1.               The word citizen would mean a registered voter. This procedure will apply for at least one member of Lokpal called Citizens’ Appointee. Initially, he will be also appointed by Lokpal Section Committee. The word “may” in this section means “may or need not” and does not mean binding in any way.

2.               [Instruction to Collector] : The President orders Collector that if any citizen of India above age of 40 wishes to become a member in Lokpal Committee as Citizens’ Appointee, and he appears in person before the District Collector, District would accept his candidacy for Lokpal member after taking filing fee same as deposit amount for MP election. The Collector will post his name and serial number on Lokpal’s website. No symbol will be issued.

3.               [Instruction for Patwari or Talati  or their Clerks] The President orders Patwari or Talati or their clerks that if a citizen of his town or ward comes in person to office of  Patwari or Talati, pays Rs 3 fee , and approves at most five persons for the Lokpal position, the Talati would enter his approvals in the computer and would him a receipt with his voter-id#, date/time and the persons he approved.

4.               [Instruction for Patwari or Talati] The Talati will put the preferences of the citizen on Lokpal’s website with citizen’s voter-ID number and approvals he gave.

5.               [Instruction for Patwari or Talati] If a the citizen comes to cancel his Approvals, the Talati will cancel one of more of his approvals without any fee.

6.               [Instruction for Lokpal Chairperson or his Secretary] On every 5th of month, the Lokpal may publish Approval counts for each candidate as on last date of the previous month.

7.               [Instruction for Lokpal Chairperson] If a candidate gets approval of over 37 crore voters, and it is also 1 cr more than the approval count of existing Citizens’ Appointee, then Lokpal Chairperson may request existing Citizen’s Appointee and appoint the most approved candidate as Citizens’ Appointee in the Lokpal Committee. The Chairman may lower the threshold from 37 crores to any number over 24 crore.

8.               [Instruction for Lokpal Chairperson] The Lokpal Chairperson with approval of all existing members and with approval of Lokpal Selection Committee members may increase number of Citizens’ Appointee

9.               [Instruction for Lokpal Chairperson] If a candidate gets approval of over 24 crore voters and is 1 crore more than approval count of existing Citizens’ Appointee, then Lokpal may or need not request Citizens’ Appointee member to resign and may or need not appoint the most approved candidate as Lokpal member. The Selection Committee may alter this number from “24 crore” to any number no more than “37 crores” .

10.            [Instruction for District Collector] If any citizen wants a change in this law, he may submit an affidavit at DC’s office and DC or his clerk will post the affidavit on the website of Prime Minister for a fee of Rs 20/- per page.

11.            [Instruction for Talati or Patwari] : If any citizens want to register his opposition to this law or any section or wants to register YES-NO to any affidavit submitted in above clause, and he comes to Talati’s office with voter-ID and pays Rs 3 fee, Talati will enter YES/NO and give him a receipt. The YES-NO will be posted on the website of the Prime Minister.

For FAQs, pls see http://rahulmehta.com/301.pdf chap-50 or http://rahulmehta.com/lokpal.pdf

 

 

FAQs

 

Q1. Can anyone but approvals or votes in THIS proedure?

The Lokpal Draft Committee Member Shri Annaji says we all 75 crore citizens of India, except handful of wealthy and educated ones,  sell votes for Rs 100, bottle of liquor and a saree. I will gulp this insult thrown on me and my 75 crore fellow voters but vow to return it back with interest. But I request Annaji to ask his supporters in USA how much would they sell their Indian citizenship for. Nevertheless, Annaji may be worried about possibility that we all commons would sell our YESes under clause-5. To reply --- I request Annaji and all to read clause-7 . Clause-7 says that if someone pays a citizen Rs 100, bottle and saree to get a YES, then next day that citizen can change his YES to NO and demand Rs 100, saree and bottle again. Now even if 100 richest men of India start paying Rs 100, bottle and saree everyday to crores of citizens everyday, within month they will all run out of money. So clause-7 makes the whole procedure immune to sell-out. 

 

Q2. How will citizens know about Lokpal candidates?

How do citizens know about their MP candidates? Same way they will know about Lokpal candidates. Each citizen will initially approve candidates he knows about. Later, when no candidate gets over 24 crores approvals, citizens will take interest in candidates who are say in top 10 or top 20. The candidates will also file their descriptions as affidavits on net, and citizens who don’t have net can know via 5% citizens who have net on PC or their mobile. In addition, activists of organizations like BST or IAC or political parties can also spread information about candidates in top 20-25 list. This way, more and more citizens will come to know about popular candidates.

 

Q3. Wont citizens approve a corrupt person as Lokpal?

If a person can get approvals of crores of citizens by paying them Rs 100, bottle and sari, then surely he can also offer Rs 100 cr to each of the 10 committee members or influence them via lobbyists, corporates, media.. But still lets assume that all committee members are saints and immune to all influences. And lets say that crores of citizens sent the most corrupt person in Lokpal Committee. But he will be only one out 10. The remaining nine members are honest and all appointed by honest committee members. So why should Annaji worry about one corrupt Lokpal member so much? Aren’t nine members capable of dealing with one corrupt member?

 

Q4. Is these Right to Recall Lokpal clauses unconstitutional?

Please cite which article of Constitution is violated? And till Supreme Court judges say it is unconstitutional, these proposed clauses are constitutional.

 

Reply to Annaji’s lies and insults, that we citizens sell votes

 

In India, it is customary of members of civil society to insult us commons by calling us illiterate, vote-seller, unaware, moron etc. Annaji is now apex of civil society and so no wonder he has said that ALMOST ALL of the 75 crore citizen-voters of India sell votes for Rs 100, bottle of liquor and saree. His statement also covers me, because I am a common man myself.

This is a white lie. It is a fact that citizens do take money. For that matter, an elitemen will not take Rs 100, but will he turn down Rs 10000 or Rs 100,000? But saying that citizens “sell” that vote is not just wrong, but a stupid statement or a lie because every citizen knows, and Annaji too knows that voting is confidential. So voter may have taken money from one or two or even 5 candidates. But inside booth, he only votes for candidate he likes. Hence there is no “selling”, because selling cant be monitored at all.

Some valid questions remain. Then why do corrupt candidates win? Well, in most elections, all major parties field only corrupt candidates. This a flaw of party presidents, not voters. But then why don’t voters vote for honest independent? Because in India, Election Commission doesn’t allow voter to give preference (multiple votes) but allows voter only to cast one and only one vote. So lets say there are three candidates – dishonest BJP1 candidate, dishonest Congress1 candidate and honest independent. Say a voter hates Congress1. So he fears that if he votes for the honest independent candidate, then this will increase the possibility that Congress1 would win. However, if Election Commission were to allow voters to cast preferences, then voter can give first preference to honest independent and second preference to BJP1 and thus vote for honest candidate as well as ensure defeat of Congress1 (see chapter-40 , section 40.11 – Instant Runoff Voting in http://rahulmehta.com/301.pdf ,  http://en.wikipedia.org/wiki/Instant_runoff_voting ). This will increase focus honest independents get and in 1-2 elections, he may be able to defeat dishonest candidates. However, Election Commission opposes enacting preferential ballots and insists on only single voting. So each voter has to vote for candidate-X who can defeat the candidate he hates most. Even if no money was given, the voter who hates Congress1 would still vote for dishonest candidate of BJP1 and voter who hates BJP1 will vote for dishonest candidate of Congress1. So this is due to system, not due to voter or sell out.

If a class-X student says that “voters sell out”, I will call it lack of information. But if a seasons politician speaks such a lie, I would call it as motivated lie to increase support for dictatorship. Annaji spreading lies to create support for a dictatorial Lokpal bill without Right to Recall, and so he is spreading such lies.

And above all, while Annaji worries why voters vote for dishonest candidates, he doesn’t say why candidates dare to become corrupt. The main reason is – citizens cant expel them and cant imprison them using Jury System or Majority Vote. It is preposterous that he doesn’t focus on more corrupt people like judges, IAS, IAS, civil society members who lauder money via NGOs and is chasing us commons.

 

How Jan Lokpal can weaken India, and promote MNCs’ takeover

 

Very few citizens of India have realized this fact – there is something 10 times worse than corruption that is happening in India. What? Our Agriculture, Defense Manufacturing and Maths\Science education is weakening day by day. This is mainly because MNCs are bribing Ministers, IAS at State\Central levels to ruin our Agriculture, Defense Manufacturing and Maths\Science education. And Jan Lokpal can worsen this problem. How?

The Lokpal selection committee consists of some 10-12 people, which MNCs can easily bribe out or cater via Radia  like lobbyists or blackmail via mediamen. And thus MNCs can ensure that MNC puppets with clean image become Lokpals. Using these puppets Lokpals, MNCs will suppress lower scale corruption (District Collector and below) because low-scale corruption hurts MNCs more than small-medium businessmen. At the same time, the Lokpals will promote policies to weaken Agriculture, Defense Manufacturing and Maths]Science education, so that India becomes more and more dependent on MNCs. How can Lokpal promote such polices? By harassing the IAS, judges, Ministers who oppose these polices and favoring Ministers, judges, IAS who support these policies.

 

(Aside : Let me explain why lower scale corruption benefits small-medium businessmen over MNCs. Say a person in some city like Ahmedabad or Delhi owns say 5-10 restaurants. Say he wants to open one more and local officers ask for bribe of say Rs 500,000. So he pays the bribes. Now consider MNC Executive sitting in NYC wanting to open one more restaurant. Say local officers want Rs 500,000 of bribes. Now MNC Executive cant directly deal with local officer but will need to hire some middleman. So the middleman will say that officers are asking for Rs 50,00,000 !! The MNC Executive in NYC has no way to know and ends up paying 10 times more that what local guy would have had to pay. Same way, small-medium businesses are capable of evading sales\excise etc taxes because of local corruption, MNCs end up spending 5-10 times more due to excessive cuts of middlemen they have to keep. So lowering of corruption  at lower level benefits India, but ONLY if corruption at PM, CM, Ministers, Secretaries, Supreme Court judges and High Court judges reduce. If corruption at Ministers, SCj, HCjs level remains intact, and corruption at lower level reduces, it does not benefit India at all.)

 

Response of IAC members, Annaji and IAC-apex on RTR-Lokpal etc

 

Over 99% IAC members haven’t read even 2 out of 27 pages. When I describe the bill, they too are horrified.

Almost all IAC members I meet say that Transparent Complaint Filing is must and almost all also agree with RTR-Lokpal-clauses. Many say that they have spoken to Annaji and I too have sent these pages to Annaji and IAC-apex (though in English only, I will later send Hindi version). Many IAC-members say that they have spoken to Annaji and IAC-apex about Transparent Complaint Filing and RTR-Lokpal-clauses. These IAC members say that no one in apex is showing any interest. So my conclusion is that they are opposed to Transparent Complaint Filing and Right to Recall Lokpal clauses. Annaji is surely beating lots of drums on Right to Recall. But he doesn’t disclose his stand on RTR-Lokpal.

 

I request all activists to write following post on IAC website

 

Dear Annaji,

We request you put all feedbacks on Draft Committee websites. And we request you to add clauses in Lokpal bill which will ensure that a citizen will be able to put his affidavit on Lokpal’s website which can be seen to public. And citizen can add their names to the affidavits support. And also request you to add Right to Recall Lokpal clauses, because without Right to Recall Lokpal, Jan Lokpal will become Dhan Lokpal i.e.corrupt. At least one out of ten Lokpal members should be recallable , replaceable by us citizens.  Regards , _______________________________ (name)

 

Conclusion

 

All I have suggested is that a citizen, if he wants, can send his feedback given under section-(6)(6)(i) of Lokpal bill and his complaint should come on website of Lokpal, AND that we citizens should have Right to Recall at least one of the 10 Lokpal. Otherwise, Jan Lokpal would become Dhan Lokpal – appointed by corporates via lobbyists. This fear is consistent with Satyarth Prakash written by Swami Dayanand Saraswatijee in 1870s. Swami Dayanand says in chap-6 first page that “Raja must be Prajaadheen,  and if Rajvarg is not Prajaadheen, then just as carnivorous animals eat small animals, such Rajvarg would rob citizens and thus destroy nation.” This also applies for Lokpal. If Lokpal is not Prajaadheen or Janaadheen, then such Lokpal would become would become Dhan Lokpal. Despite this, Anna and apex-IAC so far has not given any positive approval to RTR-Lokpal-clauses as well as Transparent Complaint Filing.