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तीन लाइन का क़ानून गरीबी और भ्रष्टाचार दूर कर सकता है, कुछ ही महीनो में : `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)

 

(1) आम आदमी को पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव करने का अधिकार

 

आज यदि हमें कोई शिकायत या प्रस्ताव करना होता है और उसे यदि लाखों करोड़ों व्यक्ति समर्थन भी करते हैं तो भी वो शिकायत/प्रस्ताव को नेता, बाबू , जज या मीडिया द्वारा दबा दिया जाता है| उदाहरण से यदि आप के यहाँ कोई भ्रष्ट मंत्री है और लाखों लोग उसके खिलाफ शिकायत करना चाहते हैं कि इसे हटना चाहिए और आप एक पत्र लिखते हैं प्रधानमन्त्री को इस विषय में ,तो पहले तो प्रधानमंत्री के पास पत्र पढ़ने के लिए समय ही नहीं होगा और लाखों पात्र लिखें जाएँ या लाखों लोग के हस्ताक्षर भी लिए जायें तो भी नेता या अफसर या मीडिया उसको दबा देता है क्योंकि हमारे देश में नागरिकों के हस्ताक्षर का कोई रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है जिससे वो हस्ताक्षर मिला कर जांच कर सकें | इस कारण, हस्ताक्षर का कोई भरोसा नहीं है और हस्ताक्षर जाली है , ये घोषित कर शिकायत दबा दी जायेगी |

`पारदर्शी`शब्द को परिभाषित( मतलब बताना ) करना चाहूँगा –वो शिकायत/प्रस्ताव जो कोई नागरिक कभी भी ,कहीं भी ,किसी अन्य नागरिक द्वारा दी गयी को देख सके और जांच कर सके ताकि कोई नेता, कोई बाबू , कोई जज या मीडिया दबा नहीं सके |

ऐसा एक सरल प्रक्रिया प्रस्तावित है जिसको `जनता की आवाज़` पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)  बोला जाता है जो केवल तीन लाइन का है |

इसके क़ानून-ड्राफ्ट का  सार निम्नलिखित है :-

1.  यदि नागरिक चाहे तो अपनी शिकायत / प्रस्ताव / फरियाद 20 रूपये हर पेज के स्टैम्प-पेपर/एफिडेविट पर ,कलेक्टर की कचहरी जाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर रखवा सकेगा और एफिडेविट पर कोई भी शिकायत, प्रस्ताव या अन्य जानकारी या कोई सूचना अधिकार का आवेदन आदि रख सकता है |

2.  यदि नागरिक चाहे तो 3 रुपये की फीस /शुल्क देकर फ़रियाद / अर्जी पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकेगा अपने वोटर आई.डी के जानकारी देकर और अंगुली की छाप देकर |

3.  हाँ/ना पधानमंत्री पर जरूरी नहीं है।

 

`राईट टू रिकाल` और `पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम)` के पूरे ड्राफ्ट आगे देखें | इस क़ानून को पारित करने के लिए एक मात्र प्रधानमन्त्री या मुख्यामंत्री के हस्ताक्षर चाहिए |

 

    यह प्रस्तावित `जनता की आवाज़` क़ानून या राजपत्र अधिसूचना मात्र कुछ ही महीनों में गरीबी कम कर सकता है, पुलिस में भ्रष्टाचार नहीं बराबर कर सकता है और सेना मजबूत कर सकता है |

     अब मान लीजिए के प्रधान मंत्री ने इसपर हस्ताक्षर कर दिए हैं, और पहले वाले उदहारण के अनुसार यदि आप के यहाँ का मंत्री भ्रष्ट है , तो आप या कोई भी ,किसी भी कलेक्टर के दफ्तर जा कर मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकता है और उसे हटाने के लिए भी लिख सकता है | इस शिकायत को कलेक्टर या उसका क्लेर्क स्कैन कर लेगा और प्रधान मंत्री के वेब-साईट पर डाल देगा | अब क्योंकि इस शिकायत का एक-एक शब्द दुनिया के लाखों-करोड़ों लोग देख सकते हैं, कभी भी, इसीलिए इस शिकायत को जरा भी छेड-छाड नहीं किया जा सकता है बिना लाखों लोगों को पता लगे | और इसके समर्थन में व्यक्ति को कलेक्टर के दफ्तर नहीं जाना है, केवल अपने पास के पटवारी या तलाटी , जो भूमि का रिकॉर्ड रखता है और कलेक्टर के द्वारा ही रखा गया होता है, के पास जाना है  और अपना वोटर आई.डी. के जानकारी आर अंगुली की छाप देगा और वो भी वेब-साईट पर आ जायेगी | इस तरह कोई भी ये नहीं कह सकता कि समर्थक जाली हैं| उल्टा जो व्यक्ति या मीडिया इस को नहीं उठाएगा , उसकी भरोसा कम हो जायेगी |

     इसिलिए मीडिया वाले भी उठाएंगे और देश भर में लोग जान जाएँगे कि इस मंत्री के खिलाफ लाखों लोगों की शिकायत है और संभव है कि और लोग भी इसका फिर पटवारी के दफ्तर जा कर इस शिकायत के साथ नाम जोड़ें| और ये लाखों लोग शिकायत करने के बाद ऐसे ही नहीं बैठे रहेंगे, वो अपने स्थान के विधायक,सांसद, आदि लोगों पर दबाव डालेंगे कि देखो, लाखों लोग बोल रहे हैं कि इस भ्रष्ट मंत्री को निकालो, तो फिर ये दबाव उन सांसदों और उन सांसदों द्वारा प्रधान-मंत्री पर भी आएगा| सांसद प्रधान-मंत्री को बोलेंगे कि हमारी लोकप्रियता दिनों दिन कम होती जा रही है| ऐसा ना हो कि हम अगले चुनाव तक बिलकुल ही जीरो हो जाएँ या उससे पहले भी लोगों का गुस्सा हमें झेलना पड़े, इसीलिए आप ये मंत्री पर कार्यवाई करें | इस प्रकार जनता के दबाव से ये प्रक्रिया काम करेगी और लाखों–करोड़ों लोगों की शिकायत या प्रस्ताव को सरकार को सुनना होगा |

 

कुछ प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न -
अब कुछ प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न लेंगे-


(1)
क्या इस क़ानून का प्रयोग करने के लिए सब नागरिकों के पास इन्टरनेट है?

ये सबसे पूछे जाने वाला गलत प्रश्न है. ये गलत प्रश्न इसीलिए है `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) में मतदाता के पास इन्टरनेट होना कोई आवश्यक नहीं है | उनके पास इन्टरनेट हो या ना हो , उन्हें कलक्टर या पटवारी के दफ्तर जाना आवश्यक है | यानी इस कानून के लिए इन्टरनेट की आवश्यकता नहीं है |

(2) इस क़ानून के पारित होने से भ्रष्टाचार कैसे कम होगा?

भ्रष्टाचार-जिससे अधिकतर अन्य समस्याओं का जन्म हुआ है |

आज देश में सब नेता वोट के समय तो आगे पीछे घूमते हैं लेकिन चुनाव के बाद 5 साल के लिए प्रजा को भूल जाते हैं और खुल के अधिकारीयों के साथ भ्रष्टाचार करते हैं |

नेता जनता की सेवा के लिए हैं | अगर वो जनता की सेवा नहीं करता तो उसे हटाने का अधिकार प्रजा के पास होना चाहिए |

       ऐसी `प्रजा अधीन राजा` की व्यवस्था हमारे देश में थी | `सत्यार्थ प्रकाशजो स्वामी दयानद द्वारा लिखी गयी है के छट्टे चैप्टर में स्पष्ट लिखा गया है कि राजा प्रजा अधीन होना चाहिए नहीं तो वो प्रजा को उसी तरह खा जायेगा जिस तरह शेर हिरन को खा जाता है. और ये श्लोक सीधे अथर्व वेद से लिया है ऐसा स्वामी दयानंद ने बताया है | ये व्यवस्था हमारे  देश में पुरातन समय में थी |

        इसमें `राजा` का मतलब राजवर्ग है, जो प्रशाशन करता है जैसे मंत्री, जज, अफसर आदि | और `अधीन` का अर्थ है कि प्रजा राजवर्ग को बदल सकती है या सज़ा दे सकती है | जब से हमने `प्रजा अधीन राजा` कि व्यवस्था को छोड़ दिया तभी से हमारा पतन हुआ है|

आज पश्चिम देशों के पास ऐसे क़ानून हैं, जिससे आम नागरिक अपने जिले व राज्य के मंत्री, जज , अफसरों को बदल या सज़ा दे सकते हैं | इसीलिए पश्चिम देशों में, जिले और राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार कम है | लेकिन, उन्ही पश्चिम देशों में, केंद्र स्तर पर बैठे जज, मंत्री, और अफसरों को लोग नहीं बदल सकते, न ही सज़ा दे सकते हैं , इसीलिए पश्चिम देशों में, केंद्र स्तर पर भ्रष्टाचार अभी ज्यादा है |

       इसी लिए हमें `आम नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को बदलने का अधिकार/प्रजा अधीन राजा` या `राईट टू रिकाल ` दोबारा लाना चाहिए और `आम नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को सज़ा देने का अधिकार` या `जूरी सिस्टम` चाहिए | पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) क़ानून के पारित होने पर `प्रजा अधीन राजा` क़ानून को पारित करना आसान हो जायेगा क्योंकि इसके द्वारा प्रजा अधीन राजा के ड्राफ्ट डाले जा सकते हैं और लाखों-करोड़ों लोग इस जन हित के क़ानून के  पक्ष में समर्थन करेंगे, तो सरकार को इस सरकारी अधिसूचना पर हस्ताक्षर करने ही होंगे |

      बिना इसके प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल क़ानून को पारित करना मुश्किल या असंभव है |
और प्रजा अधीन राजा क़ानून अधिकारीयों पर लटकती तलवार जैसे होगी जिससे वे भ्रष्टाचार नहीं करेंगे |
कुछ एक दो अधिकारी भी अगर प्रजा अधीन राजा क़ानून द्वारा निकाले गए तो बाकी सब अधिकारी / नेता / जज भ्रष्टाचार करने का साहस नहीं करेंगे | प्रधान-मंत्री,मुख्यंत्री,जजों,अधिकारी जैसे लोकपाल,जिला शिक्षा अधिकारी, जिला पुलिस कमिश्नर आदि यदि भ्रष्ट हो जाते हैं तो जनता उन्हें बदल सके ऐसा अधिकार मिल जाए ,तो ये सब जनता के प्रति जवाबदार हो जाएँगे और जनता से धोखा नहीं करेंगे|

      ये कानून आ जाने पर 99% अधिकारी का व्यवहार सही हो जायेगा और वो इमानदारी से अपना काम करेंगे और अन्य 1 % को जनता बदल देगी |

      दूसरे देशों में फैसले कुछ ही हफ़्तों में या  महीनों में क्यों आ जाते हैं जबकि हमारे देश में ये फैसले महीनों लग जाते हैं ?क्योंकि वहाँ प्रजा अधीन-जज या राईट टू रिकाल-जज (भ्रष्ट जज को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) है | जज व्यवस्था नहीं रखेंगे तो जनता उन्हें निकाल देंग |

      दूसरे देशों में क़ानून तोड़ने पर इंस्पेक्टर घूस नहीं लेता, या तो जुर्माना करता है या तो चेतावनी दे कर छोड़ देता है | ऐसा इसी लिए करता है क्योंकि पुलिस कमिश्नर स्टिंग ऑपरेशन करता है और उसे डर रहता है कि ये भी कोई स्टिंग ऑपरेशन ना हो | आप पूछेंगे कि पुलिस कमिश्नर को क्या पड़ी है की वो इंस्पेक्टर का स्टिंग ऑपरेशन करे? ऐसा इसीलिए करता है क्योंकि वहाँ प्रजा अधीन पुलिस कमिश्नर (भ्रष्ट पोलिस कमिश्नर को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार / राईट टू रिकाल-पोलिस कमिश्नर ) है | इसका ड्राफ्ट www.righttorecall.info/301.h.pdf अध्याय 22 में दिया है| यदि पुलिस कमिश्नर क़ानून और व्यवस्था नहीं बना कर रखता ,तो जनता उसे निकाल देगी |

(3) इस क़ानून से गरीबी कैसे दूर हो सकती है?

     जिस दिन प्रधानमन्त्री `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)`राजपत्र अधिसूचना  पर हस्ताक्षर करेंगे, उसी दिन मैं करीब 200 एफिडेविट प्रधानमंत्री के वेब-साईट पर दर्ज करूँगा| उसमें प्रथम एफिडेविट होगी- `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` (एम.आर.सी.एम). इस सात पेज की एफिडेविट का सम्पूर्ण ड्राफ्ट www.righttorecall.info/301.h.pdf पर मिल जायेगी अध्याय 5 पर , जो प्रस्तावित करता है की सरकारी जमीन का किराया और खनिज रोयल्टी जिसपर आम जनता का अधिकार है , 34 % सेना को मिलेगी और शेष बराबर-राबर हर नागरिक में बांटा जायेगा | यदि हर नागरिक महीने में एक बार नगद लेने जाता है,तो मात्र 1 लाख क्लर्क चाहिए | आज सरकार की बैंकों के पास 6 लाख क्लर्क हैं | यानी कि `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) ` की व्यवस्था करने के लिए सरकार पर कोई बोझ नहीं होगा |

      भारत के कुल 72 करोड मतदाताओं में से आर्थिक स्तिथि से नीचे के 55 करोड मतदाताओं से कितने लोग यह कहेंगे कि खनिज रोयल्टी (आमदनी) और सरकारी जमीं के किराये से जो महीने का रु 400-500 प्रति व्यक्ति आ सकता है, वह मुझे नहीं चाहिए, यह सरकार की तिजोरी में ही रहने दो ? ऐसा आर्थिक स्तिथि से नीचे के कितने मतदाताओं से कितने यह कहेंगे ?

मेरा जवाब है कि 5 प्रतिशत से कम लोग ही ऐसा कहेंगे | यानी `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत प्रणाली (सिस्टम)`पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर आने के बाद `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` (एमआरसीएम) की एफिडेविट के बारे में जानने पर सोचेंगे कि इसमें मेरा रु 3 की फी से ज्यादा क्या नुक्सान है ?

अब मैं आप वांचक से प्रश्न पूछता हूँ |  `जनता की आवाज़`की तीसरी कलम स्पष्ट कहती है हां-नां बाध्य / `बंधन वाला` नहीं है |

लेकिन यदि 72 करोड नागरिक मतदाताओं में से यदि 50-55 करोड मतदाता  `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी` (एमआरसीएम) एफिडेविट पर हां दर्ज करें तो क्या प्रधान मंत्री की हिम्मत होगी कि वह `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` (एमआरसीएम) क़ानून-ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर से मना करे? यदि प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करने से मना करते हैं तो 50-55 करोड नागरिक, जिन्हें खनिज रोयल्टी(आमदनी) और सरकारी जमीन का किराया चाहिए- ये सब हाथ पर हाथ रखकर बैठे नहीं रहेंगे ? इनमें से 1 प्रतिशत ने भी आंदोलन आदि किया तो प्रधानमन्त्री के लिए सरकार चलाना असंभव हो जायेगा | इसलिए प्रधान मंत्री विवश होकर `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` (एमआरसीएम) पर हस्ताक्षर कर देंगे | और 1-2 महीनों में ही नागरिकों को खनिज रोयल्टी(आमदनी) मिलनी शुरू हो जायेगी और गरीबी कम हो जायेगी | इस तरह यह तीन लाइन का `जनता की आवाज़` कानून 3-4 महीने में ही गरीबी कम कर देगा|

(4) क्या जाली हाँ / ना मत डालने या मत बदलने की संभावना नहीं है?

पर्याप्त सुरक्षा दी जाएगी जैसे मत डालने वाले का फोटो ,उसका वोटर आई.डी, उसका अंगुली का छाप, पासबुक जिसमें उस व्यक्ति का खाता होगा जिमें उसके मत का विवरण होगा. व्यक्ति एस.एम.एस द्वारा भी अपने मत की वर्त्तमान स्थिति जान सकेगा |

ये खाते बैंक के खाते जैसे होंगे. बैंक के खाते के जैसे बहुत कम संभावना होगी की इनको हैक किया जा सके ,लेकिन नतीजा बदलने के लिए हजारों ,लाखों की संख्या में हैक(बदलाव) करना होगा जिसके लिए काफी घूस लगेगा और हैक होने के बाद जब खता धारी को पता चलेगा की उसका मत बदल दिया गया है तो वो अपना मत वापस बदल सकता है | इसीलिए कोई विशेष प्रलोभन नहीं होगा किसी को की एक तो बड़ी घूस दे मत बदलने के लिए और फिर भी कोई संतोष वाला नतीजा आये | इसी लिए ये व्यवस्था 100% भरोसेमंद होगी

(5) क्या भारत के प्रधान मंत्री `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) क़ानून पर खुशी–खुशी यानी बिना नागरिकों के आंदोलन या दबाव के हस्ताक्षर करेंगे?

मेरा मानना है नहीं| बिना लोकदबाव या आंदोलन के भारत का शायद ही ऐसा प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होगा जो इस तीन लाइन के क़ानून , `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) राजपत्र अधिनियम पर हस्ताक्षर करेगा | क्योंकि यदि भ्रष्टाचार कम या समाप्त हो जाता है तो जो मुख्यमंत्री ,गृहमंत्री, विधायक ,न्यायाधीश को जो करोड़ों रुपये मिलते हैं वो हजारों हो जायेगा | इसलिए यदि कोई नागरिक यदि `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) लेकर मुख्यंत्री,विधायक के पास जाता है तो वो सिर्फ गोल-गोल बात ही करेंगे | इसीलिए नागरिकों को प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री को मजबूर करना होगा `पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) देने के लिए |

और एक बार पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) आ जाती है, उसके द्वारा 100-200 या अधिक जन हित के क़ानून कुछ ही समय में आ सकते हैं | इसीलिए एक ही आन्दोलन चाहिए और अनेक जन हित के क़ानून जैसे राईट टू रिकाल या प्रजा अधीन राजा आ जाएँगे, अनेक आन्दोलन करने की आवश्यकता नहीं | राईट टू रिकाल या प्रजा अधीन राजा या जनता द्वारा भ्रष्ट को बदलने की प्रक्रिया जैसे प्रजा अधीन-प्रधान मंत्री , प्रजा अधीन-पुलिस कमिश्नर ,प्रजा अधीन-जज आने से कुछ ही महीनो में भ्रष्टाचार नहीं वत हो जाएगा | राईट टू रिकाल आने से हज़ारो अधिकारी बदलने की जरुरत नहीं पड़ेगी | अधिकतर अधिकारी समझदार हैं और काम करना चाहते हैं| इसीलिए 50 प्रतिशत अधिकारी राईट टू रिकाल(प्रजा अधीन राजा ) आने के 15 दिन में ही काम सुधार देंगे, और जब 1-2 प्रतिशत की नौकरी जायेगी तो अन्य 48 प्रतिशत भी काम सुधार लेंगे और भ्रष्टाचार कम कर देंगे|

इसीलिए जन जन को पोस्टकार्ड / पत्र लिखें और ये जन हित के कानूनों के बारे में बताएं विशेषकर पारदर्शी शिकायत करने की प्रक्रिया/तरीका के बारे में | इसका एक नमूना आगे दिया है|

 

अधिक जानकारी के लिए www.righttorecall.info/004.h.pdf -अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

www.righttorecall.info/301.h.pdf -विस्तृत जानकारी के लिए , विशेषकर अध्याय 1,2,5,6

 

(2)  संपूर्ण `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) का क़ानून-ड्राफ्ट  और प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री को पत्र

 

आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय,

कृपया निम्‍नलिखित सरकारी अधिसूचना पर अगले 21 दिनों के भीतर हस्‍ताक्षर करें---

 

[अधिकारी]                            

प्रक्रिया

1.   [ कलेक्टर (और उसके क्लर्क) ]      

कोई भी महिला, दलित मतदाता, गरीब मतदाता, वृद्ध मतदाता, मजदुर मतदाता,किसान  मतदाता या कोई भी नागरिक मतदाता यदि खुद हाजिर होकर यदि अपनी सूचना अधिकार का आवेदन ,अर्जी या भ्रष्टाचार के खिलाफ फरियाद या कोई भी हलफ़नामा / एफिडेविट  कलेक्टर को देता है तो कोई भी दलील दिये बिना कलेक्टर ( या उसका क्लर्क ) उस हलफ़नामा / एफिडेविट  को प्रति पेज 20 रूपये का लेकर सीरियल नंबर दे कर पधानमंत्री वेबसाइट पर रखेगा।
2.    [ पटव
ारी (तलाटी ,लेखपाल) और उसका क्लर्क ]
कोई भी महिला मतदाता, दलित मतदाता या कोई भी मतदाता यदि कलम-1 द्धारा दी गई अर्जी या फरियाद या हलफ़नामा / एफिडेविट  पर आपनी हाँ या ना दर्ज कराने मतदाता कार्ड लेकर आये, 3 रुपये का शुल्क /

फीस लेकर पटवारी नागरिक का मतदाता संख्या, नाम, उसकी हाँ या ना को कंप्यूटर में दर्ज करेगा। नागरिक की हाँ या ना प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर आएगी। पटवारी नागरिक की हाँ या ना 3 रूपये देकर बदलेगा। गरीबी रेखा नीचे के नागरिको से शुल्क / फीस 1 रूपये का होगा। 

3. ये कोई रेफेरेनडम/जनमत-संग्रह नहीं है.यह हाँ या ना अधिकारी, मंत्री, न्याधीश, सांसद, विधायक, अदि पर अनिवार्य नही होगी। लेकिन यदि भारत के 37 करोड़ मतदाता, वृद्ध मतदाता या कोई भी 37 करोड़ नागरिक मतदाता कोई एक अर्जी, फरियाद पर हाँ दर्ज करे तो पधानमंत्री उस फरियाद, अर्जी पर ध्यान दे सकते हे या नही दे सकते, या इस्तीफा दे सकते हें । उनका निर्णय अंतिम होगा।

 

आपका विश्‍वासभाजन,

 

नाम:...............................

पता:.............................................................

वोटर आई कार्ड/मतदाता पहचान-पत्र:.........................

(कृपया वोटर आई कार्ड की प्रतिलिपि संलग्‍न करें)

इसी तरह मुख्यमंत्री, महापौ/मेयेर,जिला पंचायत अध्यक्ष, हाई-कोर्ट के जज, और बुद्धिजीवियों को भी पत्र लिख सकते हैं |

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मांग किये गये इस `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) सरकारी हुक्म(राजपत्र अधिनियम) का सार है :-

·         यदि नागरिक चाहे तो अपनी फरियाद 20 रूपये हर पेज देकर कलेक्टर की कचहरी जाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर रखवा सकेगा।

·         यदि नागरिक चाहे तो 3 रुपये का शुल्क देकर फरियाद पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकेगा।

·         हाँ/ना पधानमंत्री पर अनिवार्य नहीं है।

    ये पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) ये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत/प्रस्ताव हमेशा दृश्य है और जाँची जा सकती है कभी भी ,कहीं भी, किसी के भी द्वारा ताकि शिकायत को  कोई नेत्ता, कोई बाबू(लोकपाल आदि) ,कोई जज या मीडिया न दबा सके |

     इस कानून का समर्थन करने वाले हम सभी नागरिकों से हम विनती करेंगे कि वे वैसे किसी भी उम्मीदवार को वोट दें जो `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` का समर्थन करता है। और हम नागरिकों से यह भी विनती करते हैं कि वे उस  नेता को तंग करने के लिए सभी तरह के विरोध प्रदर्शन करें। और यदि किसी नागरिक को यह विश्वास हो जाता है कि नेता जनता की मांग पर कोई जवाब नहीं देगा तो वे उन सभी तरीकों का इस्तेमाल करने को आज़ाद है जो वह करना चाहता है।

 

(3) भ्रष्ट को बदलने / सज़ा देने का आम नागरिकों का

 

स्वामी दयानंद सरस्वती जी अपनी पुस्तक `सत्यार्थ-प्रकाश` के छटवें अध्याय में लिखते हैं कि `राजा प्रजा अधीन होना चाहिए अन्यथा राजा प्रजा उसी प्रकार प्रजा को खा जायेगा जिस प्रकार माँसाहारी पशु अन्य पशुओं को खा जाता है | और ये श्लोक उन्होंने वेदों से लिया है| `राजा` का मतलब यहाँ राजवर्ग है, जो शाशन-प्रशाशन करता है , जिसमें आज के नेता,जज और अफसर आ जाते हैं| और `अधीन` शब्द का मतलब है कि प्रजा राजवर्ग को हटा सके,बदल सके या सज़ा भी दे सके | ऐसा `प्रजा-अधीन रजा` की प्रक्रिया हमारे देश में कई हज़ार साल पहले थी लेकिन जब से वो व्यवस्था समाप्त हुई, तबसे हमारा पतन होना शुरू हो गया |  और आज ये प्रक्रियाएँ पश्चिम के देशों में है, जिसके कारण वहाँ भ्रष्टाचार और गरीबी कम है और लोग पड़े-लिखे हैं | 

आम नागरिकों द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को `राईट टू रिकोल नागरिकों द्वारा` या प्रजा अधीन-राजा` कहते हैं और आम नागरिकों द्वारा सजा देने की प्रक्रिया को `ज्यूरी सिस्टम` कहते हैं. मतलब कि वहाँ के राजनेता,  मंत्रि, सरकारी कर्मचारी एवंम जज/न्यायाधीशों के सर के ऊपर दो लटकती तलवार रेहती है कि अगर मैं ठीक से काम नही करूँगा तो मुझे नौकरी में से निकाल देंगे और अगर में भ्रष्टाचार करूँगा तो नौकरी में से निकाल देंगे और नौकरी में से निकलने के बाद मुझे सजा भी 15-20 दिन में देंगे |

(1) आम जनता के पास ऐसा अधिकार हो जिससे वो बहुमति से किसी भी जज, मंत्री, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, पुलिस और बाकी सरकारी नौकर को नौकरी से निकाल सके |

(2) आम जनता के पास ऐसा अधिकार हो जिससे वो बहुमति से किसी भी जज, मंत्री, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, पुलिस और बाकी सरकारी नौकर को कोई भी सजा दे सके, चाहे वो जैल में कारावास हो या फांसी |

(3) आम जनता में से कोई भी नागरिक ज्यूरी* बुलाकर किसी भी जज, मंत्री, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, पुलिस और बाकी सरकारी नौकर को नौकरी से निकाल सके |

(4) आम जनता में से कोई भी नागरिक ज्यूरी* बुलाकर किसी भी जज, मंत्री, मिनिस्टर, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, पुलिस और बाकी सरकारी नौकर को सजा दे सके, चाहे वो जैल में कारावास हो या फांसी |

 

 

 

 

 

 

 

 

 


(*जूरी प्रणाली (सिस्टम) - किसी विवाद को देखते हुए उसी जिले, राज्‍य अथवा राष्‍ट्र के सभी बड़े/व्यसक नागरिकों की मतदाता सूची (लिस्ट) में से क्रमरहित/रैंडम(बिना लाइन के) तरीके से 15, 20 अथवा 50 नागरिकों का चयन किया जाता है जिन्‍हें जूरी मण्‍डल का सदस्‍य कहा जाता है। ये जूरी मण्‍डल के सदस्‍य दलीलें सुनते हैं, सबूतों की जांच करते हैं और फैसले देते हैं । उदाहरण के लिए, भारत में वर्ष 1956 से पहले क्रमरहित / रैंडम (बिना लाइन के) तरीके से चुने गए 12 नागरिकों द्वारा कई मुकद्दमें सुलझाए गए थे। )

भारत के हरेक अनिवासी भारतीय ने इसपर पहले ही दिन से ध्यान दिया होगा I उदाहरण के लिए, जब मैं अमेरिका में था, उस समय मुझे ट्रैफिक के नियमों का उल्लंघन करने पर हवलदारों ने 5 बार रोका था। ट्रैफिक के नियम तोड़ने के लिए,  हवलदारों ने मुझसे 3 बार जुर्माना लिया और 2 बार मुझे क्षमा किया, परन्तु एक बार भी उन्‍होंने संकेत तक नहीं दिया कि घूस लेने में उनकी थोड़ी भी रूचि है I क्यों ? और यह आपके लिए अवश्‍य ही एक रहस्य होना चाहिए कि अमेरिका में पुलिस/जज भारत की तुलना में इतने कम भ्रष्ट क्यों है ? क्या अमेरिका की पुलिस/जज भारत की पुलिस/जज की तुलना में मूर्ख हैं कि वो अपने नागरिकों से घूस वसूलने के चालाकी भरे तरीकों के बारे में नहीं सोच सकते ? नहीं, वे इतने भी मूर्ख नहीं हैं I क्या वे इतने डरपोक हैं कि वे नागरिकों के हाथ न मरोड़ सकें और उनसे घूस ना वसूल सकें? नहीं, वे उतने ही साहसी हैं जितने कि भारत की पुलिस है - थोड़े भी कम नहीं I

तो क्या अमेरिका के हर पुलिसवाले / जज  लालच से परे हैं ? नहींI किसी भी राष्ट्र में ऐसा नहीं हो सकता की वहाँ के लाखों व्यक्तियों में से कोई भी लालची ना हो I तो क्या अधिक वेतन प्राप्‍त करना ही भ्रष्टाचार इतना कम होने का एकमात्र कारण है ? अच्छा तो मान लें कि हमने भारत में अपने पुलिसवालों / जजों के वेतन इस सप्‍ताह दोगुने कर दिए तो क्या वे हमें अगले सप्ताह से घूस में 10 प्रतिशत की छूट देंगे?  उदाहरण के लिए, वर्ष 2009-2010 में सरकार ने सभी जजों के वेतन तीन गुना कर दिए I तो क्या जजों ने अपनी घूस खोरी में अगले दिन 10 प्रतिशत की भी छूट दी ? मेरा अनुमान है, नहीं I इस प्रकार, वेतन अवश्‍य ही एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर भारत और अमेरिका में भ्रष्‍टाचार के स्‍तर में बदलाव लाने हेतु कोई सबसे बड़ा कारण नहीं है। तो और क्या कारण हो सकता है ?

 

(4) भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा निकालने / बदलने / सजा देने का अधिकार और प्रजा अधीन राजा

 

अब, राइट टू रिकॉल और जूरी प्रणाली (सिस्टम) तथा “प्रजा अधीन राजा” कैसे सम्बंधित हैं ? राइट टू रिकॉल और जूरी प्रणाली (सिस्टम) का अर्थ होता है- वह प्रणाली (सिस्टम), जिसके द्वारा नागरिक किसी भी अधिकारी / जज / मंत्री को किसी भी समय निकाल सकते हैं और उनको सजा दे सकते हैं किसी उच्च अधिकारी के पास गए बिना , केवल बहुमत साबित करने के द्वारा I

इस तरह से उच्च अधिकारी , आम नागरिकों के प्रति जवाबदार होते हैं क्योंकि अधिकारी, नौकरी पर  रखने वाले के प्रति जवाबदार नहीं, नौकरी से जो निकाल सकता है उसके प्रति जवाबदार होते हैं, उन्हीं के अनुसार और उनके लिए काम करते हैं | राइट टू रिकॉल (और राईट टू रिकाल पर आधारित जूरी प्रणाली) एकमात्र मालूम तरीका है जो राजा को प्रजा अधीन बनाती है और इस प्रकार मंत्री, अधिकारी, पुलिस, और जजों में भ्रष्टाचार कम करती हैI बहुत सारे अन्य संस्‍था आधारित विकल्प / तरीके प्रस्तावित हुए हैं जैसे पुलिस बोर्ड, न्‍याय आयोग आदि। पर वे सब बिलकुल असफल साबित हुए हैं I इस तरह की संस्‍थाएं भ्रष्टाचार को केवल कुछ समय के लिए रोकती हैं, उसे कम नहीं करतीं I कोई सिस्टम जो राजा को प्रजा से स्वतंत्र (आज़ाद) रखती है वह केवल भ्रष्टाचार को दूसरे हाथों में देती है, उसे कम नहीं कर सकती I

      यदि नागरिक के पास अधिकारियों, जजों, मंत्रियों आदि को निकालने का सीधा कोई मार्ग नहीं होगा, और उन्‍हें निकलने के लिए अन्य अधिकारियों,जजों,विधायकों,सांसदों,मंत्रियों आदि से याचना करना पड़ेगा तो ऐसे में कोई नागरिक अधिकारियों, जजों और मंत्रियों पर काबू में रखने में असफल होगा I अधिकारी, मंत्री,  जज आदि जीवन भर घूस लेंगे, अनैतिक कार्यों पर समर्थन की मांग करेंगे और नागरिकों पर बहुत ज्यादा अत्याचार करेंगे। और इससे भी बुरा होगा कि वे अपने राष्ट्र को विदेशियों के हाथों बेच देंगे ,सेना कमजोर रखेंगे ताकि विदेशी आसानी से आक्रमण कर सकें और हम दुबारा गुलाम हो जाएँगे I(ऐसा हो भी रहा है) अधिकारी, मंत्री, जज आदि चाहे वे जूनियर हों या सीनियर, आपस में “एक दूसरे को बचाने” वाला सांठगांठ बनाएंगे और इन सांठगांठ का प्रयोग करते हुए वे एक दूसरे को सुरक्षित रखेंगे I इस प्रकार, भ्रष्टाचारियों के लिए कोई दंड नहीं रहेगा और भ्रष्टाचार अनियंत्रित (बिना लगाम के) गति से फैलेगाI वे हमेशा “प्रमाण का अभाव” को बहाना बनाएंगे और साथी भ्रष्ट मंत्रियों, अधिकारियों, जजों के भ्रष्‍टाचार का समर्थन करेंगेI नागरिकों का सीधा हस्तक्षेप (बीच बचाव) मानव-जाति में ज्ञात एक मात्र प्रणाली है जो इन सांठगांठों से मुक्ति दिला सकती है I

हटाने का भय और सजा का भय एकमात्र कारण है कि क्‍यों अमेरिका और अन्य देशो में पुलिस प्रमुख, जज आदि भारत के पुलिस प्रमुखों , जजों आदि की तुलना में बहुत कम भ्रष्ट हैं I कृपया ध्यान दें – अन्य कोई कारण नहीं है I और मैं एक बार फिर दोहराता हूँ – अन्य कोई कारण नहीं है I और सभी गलत तर्कों में से सबसे बेकार तर्क है “राजनीतिक संस्कृति” I “जागरूकता ( जानकारी)  का अभाव” एक और बहुत गलत दलील है I

 

(4.1) मात्र 3 लाइन का यह `जनता की आवाज`पारदर्शी-शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) गरीबी को 4 महीने में ही कैसे कम कर सकता है ?
     मान लीजिए आप के पास एक किराये का मकान है और आप ने उसको किराये पर दिया है, तो फिर किराया किसको जाना चाहिए, आपको या सरकार को ? आप कहेंगे कि आप को जाना चाहिए | ऐसे ही आप को यदि पूछें कि यदि एक मकान जिसके दस बराबर के मालिक हैं , किराये पर दिया है, तो किराया किसको जाना चाहिए ? आप कहेंगे कि दस मालिकों को बराबर-बराबर किराया जाना चाहिए | इसी तरह यदि कोई बहुत बड़ा प्लाट हो , जिसके 120 करोड़ मालिक हैं ,यानी पूरा देश मालिक है और वो किराये पर दिया है ,तो उसका किराया पूरे देश वासियों ,120 करोड़ लोगों में बराबर-बराबर बटना चाहिए |

      ऐसे प्लाट हैं जिसके 120 करोड़ मालिक हैं? जी हाँ , आई.आई. एम.ए प्‍लॉट, जे.एन.यू प्‍लॉट, सभी यू.जी.सी प्‍लॉट, अहमदाबाद एयरपोर्ट प्‍लॉट, सभी एयरपोर्टों के प्‍लॉट और हजारों ऐसे भारत सरकार के प्‍लॉटों से मिलने वाला जमीन का किराया और भारत के सभी खनिजों, कोयला और कच्‍चे तेल से मिलने वाली सारी रॉयल्‍टी हम भारत के नागरिकों और हमारी सेनाओं को जानी चाहिए किसी और को नहीं। और यह रॉयल्‍टी व किराया सीधे ही मिलना चाहिए किसी योजना या स्‍कीम के जरिए नहीं। एक तिहाई हिस्सा सेना को जाना चाहिए देश की रक्षा के लिए और बाकी दो तिहाई नागरिकों को बराबर-बराबर बटना चाहिए |

एक अनुमान से यदि ऐसा होता है तो हर एक नागरिक को लगबग 400-500 रुपये महीना मिलेगा जिससे देश की गरीबी कम हो जायेगी | जिस दिन नागरिक प्रधानमंत्री को `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` पर हस्‍ताक्षर करने को मजबूर/बाध्‍य करने में सफल हो जाते हैं, उसी दिन मैं `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` ड्राफ्ट को शपथपत्र/एफिडेविट के तौर पर जमा करवा दूँगा। इस ड्राफ्ट में एक प्रशासनिक तरीके/प्रक्रिया को बताया गया है जिससे राष्‍ट्रीय स्तर के अधिकारी हर नारिक को लगभग 500 रूपए (कम या अधिक हो सकता है) प्रति महीने भेज सकेंगे |
     अब बताएं कि कितने करोड़ नागरिक
, आप समझते हैं, 100 % नैतिक लगभग 500 रूपए (कम या अधिक हो सक्‍ता है) प्रति महीने नहीं लेना चाहते हैं? मैं मानता हूँ कि 40 करोड़ से ज्‍यादा नागरिक 100 प्रतिशत नैतिक रूपए चाहते हैं। और इसलिए `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` यह पक्का करेगा कि प्रधानमंत्री नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर करने को मजबूर हैं। और जब एक बार नागरिकों और `एम.आर.सी.एम` ड्राफ्ट पर हस्‍ताक्षर हो जाता है तो हम आम नागरिकों में से हर एक नागरिक को हर महीने 500 रूपए (कम या ज्‍यादा हो सकता है) के लगभग मिलेगा। और इस प्रकार गरीबी कम होगी।  

क्या `नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी)` ड्राफ्ट पारित करवाने के लिए `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` ड्राफ्ट का भी होना जरूरी है ? यदि नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) समर्थक संसद में बहुमत मिलने तक इंतजार करने और तब `एम.आर.सी.एम` लागू करने पर अड़ जाता है तो ऐसी संभावना है कि `एम.आर.सी.एम` समर्थक को हमेशा के लिए इंतजार ही करते रहना पड़ेगा क्योंकि पहले तो उन्‍हें संसद में बहुमत नहीं मिलेगा। और इससे भी बुरा होगा कि यदि उन्‍हें बहुमत मिल जाता है तो (इस बात की संभावना है) उनके अपने ही सांसद बिक जाएंगे और `नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी) (एम आर सी एम)` ड्राफ्ट पारित करने से मना कर देंगे।

उदाहरण के लिए वर्ष 1977 में जनता पार्टी के सांसदों ने चुनाव से पहले वायदा किया था कि वे प्रजा अधीन राजा / राइट टू रिकॉल कानून लागू करेंगे और चुन लिए जाने के बाद, बाद में उन्‍होंने प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल कानून पास करने से मना कर दिया। इसलिए मेरे विचार से, नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्‍टी(आमदनी) (एम आर सी एम) कार्यकर्ताओं को `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` ड्राफ्ट पर जन-आन्‍दोलन पैदा करने पर ध्‍यान लगाना चाहिए और `जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली` ड्राफ्ट पारित करवाना चाहिए न कि चुनाव में जीतने तक इंतजार करना चाहिए |

 

(4.2) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` क़ानून-ड्राफ्ट का संक्षिप्त (छोटे में ) जानकारी

नागरिकों को अपने खाते बनवाने होंगे अपने अंगुली के छाप और अपना कोई भी पहचान-पत्र देकर | कुछ 2-3% बंगलादेशियों के ,जाली खाते भी बन जाएँगे , जिसकेलिए राष्ट्रीय पहचान पत्र बनाना होगा, जिसके बनने पर, ये भी निकल जाएँगे |

प्रधानमंत्री एक `राष्ट्रिय जमीन किराया अधिकारी` (एन एल आर ओ) घोषित करेंगे , जिसे भारत के नागरिक बदल सकते हैं | बदलने की प्रक्रिया/तरीका प्रजा अधीन-रिसर्व बैंक गवर्नर के सामान होगी | राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल यह सुनिश्‍चित कर देगा कि राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) काफी कम भ्रष्‍ट होंगे और किराये का पैसा नागरिकों को दिया करेंगे ।

राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) उन प्‍लॉटों का आवंटन करेंगे (बांटेंगे) जिन्‍हें भारत के नागरिकों की संपत्‍ति घोषित किया गया है । वे (राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी) ऐसा एक कानून द्वारा या राष्‍ट्रीय जूरी के फैसले के माध्‍यम से करेंगे (जो राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) को जमीन का आवंटन करने/ देने के लिए विशेष तौर से यह काम सौंपेगा )।

राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) कुल प्राप्‍त किराए और देश की सारी खानों की रोयल्टी और अन्य रोयल्टी  (आमदनी) के कुल जोड़ कर का 34 प्रतिशत हिस्‍सा रक्षा मंत्रालय को देगा जो सेना को मजबूत बनाने, हथियार उपलब्‍ध कराने और सभी नागरिकों को हथियार चलाने की शिक्षा देने के काम के लिए होगा।

      राष्‍ट्रीय भूमि किराया अधिकारी (एन एल आर ओ) भारत के नागरिकों को प्रति माह , कुल जमा हुए किराए और रोयल्टी (आंदानी) का 66 प्रतिशत हिस्सा बांटेगा।

 

(4.3) `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) क़ानून-ड्राफ्ट होने से फायदे

      `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) और पब्लिक जमीन का किराया`(एम.आर.सी.एम) आने पर जमीन की कीमत घटेगी क्‍योंकि सार्वजनिक भूमि का किराया देना होगा और इसीलिए भूमि-संग्रह  करना बहुत महंगा पडेगा |

अब यदि जमीन की कीमत गिरती है तो घरों की कीमत भी कम होगी जिससे हम आम लोगों का जीवन सुधरेगा। हम आम लोगों मे से कई लोग, जो झुग्गियों में रहते हैं वे शायद एक शयनकक्ष-हॉल-रसोई (वन - बी-एच-के) कमरों में जा सकेंगे। और यदि जमीन की कीमत घटती है तो व्यवसायों की संख्‍या बढ़ेगी (क्‍योंकि जब जमीन की लागत गिरती है तो कारीगरों के लिए व्‍यावसाय/धंधा बढ़ाना आसान हो जाता है) और हम आम लोगों को ज्‍यादा रोजगार और वेतन मिलेगा। जमीन किराया ओर खदान की रॉयल्‍टी(आमदनी) के प्रस्‍तावों से आय बढ़ेगी और गरीबी कम होगी। इस प्रकार इससे गरीबों और मध्‍यम वर्ग के लोगों की क्रयशक्‍ति/खरीदने की क्षमता बढेगी। क्रयशक्‍ति के बढ़ने से मांग बढ़ेगी और इस प्रकार उधोग धंधे बढ़ेंगे और इससे हमारी सेना भी मजबूत होगी।

      सार्वजनिक भूमि पर किराया जमा करने का प्रभाव खुले अन्याय की तरह है अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण और आर्थिक असमानता अन्यायपूर्ण ढ़ंग से बढ़ेगा।

सार्वजनिक भूमि पर किराया जमा करने का प्रभाव खुले अन्याय की तरह है अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण और आर्थिक असमानता अन्यायपूर्ण ढ़ंग से बढ़ेगा।। उदाहरण के लिए, एयरपोर्टों पर विचार कीजिए। दिल्ली एयरपोर्ट पर विचार कीजिए । यह हर साल दो करोड़ यात्रियों को सेवा देता है। इसके पास किराया मूल् 6000 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष है। अर्थात 6000 रूपया/2 =3000 रूपया प्रति यात्री।

एक उच्‍च वर्ग के आदमी के बारे में विचार कीजिए जो एक वर्ष में 20 बार दिल्‍ली एयरपोर्ट का उपयोग करता है। लेकिन 3000 रूपया प्रति उड़ान की दर से जमीन का किराया उससे न वसूलने के कारण उसकी अमीरी 6,00,000 रूपए बढ़ जाती है । और भारत का प्रत्‍येक आम आदमी को हर साल साठ रूपए की हानि होती है क्‍योंकि आम आदमी को दिल्‍ली एयरपोर्ट के प्‍लॉट ,जो कि उसका अपना है, का कोई किराया नहीं मिला । ऐसा करने से/केवल किराया न वसूलने के अंन्यायपूर्ण साधन से दौलत/आय का अंतर बढ़ जाता है।

 

(4.4) `जनता की आवाज़ ` पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) द्वारा `सेना और नागरिक के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी) आ सकता है |

मेरे प्रत्‍येक क़ानून-ड्राफ्ट में `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` की पहली दो लाईनों को दोहराया गया है। यह दोहराव क्‍यों है? सांकेतिक मूल्‍यों को एक ओर छोड़िए, इस दोहराव का राजनैतिक महत्‍व भी है। यह हो सकता है कि एक `नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी(आमदनी ) `(एम आर सी एम) कार्यकर्ता को सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) विरोधी बुद्धिजीवियों से लड़ाई लड़नी पड़े। तब `नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी` (एम आर सी एम) कार्यकर्ता उसे इस कानून का वैसा क़ानून-ड्राफ्ट उपलब्‍ध कराने की चुनौती दे सकता है जो वह चाहता है और तब उनसे `जनता की आवाज़` की लाइने जोड़ने को कह सकता है। यदि विरोधी पक्ष अंतिम दो लाइनों को जोड़े जाने का विरोध करता है तो उसपर आम-आदमी का विरोधी होने का आरोप लगाया जा सकता है। और यदि वह इन दो लाइनों के जोड़े जाने को स्‍वीकार करता है तब परिणामस्‍वरूप उसका प्रस्तावित कानून इस जनता की आवाज (सूचना का अधिकार-2) पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली को लागू करेगा जिसका उपयोग करके ` नागरिक और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (आमदनी) `(एम आर सी एम) कानून जनता की हां का उपयोग करके लाया जा सकता है।

दो लाइनों का यह जोड़ दर्शाता है कि `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) के लिए मांग केवल कोई दोहराई गयी सकारात्‍मक संकल्‍पना (अच्छा विचार) ही नहीं है बल्‍कि `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) एक ऐसा कानून है जिसे किसी भी अन्य कानून में जोड़ा जा सकता है और यदि एक बार यह कानून `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कानून के साथ जोड़कर पास हो जाए तो इन दोनो कलमों  को सभी जन-हित के कानूनों को लाने/लागू करने में उपयोग  में लाया जा सकता है जिसकाप्रस्ताव मैंने किया है या अन्य कोई व्यक्ति करेगा । `जनता की आवाज` स्‍वयं पैदा करने वाला (सेल्‍फ जरमिनेटिंग) प्रस्‍ताव है अर्थात यदि सभी कानून गलत भी हों, लेकिन एक कानून के साथ `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) का दो धाराएं भी है तो सभी अच्छे कानूनों को लागू किया जा सकता है। और यह दो लाईनों का जोड़ा जाना किसी भी अलोकतांत्रिक कानून को बाहर का रास्‍ता दिखलाने के लिए पर्याप्‍त है । क्‍योंकि यदि किसी अलोकतांत्रिक कानून में ये दो लाईनें शामिल हैं तो इसे कुछ ही दिनों या कुछ ही सप्‍ताह के में नागरिकों द्वारा नकार दिया जाएगा ।

 

(5) महंगाई का असली कारण क्या है और इसका उपाय क्या है ?

 

सामान्य तौर पर महंगाई तभी बढ़ती है जब रुपये (एम 3) बनाये जाते हैं लोन,आदि के रूप में और भ्रष्ट अमीरों को दिए जाते हैं, जिससे प्रति नागरिक रुपये की मात्रा बढ जाती है और रुपये की कीमत घाट जाती है और दूसरे चीजों की कीमत बढ जाती है जैसे खाद्य पदार्थ / खाना-पीना, तेल आदि | भारतीय रिसर्व बैंक के आंकडो के अनुसार, प्रति नागरिक रुपये की मात्रा (देश में चलन में कुल नोट,सिक्कों और सभी प्रकार के जमा राशि का कुल जोड़ को कुल नागरिकों की संख्या से भाग किया गया ) 1951 में 65 रुपये प्रति नागरिक थी और आज, 2011 में लगभग 50,000 रुपये है प्रति नागरिक | 

सब चीजों का दाम सापेक्ष/ तुलनात्मक है और मांग और सप्लाई के अनुसार निर्धारित/ पक्का होता है |

मान लो , केवल एक बाजार है और कुछ नहीं ,आसानी से समझने के लिए | बाजार में , एक बेचनेवाला है जो 10 किलो आलू बेच रहा और एक खरीदार जिसके पास सौ रुपये हैं | मान लो अगली स्थिति में, बेचनेवाले के पास 10 किलो आलू के बजाय 20 किलो आलू हो जाते हैं, तो क्या अब आल का दाम घटेगा कि बढेगा ? आसान सा अनुमान/अंदाजा – आलू का दाम घटेगा क्योंकि आलू की सप्लाई/आपूर्ति बढ गयी है |

एक और स्थिति में , मान लो बेचने वाले के पास 10 किलो आलू हैं लेकिन अब दो खरीदार हैं और दोनों के पास 100-100 रुपये हैं | अब, आलू का दाम घटेगा या बढेगा ? आसान सा अंदाजा/अनुमान- आलू का दाम बढेगा क्योंकि रुपयों की सप्लाई बढ गयी है और इसीलिए रुपये की कीमत घटेगी और दूसरे सामान का दाम बढेगा जैसे खाना-पीना, पेट्रोल, गैस, आदि | असलियत में भी ऐसे ही होता है |

 

अब हम कुछ प्रश्न लेते हैं -

 

प्रश्न 1 - रिसर्व-बैंक और अनुसूचित बैंक रुपये क्यों बनाते हैं ?

वे ऐसा अमीर ,भ्रष्ट लोगों के लिए करते हैं | ये सब कुछ भ्रष्ट अमिर आदमी , रिसर्व बैंक गवर्नर और सरकार की मिली-भगत से होता है  | मान लीजिए एक अमीर कंपनी एक सरकारी बैंक से 1000 करोड़ रुपयों का कर्ज लेते हैं और वापस 200 करोड़ रुपये चूका देती है और बाकी के 800 करोड़ रुपये ,भ्रष्ट अमीर आदमी ,सरकार और रिसर्व-बैंक गवर्नर कंपनी को झूठ-मूठ का दिवालिया घोषित करके आपस में बाँट लेते हैं | अब 800 करोड़ रुपये की पूर्ति करने के लिए सरकार रिसर्व बैंक-गवर्नर/अनुसूचित बैंकों को 800 करोड़ रुपये बनाने के लिए कहती है | इससे देश में जरुरत से अधिक रुपये हो जाते हैं और रुपयों की कीमत कम हो जाती है | और बाकी चीजें महँगी हो जाती हैं | ये ज्यादा रुपयों की सप्लाई , जब बाजार में आ जाती है, तो रूपए की कीमत घट जाती है और सामान की कीमत बढ जाती है, यानी महंगाई हो जाती है |

 

प्रश्न 2 - ये रुपये कौन बनाता है और ये रूपये कहाँ से आते हैं (रुपये=एम3 देश में सभी नोट,सिक्के और सभी प्रकार के जमा राशि का जोड़ है ) ?

कोई स्वर्णमान (गोल्ड स्टैण्डर्ड) अभी नहीं है (कि जितना सोना है , उतना ही पैसा बना सकते हैं) , क्योंकि वो कई दशक पहले पूरी दुनिया में रद्द हो गया है | रिसर्व बैंक गवर्नर/राज्यपाल रुपयों को सरकार के कहने पर बनाता है |

केवल रिसर्व-बैंक ही नोट छाप सकती और सिक्के बना सकती है लेकिन अनुसूचित बैंक जैसे स्टेट बैंक, आई.सी.आई.सी.आई., आदि, भी रुपये (एम 3) बना सकते हैं जमा राशि के रूप में | ये रुपयों की सप्लाई/आपूर्ति में बढने से रुपयों का मूल्य/दम कम हो जाता है और ये दूसरे सामान का दाम बड़ा देता है जैसे  खाना-पीना , तेल के दाम,आदि  और सामान्य महंगाई का मुख्य कारण है |

 

प्रश्न 3 -महंगाई व्यापारियों द्वारा सामान की जमाखोरी से या निर्यात/`देश से बाहर भेजना` से होती है क्योंकि इससे सामान की कमी होती है और सट्टा बाजार या कम पैदावार से भी महंगाई हो सकती है |

सामान की जमाखोरी से सामान की कमी आती है लेकिन कोई भी हमेशा के लिए सामान को जमा नहीं कर सकता और बाजार में सामान को छोड़ने पर , कीमतें कम होंगी और सामान्य कीमतों के बढने में कीमतें केवल एक ही दिशा में, ऊपर की ओर जाती हैं और कीमतें एक बार जब बढ जाती हैं तो कभी भी गिरती नहीं हैं |

ऐसे ही कीमतों का उतार-चढ़ाव का रुख/झुकाव देखा जा सकता है, खाने-पीनी की चीजों और दूसरे सामानों के सट्टे में | और सभी चीजों देश से बाहर नहीं भेजी जाती, इसीलिए सामान का देश से बाहर भेजना कीमतों की ऊपर की ओर का सामान्य झुकाव के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता | `सकल(कुल) घरेलु उत्पाद(जी.डी.पी)` 1951 से 2011 तक केवल तीन गुना बड़ा है , इसीलिए  वो हज़ार गुना रुपयों की मात्र के बढौतरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता | पेट्रोल के दाम और ढुलाई का लागत  से भी आम महंगाई नहीं बढती क्योंकि ढुलाई की लागत , किसी भी चीज की लागत की केवल 2-4% ही होता है

 

प्रश्न 4 - ये कीमतों का बढना=महंगाई सभी नागरिक, गरीब और अमीर,सांठ-गाँठ के साथ और बिना कोई सांठ-गाँठ के , दोनों को एक समान असर करती है ?

नहीं | जो लोग गरीब हैं, बिना किसी सांठ-गाँठ/संपर्क के , वे और गरीब हो जाते हैं जब सामान के दाम बढ जाते हैं | और अमीर, विशिष्ट वर्ग के लोग सरकार के साथ मिली-भगत बना लेते हैं और रुपयों को बनवा लेते हैं मुफ्त में !! इस तरह, अमीर, सांठ-गाँठ/संपर्क वाले लोग गरीब, बिना कोई राजनैतिक या उच्च संपर्क के, आम लोगों को लूट रहे हैं !!

 

प्रश्न 5 - इसका कोई उपाय है ?

बिलकुल है |

      इसके दो उपाय हैं- पहला कि रिसर्व बैंक के गवर्नर और प्रधानमंत्री को निकालने / बदलने का अधिकार आम नागरिकों को होना चाहिए यानी राईट टू रिकाल-रिसर्व बैंक गवर्नर और राईट टू-रिकाल-प्रधानमंत्री |इसका ड्राफ्ट आगे देख सकते हैं |

दूसरा उपाय है कि नए रुपये बनने के लिए कम से कम 51 % नागरिक स्वकृति दें | इसके लिए हमें तीन लाइन क़ानून या `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` को प्रधानमंत्री को हस्ताक्षर करने के लिए कहना होगा |

ये सन्देश कि महंगाई का असल कारण क्या है और इसका समाधान क्या है ,घर-घर तक पहुंचाएं और देश को समृद्ध बनाएँ|

 

(6 ) प्रजा अधीन - भारतीय रिजर्व बैंक गवर्नर (आर बी आई) के लिए सरकारी अधिसूचना का क़ानून-ड्राफ्ट

 

नागरिकों को `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) के प्रभावी हो जाने के बाद ही इस परिवर्तन को लाना चाहिए / करना चाहिए। और `जनता की आवाज़` का प्रयोग करते हुए इस परिवर्तन का सृजन करना चाहिए । उस प्रक्रिया जिसका उपयोग करके हम आम लोग भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर को बदल/हटा सकते हैं, उसका के लिए जरूरी कानून का ड्राफ्ट निम्‍नलिखित है-

 


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निम्नलिखित के लिए प्रक्रिया

प्रक्रिया / तरिका

1

-

नागरिक शब्‍द का मतलब रजिस्टर्ड वोटर / मतदाता है।

2

जिला कलेक्‍टर

यदि भारत का कोई भी नागरिक भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) का गवर्नर बनना चाहता हो तो वह जिला कलेक्‍टर के समक्ष , कार्यालय स्‍वयं अथवा किसी वकील के जरिए एफिडेविट लेकर जा सकता है। जिला कलेक्‍टर सांसद के चुनाव के लिए जमा की जाने वाली वाली धनराशि के बराबर शुल्‍क/फीस लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर पद के लिए उसकी दावेदारी स्‍वीकार कर लेगा।

3

तलाटी /पटवारी /लेखपाल (अथवा तलाटी का क्‍लर्क)

यदि उस जिले का नागरिक तलाटी/ पटवारी के कार्यालय में स्‍वयं जाकर 3 रूपए का भुगतान करके अधिक से अधिक 5 व्‍यक्‍तियों को भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर के पद के लिए अनुमोदित / स्वीकृत करता है तो तलाटी उसके अनुमोदन / स्वीकृति को कम्‍प्‍युटर में डाल देगा और उसे उसके वोटर आईडी / मतदाता पहचान-पत्र, दिनांक और समय, और जिन व्‍यक्‍तियों के नाम उसने अनुमोदित किए है, उनके नाम, के साथ रसीद देगा।

4

तलाटी

वह तलाटी नागरिकों की पसंद / प्राथमिकता को प्रधानमन्त्री के वेबसाइट पर उनके वोटर आईडी / मतदाता पहचान-पत्र और उसकी प्राथमिकताओं के साथ डाल देगा।

5

तलाटी

यदि कोई नागरिक अपने अनुमोदन / स्वीकृति रद्द करने के लिए आता है तो तलाटी उसके  एक या अधिक अनुमोदनों को बिना कोई शुल्‍क लिए बदल देगा।.

6

मंत्रिमंडल सचिव

प्रत्‍येक महीने की पांचवी / 5 तारीख को मंत्रिमंडल सचिव प्रत्‍येक उम्‍मीदवार की अनुमोदन / स्वीकृति की गिनती पिछले महीने की अंतिम तिथि की स्‍थिति के अनुसार प्रकाशित करेगा / छापेगा ।

7

प्रधानमंत्री

यदि किसी उम्‍मीदवार को किसी जिले में सभी दर्ज / रजिस्‍टर्ड मतदाताओं के 51 प्रतिशत से ज्‍यादा नागरिक-मतदाताओं (केवल वे मतदाता ही नहीं जिन्‍होंने अपना अनुमोदन/स्वीकृति फाइल किया है बल्‍कि सभी दर्ज मतदाता) का अनुमोदन/स्वीकृति मिल जाता है तो प्रधानमंत्री ,वर्तमान भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर को हटा सकते हैं या उन्‍हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है और उस सर्वाधिक अनुमोदन/स्वीकृति प्राप्‍त उस उम्‍मीदवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर के रूप में रख(नियुक्‍त) सकते हैं या उन्‍हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री का निर्णय / फैसला अंतिम होगा।

8

जिला कलेक्‍टर

यदि कोई नागरिक इस कानून में कोई बदलाव चाहता है तो वह जिलाधिकारी/डी सी के कार्यालय में जाकर एक एफिडेविट जमा करा सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रूपए प्रति पृष्‍ठ / पेज का शुल्‍क लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।

9

तलाटी (या

पटवारी)

यदि कोई नागरिक इस कानून या इसकी किसी धारा के विरूद्ध अपना विरोध दर्ज कराना चाहे अथवा वह उपर के धारा में प्रस्‍तुत किसी एफिडेविट पर हां – नहीं दर्ज कराना चाहे तो वह अपने वोटर आई कार्ड के साथ तलाटी के कार्यालय में आकर 3 रूपए का शुल्‍क देगा। तलाटी हां-नहीं दर्ज कर लेगा और उसे एक रसीद/पावती देगा। यह हां – नहीं प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाला जाएगा।

 

 

कृपया ध्यान दें कि

(1) इसी तरह का क़ानून-ड्राफ्ट ,नागरिकों द्वारा भ्रष्ट जिला शिक्षा-अधिकारी ,भ्रष्ट जिला पोलिस कमिश्नर, भ्रष्ट मुख्यमंत्री, भ्रष्ट प्रधानमंत्री, भ्रष्ट लोकपाल आदि को बदलने के लिए भी बनाया जा सकता है, जो प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षर करने पर भारतीय राजपत्र में आ कर लागू हो सकते हैं |

(2) भ्रष्ट सांसद, विधायक और सरपंच को भी निकालने का इसी तरह का क़ानून-ड्राफ्ट चाहिए, केवल वर्त्तमान सांसद,विधायक के हटाये जाने के बाद, नए चुनाव होंगे |

(3) इन क़ानून-ड्राफ्ट के साथ `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली भी जोड़ा गया है , जिससे अन्य कोई देश और जनता का हित का क़ानून , करोड़ों नागरिकों की स्वीकृति और दबाव द्वारा आ सकते हैं |

 

(7) इस प्रकार तीन लाइनों के इस कानून और भारतीय रिजर्व बैंक गवर्नर (आर बी आई ) और प्रधानमंत्री को बदलने / हटाने की प्रक्रिया से महंगाई पर लगाम लगेगी

 

मूल्य वृद्धि के पीछे एकमात्र कारण भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) , भारतीय स्‍टेट बैंक (एस बी आई) आदि द्वारा रूपए (एम 3) का अंधाधुंध निर्मार्ण है । इस अंधाधुंध बढ़ोत्‍तरी को बहुसंख्‍य नागरिकों के विरोध के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर द्वारा मंजूरी / स्‍वीकृति दी जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर मनमाने ढ़ंग से काम करते हैं। क्‍योंकि नागरिकों के पास उसे हटाने का कोई तरीका/प्रक्रिया नहीं है । लेकिन यदि एक बार नागरिकों के पास भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर और प्रधानमंत्री को हटाने/बदलने की तरीका/प्रक्रिया आ जाता है तो भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर अच्‍छा व्‍यवहार करने लगेंगे और रूपए के अंधाधुंध विनिर्माण की अनुमति नहीं देंगे।

इसलिए, जिस दिन नागरिकगण प्रधानमंत्री को `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) पर हस्‍ताक्षर करने के लिए मजबूर करने में सफल हो जाते हैं, उस दिन कोई न कोई भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) के प्रारूप को एफिडेविट/शपथपत्र के रूप में जमा करवा देगा। करोड़ों नागरिक जो रूपए के बनाने के कारण अत्‍यधिक गरीब हुए हैं, वे इस एफिडेविट पर तब हां दर्ज कर देंगे जब उन्हें यह बताया जाएगा कि कैसे भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर मूल्‍य / कीमत बढ़ाने के लिए जिम्‍मेवार हैं और एक बार यदि करोड़ों नागरिक इस एफिडेविटों पर हां दर्ज कर देते हैं तो प्रधानमंत्री को मजबूर होकर इन कानूनों पर हस्‍ताक्षर करना ही होगा। और यदि एक बार भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर को बदलने की प्रक्रिया लागू हो जाती है तो भारतीय रिजर्व बैंक (आर बी आई) के गवर्नर रूपए के बनाने/निर्माण को कम करने, रूपए उधार देने में बेइमानी /भ्रष्‍टाचार कम करने को मजबूर हो जाएंगे और इससे मूल्‍य वृद्धि पर काबू होगा और असली   विकास की गति में तेजी भी आएगी। इस प्रकार तीन लाइनों के `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली कानून का उपयोग करके हम अपने एक भी सांसद का चुनाव हुए बिना कीमतों के बढ़ने को कम कर सकते हैं और विकास की गति को बढ़ा सकते हैं।

यदि राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन राजा (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार ) समर्थक संसद में बहुमत मिलने तक इंतजार करने और तब नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम आर सी एम) लागू करने पर अड़ जाता है तो ऐसी संभावना है कि राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन राजा समर्थक को हमेशा के लिए इंतजार ही करते रहना पड़ेगा क्योंकि पहले तो उन्‍हें संसद में बहुमत ही नहीं मिलेगा। और इससे भी बुरा होगा कि यदि उन्‍हें बहुमत मिल जाता है तो (इस बात की संभावना है कि) उनके “अपने ही” सांसद बिक जाएंगे और जन हित के  ड्राफ्ट/धारा पारित करने से मना कर देंगे। उदाहरण के लिए वर्ष 1977 में जनता पार्टी के सांसदों ने चुनाव से पहले वायदा किया था कि वे प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानून लागू करेंगे और चुन लिए जाने के बाद, बाद में उन्‍होंने प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल (भ्रष्‍ट को बदलने का अधिकार) कानून पास करने से मना कर दिया। इसलिए मेरे विचार से, राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन राजा (आर.टी.आर) कार्यकर्ताओं को `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) क़ानून-ड्राफ्ट पर जन-आन्‍दोलन पैदा करने पर ध्यान लगाना चाहिए और `जनता की आवाज`-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) क़ानून-ड्राफ्ट पारित करवाना चाहिए न कि चुनाव में जीतने तक इंतजार करना चाहिए ।

 

(8.1) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के समर्थन से आरक्षण कम करना, `आर्थिक विकल्प / चुनाव` अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के `समर्थन / हाँ` से |

 

मैंने एक सरकारी अधिसूचना का प्रस्‍ताव किया है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों के हां द्वारा आरक्षण कम कर देगा। यह प्रणाली/तरीका, जिसका प्रस्‍ताव मैंने किया है, उसे मैंने आर्थिक-विकल्‍प का नाम दिया है।

दलितों, अन्‍य पिछड़े वर्गों के लिए द्वितीय विकल्प / चुनाव प्रणाली (सिस्टम) का सार / सारांश इस प्रकार है :-

1.    किसी उपजाति का कोई भी सदस्‍य जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अथवा अन्‍य पिछड़े वर्ग का हो, वह तहसीलदार के कार्यालय जाकर अपना जांच/सत्यापन करवाकर आर्थिक-विकल्प / चुनाव के लिए आवेदन कर सकता है। इस आर्थिक-विकल्प/चुनाव में निम्‍नलिखित बातें/तथ्‍य हैं -:

·                     उस व्‍यक्‍ति का अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्‍य पिछड़े वर्ग का दर्जा बना रहेगा।

·                     उसे समायोजित मुद्रास्‍फीति(महंगाई दर के अनुसार ठीक किया गया) के बदले/लिए 600 रूपए हर साल मिलेगा जब तक कि वह अपने आर्थिक-विकल्प/चुनाव के चयन को रद्द/समाप्‍त नहीं कर देता।

·                     जब तक उसे पैसे का भुगतान होता रहेगा, तब तक वह आरक्षण कोटे में आवेदन नहीं कर सकता।

·                     उस दिन वह आरक्षण के लाभ के लिए पात्र/योग्‍य माना जाएगा, जिस दिन वह अपने दूसरे विकल्प/चुनाव को रद्द/समाप्‍त कर देगा।

·                     जितने संख्या में पिछड़ी जातियों के लोगों ने (आर्थिक) विकल्प/चुनाव लिया है, उतनी संख्‍या के आधार पर आरक्षित पदों की संख्‍या में कमी की जाएगी।

·                     इसके लिए पैसा सभी जमीनों पर टैक्‍स की वसूली से आएगा कहीं और से नहीं।

2.    उदाहरण -भारत की आबादी (लगभग) 100 करोड़ है जिसमें से 14 करोड़ लोग अनुसूचित जाति के हैं । इसलिए यदि किसी कॉलेज में 1000 सीटें हैं तो उनमें से 140 सीटें आरक्षित रहेंगी। अब मान लीजिए, इन 14 करोड़ लोगों में से लगभग 6 करोड़ लोग आर्थिक-विकल्प/चुनाव अपनाने पर जोर देते हैं तो उनमें से प्रत्‍येक को हर महीने 50 रूपए मिलेगा और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण 6 प्रतिशत कम हो जाएगा अर्थात यह लगभग 8  प्रतिशत रह जाएगा।

     

 

(8.2) क्‍यों उपर लिखित प्रस्‍तावित कानून को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्‍य पिछड़े वर्ग के लोगों की `हां` मिलेगी ?

 

गाँव में सरपंच का बेटा आगे आकार आरक्षण का लाभ उठाता है और आर्थिक तंगी एवं निरक्षरता /अनपढ़ होने के कारण बाकी गांववालों को कुछ नहीं मिलता , यह स्वतंत्रा के बाद हर पीड़ी में होता आया है | उस सरपंच के बेटे को लाभ मिलने से ज्यादा अगर बाकी गांववालों को 600 रुपया मिल जाये तो कल को वो अपने बच्चों को स्कुल में भेजना भी शुरू कर सकते हैं |  उन्हें आरक्षण नहीं आर्थिक सहायता की जरुरत है|

     क्योंकि 80 प्रतिशत से अधिक गरीब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग 12 वीं कक्षा तक भी पास नहीं कर पाते और इस प्रकार उनके लिए आरक्षण का कोई अर्थ नहीं है। पांच सदस्यों के एक परिवार को हर वर्ष 3000 रूपए मिलेंगे यदि वह परिवार आर्थिक-चुनाव के तरीके को स्वीकार करता है और इसमें उसका कुछ नुकसान नहीं होगा। 80 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन् पिछड़े वर्ग के लोगों द्वारा आर्थिक-विकल्प/चुनाव चुनने के साथ ही – आरक्षण कोटा घटकर 10  प्रतिशत से भी कम रह जाएगा। अब योग्यता सूची/मेरिट लिस्ट में वैसे भी 10 प्रतिशत ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन् पिछड़े वर्ग के लोग तो रहते ही हैं इसलिए प्रभावी/लगाया जाने वाला आरक्षण घटकर के बराबर रह जाएगा। इसलिए यदि एक बार `जनता की आवाज- पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)` पर हस्ताक्षर हो जाए और यदि आर्थिक-चुनाव/विकल्प की मांग करने वाला एफिडेविट जमा हो जाए तो 80 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन् पिछड़े वर्ग के लोग हां दर्ज करवा देंगे।

 

(9) ज्यूरी सिस्टम = प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र

 

पश्चिम के देशों में भारत के मुकाबले में भ्रष्टाचार क्यों कम है ? उसका कारण है कि वहाँ के नागरिको के पास उनके राजनेता,  मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी एवंम जजों को नौकरी से निकालने की और उनको सजा देने की प्रक्रिया / तरीका है और उनको यह करने के लिए जजों के सामने गिडगिडाना या अनुरोध नहीं करना पड़ता |

इस नागरिकों द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया / तरीके को राईट टू रिकोल कहते हैं और इस क्रम-रहित (बिना लाइन के) तरीके से चुने गए नागरिकों द्वारा सजा देने की प्रक्रिया / तरीके को ज्यूरी सिस्टम कहते हैं | मतलब की वहाँ के राजनेता,  मंत्री, सरकारी कर्मचारी एवंम जजों के सर के ऊपर दो लटकती तलवार रेहती है कि अगर में ठीक से काम नही करूँगा तो मुझे नौकरी में से निकाल देंगे और अगर मैं भ्रष्टाचार करूँगा तो नौकरी में से निकाल देंगे और नौकरी  में से निकलने के बाद मुझे सजा भी 15-20 दिन में देंगे |

अभी हम भारत का देखें तो हमें जजों, सी.बी.आई और पुलिस पर निर्भर रेहना पड़ता है | हम अपने आप राजनेता, मंत्री , सरकारी कर्मचारी, जजों को काम से या नौकरी से निकाल नहीं सकते और उनको सजा 15-20 दिन में नहीं दे सकते |

अभी मैं आप को बताऊंगा की पश्चिम के देशों में राजनेता, मंत्री, सरकारी कर्मचारी, जजों को सजा देने की प्रक्रिया / तरीका कैसे काम करती है जिसको ज्यूरी सिस्टम के नाम से जाना जाता है |

 

(1) पश्चिम में भ्रष्टाचार का कोई भी मामला जब भी कोर्ट मे आता है तो उसका फैसला लेने और सज़ा देने का अधिकार जजों के पास नहीं होता है लेकिन आम जनता के पास होता है , मतलब आम नागरिक  कोर्ट में निर्णय करता है नाकि जज| जज केवल सुनवाई की अध्यक्षता करता है ,ताकि सुनवाई में कोई दिक्कत न हो |
(2) वहाँ जब भी कोर्ट में भ्रष्टाचार का कोई मामला आता है, तो वहाँ के जिले की कुल आबादी या जन-संख्या में से क्रम-रहित तरीके (बिना लाइन के ) से 15 से 20 नागरिकों का चुनाव किया जाता हे जिसको जूरी कहते हैं | फिर उनको कोर्ट में बुलाया जाता है और दोनों पक्ष अपना प्रस्ताव कोर्ट में उन चुने गए 15 से 20 नागरिकों के सामने रखते हैं | फिर वो अपना निर्णय सुनाते हैं जो जज और दोनों पक्ष को मानना ही पड़ता है|

(3) फिर क्रम-रहित तरीके (बिना कोई लाइन के) से चुने हुए नागरिक या जूरी उसी वक्त 15-20 दिन में निर्णय ले लेते हैं कि राजनेता, मंत्री, सरकारी कर्मचारी, जज कसूरवार हैं या बेकसूर | अगर एक बार जूरी या नागरिक कसूरवार ठहरा देते है तो जज को उसी वक्त जूरी के फैसला को सुनाना पड़ता है |

(4) जज केवल कोर्ट की कार्यवाई अच्छे से चले ये पक्का करता है,कुछ नियमों की जानकारी देता है जूरी के लोगों को , और एक मध्यस्त/`बीच-बचाव करने वाला` का कार्य करता है |

(5) नागरिक या जूरी एक बार सजा सुना दे तो जज सजा सुनाने का काम 1 घंटे के बाद भी नहीं कर सकता, उसको उसी वक्त सजा देनी पड़ती है भ्रष्ट राजनेता, मंत्रियों, सरकारी कर्मचारी, जजों को |

(6) हर मामले के बाद जूरी बदल जाती है | हर नागरिक केवल 1 बार 10 साल में जूरी मे आता है और आ सकता है | और अगर कोई राजनेता, मंत्री, सरकारी कर्मचारी, जजों पर कोई भ्रष्टाचार के 100 केस हैं ,तो 100 अलग-अलग जूरी आती है, मतलब कि जिले की कुल आबादी या जन-शंख्या में से क्रम-रहित तरीके से (बिना लाइन के चुना गए) 1500-2000 नागरिकों का चुनाव करके 100 अलग-अलग जूरी बनायी जाती है और 100 अलग-अलग जूरी स्वतन्त्र(अपना) निर्णय करके अलग अलग 100 सजा देती है |

(7) ज्यूरी पैसे से खरीदी नहीं जा सकती. मान लो कि एक मुजरिम के जीवनकाल में उसके ऊपर 30 साल में 3000 केस होंगे |

जज सिस्टम या जज आधीन न्यायतंत्र में यही 3000 केस सिर्फ 30 जज के पास जायेंगे | तो वो जज को घूस देना उनके रिश्तेदार वकीलों के द्वारा , और वो केस की तारीख बढ़ाना, मामले को अपने पक्ष में करना काफी आसान है |

ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में यही 3000 केस, 30,000 से 45,000 आम नागरिको के पास जायेंगे |

- ज्यूरी को रिश्वत देना संभव नहीं है | अगर कोई गैंग में यदी 1000 गुंडे हैं और उनपर यदी हर साल 100 केस होते है तो कुल 1 लाख केस होंगे एक गैंग पर, वो 1 लाख केस 15-20 लाख नागरिकों के पास जायेंगे | मगर वो गैंग 15-20 लाख नागरिको को रिश्वत नहीं दे सकता |

- नागरिक यह सोच कर भी घूस नहीं लेगा की अगर आज मैंने इसे छोड दिया तो कल ये गैंग मुझे भी परेशांन कर सकता है. ये भविष्य में मुझसे ही हप्ता मांगेगा, मेरा ही घर खाली करके मुझसे ही छीन लेगा या मेरे ही पेट में चाकू घुसायेगा |

- जज सिस्टम या जज आधीन न्यायतंत्र में जज यदी एक बार आरोपी या मुजरिम को छोड देता है, तो आरोपी या मुजरिम जज को कोइ नुकसान नहीं करता |

(8) ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में नागरिक जज से अच्छा फैसला दे सकते हैं क्योंकि 15 से 20 जूरी के सदस्यों को 1 केस सुनने के लिये 15 से 30 दिन पूरे मिलते हैं , तो वो आराम से सभी पक्षों को सुनकर अपना फैसला दे सकते हैं |

(9) ज्यूरी सिस्टम या प्रजा एवम नागरिक आधीन न्यायतंत्र में अनपढ़ लोग या नागरिक भी ज्यूरी बनकर अपना निर्णय ले सकते हैं ,उसके लिये कोई विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं है जैसे की, भ्रष्टाचार, खून, रेप, जेब काटना, पेटंट, प्रोपर्टी आदि |

कानून केवल एक सामान्य ज्ञान है | बुद्धिजीवी या कु-बुद्धिजीवी ये गलत प्रचार किया करते हैं कि कानून एक मुश्किल विषय है लेकिन एक अनपद भी क़ानून आसानी से समझ सकता है | अधिक जानकारी के लिए कृपया चैप्टर 7,21 पड़ें www.righttorecall.info/301.h.pdf का |

 

(10) कृपया पारदर्शी शिकायत / सुझाव प्रणाली के धाराएं / खंड और राइट टू रिकॉल लोकपाल ,नागरिकों द्वारा के धाराएं , लोकपाल में जूरी के धाराएं को लोकपाल बिल में जोड़े

 

वंदे मातरम |

     (अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) इन प्रस्तावित ड्राफ्ट पर http://righttorecall.com/004.h.pdf में दिए गए हैं|)

 

(10.1) मैं सबसे निवेदन करता हूँ की निम्नलिखित सन्देश को पत्र / ई-मेल द्वारा स्थायी समीति को भेजें –

 

To: k p <kpsingh@sansad.nic.in>

Cc: cpers@sansad.nic.in

श्री के.पी सिंह , डायरेक्टर, राज्य सभा सचिवालय,

201, दूसरी मंजिल, पारलियामेंट हाउस अन्नेक्स, नयी दिल्ली-110001

माननीय स्थायी समिति के अध्यक्ष,

माननीय श्री अन्ना जी (और साथी),

माननीय श्री शेषण जी,

माननीय श्रीमती अरुणा रॉय जी,

माननीय भारत के सभी मंत्री,

 

ये एक खुली चिट्ठी है आप लोगों के लोकपाल के ड्राफ्ट में कुछ धाराएं जोड़ने के लिए |
     मेरे विचार से, इन धाराओं से पारदर्शिता बढ़ेगी और लोकपाल के भ्रष्ट और तानाशाही होने की सम्भावना को कम करेगी |
                        
मेरी 4 विनती है आपसे –   

1. कृपया नागरिकों को देखने दीजिए जो सुझाव दिए जा रहा हैं, ड्राफ्ट कमिटी के वेबसाइट पर और उन सुझावों पर अन्य लोगों अपने कमेन्ट डाल सकें , ऐसी व्यवस्था करें |

2. कृपया वे धाराएं जोड़े लोकपाल बिल में ,जिससे यह पक्का/सुनिश्चित हो कि नागरिक एक एफिडेविट लोकपाल के वेबसाइट पर रख सकें और अन्य नागरिक अपना नाम उसके साथ जोड़ सकें, उस एफिडेविट का समर्थन करने के लिए  I

3. कृपया राइट टू रिकॉल-लोकपाल धाराओं को आज ही जोड़े ,अगले जन्म में नहीं I बिना राइट टू रिकॉल  लोकपाल संभव है कि वो धन लोकपाल बन जाएगा I नागरिकों कों 10 लोकपाल सदस्य और एक लोकपाल अध्यक्ष में से एक को के द्वारा बदलने का अधिकार हो I

4. कृपया लोकपाल में जूरी द्वारा जाँच की धाराएं जोड़ें |


नमस्कार, _________________________(अपना नाम)

 

(10.2) तीन पारदर्शी शिकायत / सुझाव प्रणाली के धाराएं

 

निम्नलिखित खंड जोड़े जाने के लिए प्रस्तावित हैं लोकपाल बिल में, शिकायत/सुझाव प्रणाली में पारदर्शिता देने के लिए |

सैक्शन–NN : पारदर्शी शिकायत / सुझाव प्रणाली के धाराएं

 

धारा / खंड # -(अधिकारी जिसके लिए निर्देश / आदेश है)

प्रक्रिया/पद्धति

 

धारा 1- (कलेक्टर(या उसके द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट) को निर्देश)

राष्ट्रपति के द्वारा यह आदेश दिया जाता है कि : यदि कोई दलित वोटर या बुजुर्ग वोटर या गरीब वोटर या किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर उनके जिला में यदि कोई शिकायत देना चाहता है लोकपाल को ,तो वह कलेक्टर (या उसके द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट) को शिकायत वेबसाइट पर रखने की विनती करेगा | कलेक्टर या उसका द्वारा नियुक्त कार्यकारी मेजिस्ट्रेट एक सीरियल नंबर / क्रमांक संख्या देकर वह एफिडेविट लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा रु.20 प्रति पन्ना लेकर I एफिडेविट को कार्यकारी मेजिस्ट्रेट के मुहर लगाने से पहले ही तैयार कर लेना पड़ेगा जो की रु. 20 में लिया जाएगा और दो साक्षी द्वारा हस्ताक्षर किये गए हों I शिकायत करने वाला और दोनों साक्षियों के पास मतदाता पहचान पत्र होना अनिवार्य है I

धारा 2- (तलाटी/पटवारी/गांव के अधिकारी/लेखपाल (या उसका क्लर्क) को निर्देश)

राष्ट्रपति पटवारी को यह आदेश देता है की :

(2.1) यदि कोई दलित वोटर या बुजुर्ग वोटर या गरीब वोटर या किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर अपने मतदाता पहचान पत्र के साथ आता है और स्पष्ट रूप से किसी शिकायत ,जो लोकपाल के वेबसाइट पर दर्ज है ,पर अपना हाँ/ना करवाना चाहता है, तो पटवारी उसका हाँ/ना दर्ज करेगा लोकपाल के वेबसाइट पर ,उस नागरिक के मतदान पहचान पत्र संख्या के साथ और उससे 3 रुपये की फी/शुल्क लेकर रसीद देगा  I

(2.2) नागरिक अपने हाँ/ना को बदल भी सकता है पटवारी को रु. 3 की फी देकर I

(2.3) `गरीबी के नीचे रेखा`(बी.पी.एल) कार्ड धारक के लिए यह फी/शुल्क रु 1. होगी I

धारा 3-( प्रत्येक नागरिक, लोकपाल)

यह खंड केवल पारदर्शी शिकायत प्रणाली के लिए ही है I यह मत-संग्रह/रेफेरेंडम नहीं है I हाँ/ना लोकपाल इत्यादि पर बंधनकारी/जरूरी नहीं है I यदि  “एक निश्चित संख्या” से ज्यादा महिला वोटर, दलित वोटर ,बुजुर्ग नागरिक वोटर, गरीब वोटर, किसान वोटर या अन्य नागरिक वोटर `हाँ`  दर्ज करवाते हैं किसी दी गयी एफिडेविट पर ,तो लोकपाल कार्यवाही कर सकता है दो महीने में या उसको ऐसा करने की जरुरत नहीं है I या तो लोकपाल इस्तीफा दे सकता है I “निश्चित संख्या” का निर्णय लोकपाल करेगा I इसमें लोकपाल का निर्णय अंतिम होगा I

और प्रत्येक नागरिक से यह ध्यान देने की विनती है कि यह प्रक्रिया/पद्धति लोकपाल चयन समिति को सुझाव देने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं I

ये पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) ये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत देखी जा सके और जाँची जा सके कभी भी , कहीं भी और किसी के भी द्वारा ताकि कोई नेता, कोई बाबू (लोकपाल आदि), कोई जज या मीडिया उस शिकायत को दबा नहीं सके |

ये सैक्शन सुनिश्चित करेगा कि यदि लोकपाल करोड़ों लोगों की शिकायत को नजरंदाज कर रहा है तो उसकी पोल खुल जायेगी और उसकी पोल खुल सकती है इसलिए वो करोडो की शिकायतें को नजरंदाज नहीं करेगा |

 

प्रश्न : क्या कोई व्यक्ति मतदाताओं को खरीद सकता है ऊपर दिए हुए प्रक्रिया/पद्धति में ?

उत्तर : नहीं | कृपया (2.2) देखिये I यदि ऐसा मान लें कि कोई धनी/पैसे वाला व्यक्ती 100 रुपया देता है एक करोड नागरिकों को `हाँ` दर्ज करवाने के लिए तो खंड 2.2 के अनुसार वोटर अपने `हाँ` दर्ज किये हुए को अगले दिन बदल सकता है I अब यदि 1000 धनी व्यक्ती मिलकर अपना सारा पैसा भी खर्च करें, फिर भी वे हर नागरिक को प्रतिदिन 100 रुपया नहीं दे सकते I इसी लिए `हाँ` दर्ज करवाने के लिए किसी को खरीदना, ऊपर दिए हुए पारदर्शी शिकायत प्रणाली में संभव नहीं है I

 

प्रश्न : धारा-2 का महत्व क्या है ?

उत्तर : लोकपाल बिल पर ध्यान दीजिए जिसमें लिखा है : लोकपाल के कर्मचारी के विरुद्ध शिकायत वेबसाइट पर रखी जाएगी I अब यदि 1,00,000 नागरिकों की एक ही शिकायत है तो ? तो क्या हर कोई शिकायत की कॉपी भेजेंगे लोकपाल को ? इससे पूरी तरह लोकपाल का कार्यलय शिकायतों से भर जाएगा I और क्या होगा यदि एक करोड नागरिकों की शिकायत एक ही है लोकपाल के विरुद्ध ? तो क्या हर एक को लोकपाल के कार्यलय में व्यक्तिगत रूप से बुलाना पड़ेगा ? या कलेक्टर के कार्यलय में बुलाएं , शिकायत जमा करने के लिए ? यह क़ानून-व्यवस्था के समस्या को बढ़ावा देगा I धारा-2 समस्याओं को सरल करेगा – कुछ व्यक्ती अपने शिकायत को जमा करेंगे और बाकि सभी तलाटी के कार्यलय जाकर अपना नाम शांतिपूर्वक जोड़ देंगे I

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उत्तर के लिए कृपया www.righttorecall.info/004.h.pdf देखें|

 

(10.3) राइट टू रिकॉल,धारा --- दस में से एक लोकपाल को बदलने का अधिकार नागरिकों को होना चाहिए

मान लीजिए कि आपकी एक फैक्ट्री/कंपनी है जिसमें 100 कर्मचारी हैं और सरकार एक कानून बनाती है की आप किसी भी कर्मचरी को ना ही निकाल सकते और ना नहीं निलंबित कर सकता हैं अगले 5 से 25 वर्षों तक उच्च न्यायलय/सुप्रीम-कोर्ट के बिना सहमति लिए हुए I तब व्यवस्था बिगड़ेगी या सुधरेगी ? हम नागरिक 10 लोकपाल को रख (नियुक्त) रहे हैं और लोकपाल क़ानून-ड्राफ्ट यह कहता है की हम नागरिक उन 10 में से 1 लोकपाल को भी नहीं निकाल सकते हैं बिना सुप्रीम कोर्ट के जज या मंत्रियों की अनुमति के बिना !

तो मेरा यह सुझाव है की कम से कम 10 में से 1 लोकपाल नागरिकों द्वारा हटाने/बदलने का अधिकार होना चाहिए यदि सभी 10 को न बुलाया जा सके I `सिविल सोसाइटी` में से अधिकतर यह विश्वास करते हैं कि हम आम नागरिक किसी बेईमान को ही रखेंगे (नियुक्त करेंगे) I पहले तो ऐसा है नहीं,लेकिन यदि उनकी बात मानें तो भी 10 में से 1 ही बेईमान होगा I बाकि बचे हुए लोकपाल रखे जाएँगे `खोज और चयन समिति` के द्वारा और इसी लिए वो सभी ईमानदार होंगे I तो केवल एक बेईमान लोकपाल अधिक हानि नहीं पहुंचा सकता I तो 10 में से 1 के ऊपर राइट टू रिकॉल/`भ्रष्ट कों बदलने का आम नागरिकों का अधिकार` का विरोध क्यों है ?

 

सैक्शन-NN : नागरिक का लोकपाल को बदलने/निकालने/ख़ारिज करने/रखने का अधिकार (नागरिक का राईट टू रिकाल/रिजेक्ट/रिटेन लोकपाल सदस्य)

 

धारा / खंड #-(अफसर जिसके लिए निर्देश)

प्रक्रिया/पद्धति

 

धारा 1-

नागरिक शब्द का अर्थ होगा रजिस्ट्रीकृत मतदाता / रजिस्टर्ड वोटर  I यह पद्धति /तरीका लागू होगी लोकपाल के केवल एक सदस्य के ऊपर जिसे `नागरिक द्वारा नियुक्त / रखा गया लोकपाल सदस्य` भी कहा जाता है I शुरुवात में वह रखा (नियुक्त) जएगा लोकपाल चयन समिति द्वारा I  इस धारा में “कर सकता है” का मतलब “ कर सकता है या करने की जरुरत नहीं है “ है और इसका मतलब किसी प्रकार से बाध्य/बंधनकारी नहीं है |

धारा 2 - ( कलेक्टर को निर्देश)

राष्ट्रपति कलेक्टर को यह निर्देश देता है की यदि कोई भरतीय नागरिक जिसकी आयु 40 वर्ष से अधिक हो और वह लोकपाल समिति में `नागरिकों द्वारा नियुक्त/रखा गया लोकपाल सदस्य` बनने की इच्छा रखता है और वह जिला कलेक्टर के कार्यालय में स्वयं/खुद आता है, जिला कलेक्टर उस उम्मीदवार को स्वीकार करेगा लोकपाल का सदस्य के लिए, सांसद चुनाव के जमा राशि जितनी राशि जमा करने के बाद I कलेक्टर उसके नाम और क्रमांक संख्या/सीरियल नंबर लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा | कोई भी चिन्ह नहीं दिया जायेगा |

धारा 3 - (तलाटी या पटवारी या लेखपाल को निर्देश)   

यदि किसी जिले का कोई नागरिक , अपने नजदीक के तलाटी के कार्यालय जाकर 3 रुपये का शुल्क / फीस देकर और किसी भी 5 व्यक्ति को `नागरिक द्वारा रखे गए / नियुक्त लोकपाल सदस्य` के लिए पसंद / अनुमोदन दे सकता है, तलाटी उसके अनुमोदन को कम्पुटर पर रखेगा और उसे एक रसीद देगा जिसमें समय/दिनांक और व्यक्ती की भी पसंद/अनुमोदन लिखी होगी I` गरीबी रेखा से नीचे` (बी पी एल) राशन कार्ड वाले के लिए शुल्क / फीस  रु. 1 होगा I 

धारा 4 - (पटवारी को निर्देश)

पटवारी या तलाटी लोकपाल के वेबसाइट में नागरिको की पसंद/अनुमोदन को रखेगा नागरिको के मतदान-पत्र संख्या के साथ I

धारा 5 - (पटवारी को निर्देश)

चुनाव कमिटी/समिति 10 लोकपाल नियुक्त करेंगे और ऊपर दिए हुए प्रस्ताव को जोड़कर 10 में से किसी 1 लोकपाल को नागरिकों द्वारा बदला जा सकता है I और ऐसी ही एक प्रक्रिया/तरीका है जिसमे नागरिक `ना` रजिस्टर दर्ज करके `राइट टू रिजेक्ट` लोकपाल की तरह भी उसे प्रयोग कर सकते हैं|

धारा 6 - (लोकपाल को निर्देश)

प्रत्येक महीने की 5 वीं तारीख को लोकपाल अध्यक्ष पिछले महीने के आखरी दिन तक के अनुमोदन/पसंद को वेबसाइट पर रखेगा I

धारा 7 - ( लोकपाल चयन समिति को निर्देश)

यदि कोई  उम्मीदवार को 24 करोड से अधिक अनुमोदन/पसंद मिले और वो वर्त्तमान `नागरिकों द्वारा रखा गया/नियुक्त लोकपाल सदस्य` के अनुमोदन से एक करोड़ भी ज्यादा है ,तब लोकपाल चयन समिति वर्तमान `नागरिकों द्वारा रखे गए/नियुक्त लोकपाल सदस्य` को इस्तिफा देने के लिए कह सकता है और सबसे द्वारा अनुमोदन प्राप्त उम्मीदवार को लोकपाल का `नागरिकों द्वारा रखे गए/नियुक्त लोकपाल सदस्य` बनाएगा I लोकपाल चयन समिति 24 करोड की सीमा रेखा को कम या बढ़ा सकता है 12 करोड और 36 करोड के बीच

धारा 8-(`नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को बनाये रखने का अधिकार)

नागरिक यह प्रक्रिया/पद्धति का प्रयोग किसी `नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को बनाये रखने के लिए या वापस लाने के लिए, यदि कोई `नागरिक द्वारा रखे गए लोकपाल सदस्य` को निकाल दिया गया था परन्तु नागरिक उसे पद पर बनाये रखना चाहते हैं I अतः यह खंड `लोकपाल को बनाये रखने का अधिकार`(राईट टू रिटेन) के लिए भी निर्दिष्ट किया जाता है/जाना जायेगा I

धारा 9-( लोकपाल को ख़ारिज करने का अधिकार(राईट टू रिजेक्ट))

यदि कोई नागरिक पटवारी के दफ्तर जाकर और किसी लोकपाल के कमिटी/समिति के सदस्य जो नागरिकों द्वारा रखा गया है ,का नाम लेकर उसके विरोध में `ना` दर्ज करवाना चाहे तो पटवारी उसका नाम दर्ज करेगा, मतदाता संख्या/नंबर और उम्मीदवार की संख्या/नंबर और 3 रुपया का शुल्क/ फीस लेकर उसे रसीद देगा I और यदि 24 करोड नागरिक उस `नागरिकों द्वारा रखा गया लोकपाल सदस्य` के ऊपर `ना` दर्ज करवाते हैं, तो  लोकपाल चयन समिति उसे लोकपाल सदस्य समिति से इस्तीफा देने के लिए विनती कर सकती है  I

धारा 10 - ( कलेक्टर को निर्देश)

यदि कोई नागरिक इस कानून में बदलाव करना चाहे, तो वे अपना एफिडेविट जिला कलेक्टर के दफ्तर पर जमा करेगा और जिला कलेक्टर या उसके क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रुपये प्रति पन्ना का शुल्क/ फीस लेकर लोकपाल के वेबसाइट पर रखेगा |

धारा 11 - ( तलाटी या पटवारी को निर्देश)

यदि कोई नागरिक इस कानून या इसके किसी खंड के विरोध दर्ज करवाना चाहे या किसी ऊपर दिए हुए खंड के द्वारा गए किसी जमा किये हुए एफिडेविट पर अपना हाँ/ना दर्ज करवाना चाहे तो वह तलाटी के दफ्तर जाकर ,अपने मतदान पत्र लेकर, तलाटी को 3 रुपये का शुल्क/ फीस देना पड़ेगा | तलाटी हाँ/ना को लोकपाल के वेबसाइट पर दर्ज करेगा और उसे रसीद देगा |

 

प्रश्न : क्या कोई व्यक्ती मतदाताओं को खरीद सकता है ऊपर दिए हुए प्रक्रिया/तरीके में ?

उत्तर : नहीं | क्यों? I यदि ऐसा मान लें कि कोई धनी/पैसे वाला व्यक्ती 100 रुपया देता है एक करोड नागरिकों को `हाँ` दर्ज करवाने के लिए तो खंड 5 के अनुसार वोटर अपने `हाँ` दर्ज किये हुए को अगले दिन बदल सकता है I अब यदि 1000 धनी व्यक्ती मिलकर अपना सारा पैसा भी खर्च करें, फिर भी वे हर नागरिक को प्रतिदिन 100 रुपया नहीं दे सकते I इसी लिए `हाँ` दर्ज करवाने के लिए किसी को खरीदना, ऊपर दिए हुए राईट टू रिकाल/`भ्रष्ट कों नागरिकों द्वारा बदले जाने का अधिकार`में संभव नहीं है I

 

प्रश्न : क्या करोडो नागरिक एक लोकपल उम्मीदवार कों पसंद करेंगे / अनुमोदन देंगे ?

उत्तर : निर्भर करता है कि लोकपाल कितने बुरे हैं और विकल्प(दूसरे व्यक्ति) कितने अच्छे हैं I कुछ 60% से 75% नागरिक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोट देते हैं बावजूद इसके कि उनके सामने जो विकल्प होते हैं, उनसे कोई नागरिकों को कोई आशा नहीं होती I इससे यह पता चलता है कि नागरिक बदलाव करने के लिए पहल जरूर करते हैं I यदि विकल्प (दूसरा) उम्मीदवार होनहार / आशाजनक हैं, और यदि लोकपाल भ्रष्ट है तो नागरिक बदलाव करने के लिए पहल करेंगे I

 

प्रश्न : राइट टू रिकॉल जैसे कानून को अमरीका जैसे शिक्षित देश में ही सिमित रखना चाहिए न की भारत जैसे अनपढ़ देश में

उत्तर : अमरीका के पास अच्छी शिक्षा है क्योंकि वहाँ के नागरिकों के पास उनके जिला शिक्षा अधिकारी पर राइट टू रिकॉल है !! पर हमारे पास जिला शिक्षा अधिकारी पर राइट टू रिकॉल नहीं है और इसी कारण भ्रष्ट शिक्षा, शिक्षा के ऊपर खर्च होने वाले राशि को गायब कर देता है इसिलए अधिकतर नागरिक अशिक्षित रह जाते हैं I जब अमेरिका में राईट तो रिकाल आया था, वहाँ शिक्षित लोग बहुत कम थे |

 

राईट टू रिकाल और पारदर्शी शिकायत प्रणाली पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए www.righttorecall.info/004.h.pdf देखें |

 

(10.4) लोकपाल में जूरी सिस्टम

 

सैक्शन-NN : लोकपाल में जूरी के द्वारा जांच

 

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(1.1) शब्द `नागरिक` का मतलब `रजिस्ट्रीकृत/पंजीकृत मतदाता` है

(1.2) शब्द `हो सकता है `का मतलब इस सैक्शन में “ हो सकता है या जरूरी नहीं है “ होगा और किसी भी तरह से कोई कानूनी या नैतिक बंधन नहीं है |

2. (लोकपाल को निर्देश )

जब लोकपाल या उसका अफसर लोकपाल अधिनियम / क़ानून के अधीन कोई आरोप को फाइल/दर्ज करता है, तो लोकपाल जूरी द्वारा जांच करवा सकता है ,कोर्ट में मामला दर्ज करने से पहले | लोकपाल का फैसला आखरी होगा |

3.  (लोकपाल को निर्देश )

जूरी द्वारा जांच के लिए , लोकपाल 15 से 80 नागरिकों का चुनाव करेगा क्रम-रहित (बिना लाइन के ) तरीके से , जिले/राज्य या पूरे भारत से और आरोपित को 20% नागरिकों को निकालने देगा, हर नागरिक के साथ एक घंटे के साक्षात्कार के बाद, ताकि आखिर में 12 से 64 लोगों की जूरी होगी | लोकपाल मानक/तरीका तय कर सकता है, जिसके द्वारा जूरी के आकार/साइज़ और किस क्षेत्रों से जूरी चुने जाएँगे , ये फैसला हो सके | जूरी का साइज , अपराध की गंभीरता पर निर्भर करेगा और प्रशासन में मुलजिम के पद के ऊपर भी निर्भर करेगा |

4 . (जांच अधिकारी को निर्देश )

जांच अधिकारी, मुलजिम और फरियादी (दोष लागने वाला) दोनों को एक-एक घंटा बारी-बारी बोलने देगा कम से कम 3 दिनों के लिए | यदि 50% से अधिक जूरी-सदस्य , और सुनवाई के लिए मांग करते हैं, तो सुनवाई तब तक चलेगी जब तक 50 % जूरी-सदस्य सुनवाई का अंत के लिए मांग नहीं करते |

5. (जांच अधिकारी को निर्देश )

लोकपाल उन आरोपों को कोर्ट में दर्ज करेगा , जो कम से कम 75% जूरी-सदस्यों के द्वारा स्वीकृत किया गया हो | यदि 25 % से ज्यादा जूरी-सदस्य आरोपित अफसर को निर्दोष कह देते हैं, कोई लोकपाल कोई भी आरोप कोर्ट में दर्ज नहीं करेगा | लोकपाल का निर्णय अंतिम होगा |

 

(10.5) पारदर्शी शिकायत / सुझाव प्रणाली (सिस्टम) के धाराओं पर अधिक जानकारी

वर्ष 2004 में मैंने अनेक कार्यकर्ताओं को सुझाव दिया कि हमें पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) को भी उस समय के प्रस्तावित `सूचना के अधिकार अधिनियम(क़ानून)(आर.टी.आई)` में जोड़ना चाहिए I अन्य शब्दों में, `सूचना के अधिकार` में एक धारा जोड़ी जाये कि यदि कोई व्यक्ति/आवेदनकर्ता चाहता है कि उसकी शिकायत कोई सार्वजनिक वेबसाइट(जैसे प्रधान-मंत्री/लोकपाल की वेबसाइट) पर आये और जागरूक नागरिक अपना नाम तलाटी/पटवारी/लेखपाल के दफ्तर जाकर जोड़े I मुझे यह उत्तर मिला की अभी के लिए `सूचना के अधिकार अधिनियम(आर.टी.आई)` बिना पारदर्शी शिकायत प्रणाली(सिस्टम) के रखेंगे और इसे हम बाद में जोड़ देंगे I 6 वर्ष बीत चुके है लेकिन वो `बाद` हमें अभी तक देखने को नहीं मिला I तो इस समय मैं सभी नागरिकों से विनती करता हूँ कि पक्का करें कि यह धारा , अभी जोड़ दिया जाए ना की बाद में | मैं पुनः विनती करता हूँ की आप सभी मेरे धारा का समर्थन न करे लेकिन एक निश्चित समय के पहले कोई बेहतर खंड अवश्य लायें I मै विरोध करता हूँ ये तर्क का कि ऐसी धारा अगले जन्म में आये |

लोकपाल बिल कहता है नागरिक अपने सुझावों को `खोज और चयन समितियों` में भेज सकते हैं I लेकिन इसके लिए कोई भी प्रक्रिया/तरिका नहीं दी गयी है I मान लीजिए 1 लाख या 50 लाख या 20 करोड नागरिक अपने सुझाव भेजना चाहते हैं I सुझाव ई-मेल के द्वारा भेजना सही नहीं होगा क्योंकी अनेक व्यक्ती हजारों जाली ई-मेल भेज सकते है I चिट्ठियाँ भेजना भी सही (विकल्प) नहीं होगा क्यूंकि `खोज और चयन समितियों` के पास इतना समय नहीं है की वह 1 लाख चिट्ठियों को खोले और पढ़े | और चिट्ठियों को नष्ट भी किया जा सकता है, `खोज और चयन समितियों` में पहुँचने के पहले | यदि `खोज और चयन समितियां` भ्रष्ट हों ,तो  वे यह कह सकते हैं कि उन्हें किसी भी तरह के सुझाव नहीं मिली हैं | तो ये हमारा प्रस्ताव है कि नागरिक एक एफिडेविट (अपनी सुझाव के साथ) जमा कर सकता है कलेक्टर के दफ्तर में और कलेक्टर उसे स्कैन करके लोकपाल की वेबसाइट पर रखेगा | यह सबसे अच्छा रास्ता है जो मैं सोच सकता हूँ , हालाँकि यदि कोई इससे अच्छी प्रक्रिया/तरीका जनता है तो मैं उससे विनती करता हूँ की वह एक निश्चित समय से पहले सबके सामने रखे, न कि अगले जन्म की इन्तेजार करे I

इस प्रस्ताव की दूसरी धारा यह है की नागरिक को यह अनुमति / परमिशन दी जाए कि कलेक्टर के दफ्तर में जमा कोई भी शिकायत पर अपने हाँ/ना को दर्ज कर सके ,तलाटी के दफ्तर जाकर | यह तब उपयोगी है जब  हजारों, लाखों या करोड़ों नागरिकों की एक ही शिकायत है I वह सभी को एक सी शिकायत भेजने की जरुरत नहीं पड़ेगी I धारा-2 के हटने से केवल सिस्टम और देश को नुकसान हो जाएगा I

 

(10.6) राइट टू रिकॉल लोकपाल, राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, राइट टू रिकॉल न्यायधीश इत्यादि पर अधिक जानकारी

      राइट टू रिकॉल/प्रजा अधीन राजा/`भ्रष्ट को निकालने का अधिकार` कोई विदेशी विचार नहीं है I सत्यार्थ प्रकाश कहता है की राजा को प्रजा के अधीन होना ही चाहिए अन्यथा वह नागरिकों को लूट लेगा और और इस तरह देश का नाश हो जाएगा | दयानंद सरस्वती जी ने यह श्लोक अथर्ववेद से लिए हैं | तो राइट टू रिकॉल/प्रजा अधीन राजा कोई अमरीकी या विदेशी विचार नहीं है ,यह सम्पूर्ण भारतीय है I

अमरीका में नागरिकों के पास पोलिस कमिश्नर को निकलने का अधिकार है और यही एक मात्र कारण है की अमरीका के पोलिस में भ्रष्टाचार कम है इसी तरह अमरीका के नागरिकों के पास सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज और निचली अदालतों के जज को भी निकलने का अधिकार है | यही कारण है की कार्यवाही बहुत तेज होती है और अमेरिका के निचली अदालतों में भ्रष्टाचार बहुत कम है I अमरीका के नागरिकों के पास राज्यपाल, विधायक, जिला शिक्षा अधिकारी , मेयेर/महापौर, जिला/राज्य सरकारी दंडाधिकारी इत्यादि पर राइट टू रिकॉल है I यह ध्यान दें कि अमरीका में कोई भी लोकपाल (ओम्बुड्समेन/ प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी) नहीं है इसके बावजूद अमरीका के राज्य/जिलों में अधिकतर विभागों में भ्रष्टाचार कम है क्योकि अधिकतर राज्य/जिलो में राइट टू रिकॉल/`भ्रष्ट कों बदलने का अधिकार` है I वही अमरीका में केंद्र के मंत्रियों(सीनेटरों) और केन्द्र के अधिकारियो में भ्रष्टाचार अधिक मात्रा में है क्योंकि केंद्र के मंत्रियों और केन्द्र के अधिकारियो पर राइट टू रिकॉल नहीं है I

वर्ष 2004 में मैंने सुझाव दिया था कि हमें `राइट टू रिकॉल-सूचना अधिकार कमिश्नर(भ्रष्ट सूचना अधिकार कमिश्नर कों बदलने का नागरिकों का अधिकार)` के धाराएं `सूचना अधिकार अधिनियम(आर.टी.आई)` में लाया जाए अन्यथा ज्यादातर सूचना अधिकार कमिश्नर भ्रष्ट और बेकार/अयोग्य हो जाएँगे और सूचना अधिकार अधिनियम-क़ानून (आर.टी.आई) के आवेदकों (उपयोग करने वाले) कों यहाँ-वहाँ भटकते ही रहना पड़ेगा जानकारी प्राप्त करने के लिए I लेकिन पुनः मुझे यह उत्तर मिला की हमें एकता पर ही अधिक ध्यान देना चाहिए , हम सूचना अधिकार अधिनियम (आर.टी.आई) को बिना राइट टू रिकॉल के समर्थन करते हैं और अभी हम सूचना अधिकार कमिश्नर पर राइट टू रिकॉल का विरोध करते हैं हम सूचना-अधिकार कमिश्नर पर राइट टू रिकॉल बाद में लायेंगे I यह बाद क्या है ? अगले जन्म में ? मेरे विचार से इस बार हमें यह मांग करनी होगी कि लोकपाल में राइट टू रिकॉल की धारा का ड्राफ्ट अभी जुड जाना चाहिए I मै यह नहीं निवेदन/प्रार्थना करता हूँ कि मेरे राईट टू रिकाल-लोकपाल का ही समर्थन करें, मै यह विनती करता हूँ की आप इससे भी अच्छा प्रस्ताव प्रस्तुत करने की कोशिश करें I

कुछ व्यक्तियों ने जोर दिया है की वे राइट टू रिकॉल का समर्थन करते हैं पर वे लोकपाल में राइट टू रिकॉल लाने की चर्चा का भी विरोध करते हैं इस जन्म में I वे यह बात पर जोर डालते हैं कि राइट टू रिकॉल ,सरपंच से शुरू होकर ऊपर की ओर जाना चाहिए | मुझे आश्चर्य है कि क्यों वे राइट टू रिकॉल लोकपाल पर नहीं लाना चाहते हैं वे कहते है कि यह पहले गांव और फिर तहसील और फिर जिला और फिर राज्य ,तब राष्ट्र स्तर पर लागू होना चाहिए I लेकिन,फिर ये ही लोग क्यों सर्वप्रथम केंद्र के लोकपाल पर मांग करते हैं ?

उनका कहना कि राइट टू रिकॉल, सरपंच के स्तर पर ही होना चाहिए ना की केन्द्र/राज्य स्तर पर, यह तो ऐसा कहना हुआ की “एक रुपये का सिक्का लो और 100 रुपये , 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट को भूल जाओ ” और यह भी कहना है कि राइट टू रिकॉल आज से ही सरपंच पर ही होना चाहिए और राइट टू रिकॉल लोकपाल, राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, राइट टू रिकॉल न्यायधीश पर बाद में लागू होना चाहिए | बाद में का अर्थ अगले जन्म भी हो सकता है |

राइट टू रिकॉल के ना होने से एक व्यक्ती जो पद में है , भ्रष्ट होकर सारी सीमाएं पार कर जाता है I उदाहरण के लिए , हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश (सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज) खरे ने एक स्विट्ज़रलैंड के अरबपति व्यक्ती को ,जिसने तीन 8 वर्षीय बच्चियो का बलात्कार किया था और इसे वीडियो टेप किया था ,ऐसे निर्दयी व्यक्ती को जमानत दे दी थी I माननीय जज खरे ने वीडियो टेप होने के बावजूद उस अरबपति को जमानत दे दी जब कि निचली अदालत ने उसे अपराधी घोषित किया था I इस तरह के  दुर्भाग्यपूर्ण फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के प्रधान जज के ऊपर राइट टू रिकॉल न होने के कारण का फल है I इसी तरह यदि नागरिकों के पास लोकपाल को निकलने/बदलने का अधिकार ना हो तो वह भी माननीय सुप्रीम-कोर्ट के प्रधान जज की तरह भ्रष्ट / भाई-भतीजावाद वाला हो जाएगा I

बदलने के अधिकार के बिना लोकपालों का बनना हम नागरिकों पर भारी पड़ सकता है | कैसे ? विदेशी कंपानियों और बड़े पूंजीपतियों को आसन रास्ता मिल जायेगा भारत पर राज करने का | वो कैसे ? उन्हें केवल 11 लोकपालों को रिश्वत देनी पड़ेगी, और वे सभी मंत्रियों, आई.ए.एस अधिकारियों, जजों पर शाशन कर पाएंगे | अभी विदेशी कंपानियों और बड़े पूंजीपतियों को पूरे भारत में लगभग 14,000 आई.ए.एस (बाबू) , पुलिसकर्मी , जज, विधायक, सांसद, मंत्रियों को रिश्वत देनी पड़ती है | अगर हम बिना `नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को बदलने के अधिकार` (राईट टू रिकाल–लोकपाल/प्रजा अधीन-लोकपाल)` के लोकपालों को बना देते हैं, तो ये भारत को चांदी की थाली में रख के विदेशी कंपानियों और बड़े पूंजीपतियों को दे देने के बराबर होगा ! जबकि अगर लोकपाल को बदलने के अधिकार देने वाले धाराओं के साथ यह पद बनता है तो सही में भ्रष्टाचार के खिलाफ सफल कानून सिद्ध होगा |

बहुत से कार्यकर्ता-नेता आप को बोलेंगे कि “ अभी जहर लो, दवा अगले जन्म में ले लो “ यानी वे कहते हैं कि लोकपाल बिल अभी पास होना चाहिय बिना कोई `राईट टू रिकाल-लोकपाल` के धाराओं के आज और अगले जन्म में वे वायदा करते हैं कि `राईट टू रिकाल-लोकपाल`(भ्रष्ट लोकपाल को नागरिकों द्वारा निकालने का अधिकार) के लिए लड़ाई लड़ेंगे | मैं आप से विनती करता हूँ कि अगले जन्म तक इन्तेजार न करें | 

 

(11) प्रजा अधीन-सांसद क़ानून-ड्राफ्ट (भ्रष्ट सांसद को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार )

 

1. (1.1) शब्द `नागरिक` का मतलब रजिस्ट्रीकृत मतदाता है |

 

(1.2) शब्द “कर सकता है “ का मतलब कोई भी नैतिक-कानूनी बंधन नहीं है | इस का मतलब “ कर सकता है “ या “करने की आवश्यकता / जरूरत नहीं है “ है |

 

2. (जिला कलेक्टर को निर्देश/आर्डर ) प्रधानमंत्री जिला कलेक्टर को निर्देश देते हैं, कि यदि भारत का नागरिक जिला कलेक्टर के दफ्तर आता है और उम्मीदवार बनना चाहता है आने वाले सांसद के चुनाव में, तब जिला कलेक्टर , सांसद-चुनाव के जमा-राशि जितना शुल्क/फीस लेगा और उस व्यक्ति को `उम्मीदवार-आने वाले चुनाव में ` घोषित करेगा , सांसद के चुनाव के लिए | जिला कलेक्टर एक सीरियल नंबर/क्रम संख्या देगा और उसका नाम प्रधान मंत्री के वेबसाइट पर डालेगा |

 

3. ( तलाटी ,पटवारी या (उसके क्लर्क) को निर्देश )

 

(3.1) प्रधानमंत्री पटवारी (या तलाटी या गाँव का अधिकारी ) को निर्देश देगा कि नागरिक यदि खुद पटवारी के दफ्तर आता है, रु. 3 शुल्क/फीस देता है, और कम से कम पांच व्यक्तियों को अनुमोदन/स्वीकृति देता है सांसद के पद के लिए, तो पटवारी उसके स्वीकृति/पसंद/अनुमोदन कंप्यूटर में डालेगा और उसको एक रसीद देगा, जिसमें लिखा होगा ,उसकी वोटर आई.डी संख्या, तारीख/समय और जिन व्यक्तियों को उसने पसंद किया है  |

(3.2) यदि पटवारी के पास कंप्यूटर आदि नहीं है, तब जिला कलेक्टर इस कार्य को तहसीलदार के दफ्तर को देगा , जब तक कि पटवारी को कंप्यूटर, आदि नहीं मिलता इस कार्य को करने के लिए |

(3.3)  जिला कलेक्टर एक ऐसा सिस्टम बना सकता है जो एस.एम.एस जानकारी देगा नागरिक को `क्रेडिट कार्ड लेन-देन` के समान होगा |

(3.4) जिला कलेक्टर उपकरण/मशीन पटवारी को देगा , जो फोटो और अंगुली की छाप लेगा और रसीद देगा नागरिक के अंगुली की छाप और फोटो के साथ |

(3.5) प्रधानमंत्री का सचिव जरूरी सॉफ्टवेर (कंप्यूटर का अंदरूनी सामान) देगा पटवारी और जिला कलेक्टर, पटवारी को जरूरी मशीन देगा |

 

4. (तलाटी/पटवारी को निर्देश) पटवारी नागरिकों के अनुमोदन/पसंद प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर रखेगा , नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर और उन व्यक्तियों के नाम , जिनको उसने अनुमोदन/पसंद किया है |

 

5. (तलाटी/पटवारी को निर्देश ) यदि वोटर अपने अनुमोदन/पसंद रद्द करने आता है, तो तलाटी एक या अधिक अनुमोदन / पसंद को बिना कोई शुल्क/फीस लिए रद्द कर देगा |

 

6. (संसद को निर्देश) यदि कोई दूसरा/वैकल्पिक उम्मीदवार को अनुमोदन/स्वीकृति मिल जाती हैं जो

 

(6.1) वर्त्तमान सांसद के वोटों की गिनती से (सभी मतदाताओं के )10% अनुमोदन/स्वीकृति से अधिक है

                            या 

(6.2) उस चुनाव-क्षेत्र के सभी मतदाताओं के 50% से ज्यादा अनुमोदन/स्वीकृति हों , और साथ ही में ,वर्त्तमान सांसद के प्राप्त वोटों से 1% अनुमोदन/स्वीकृति ज्यादा हों तो,वर्त्तमान सांसद अपना इस्तीफा 7 दिन में दे सकता है या उसे ऐसा करने की जरूरत नहीं है |

 

7. ( लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश ) यदि वर्त्तमान सांसद 7 दिनों में इस्तीफा नहीं देता है, तो लोकसभा अध्यक्ष प्रस्ताव बुला सकता है संसद में , उस सांसद को निकालने के लिए या ऐसा करना उसके लिए नहीं जरूरी है | लोकसभा अध्यक्ष का फैसला आखरी/अंतिम होगा |

 

8.( सांसद को निर्देश ) दूसरे सांसद , उस सांसद को निकालने के लिए प्रस्ताव स्वीकृत कर सकते हैं या उन्हें ऐसा करने के लिए कोई जरूरत नहीं है |

 

9. (चुनाव आयोग(देश में चुनाव कराने वाली सरकारी संस्था ) को निर्देश ) यदि सांसद इस्तीफा देता है या निकाला जाता है, तो चुनाव आयोग नया चुनाव करवायेगी , कायदे के अनुसार | अगले चुनाव में , जो सांसद निकाला गया है, वो चुनाव लड़ सकता है |

 

10.  धारा-6 के प्रयोजन के लिए , मतदाताओं के अनुमोदन/स्वीकृति जिन्होनें चुनाव के अपना नाम दर्ज/रेजिस्टर किया है , वे नहीं गिने जाएँगे | हर चुनाव-क्षेत्र की मतदातों की सही संख्या चुनाव आयोग द्वारा दी/प्रकाशित की जायेगी और चुनाव-आयोग का फैसला आखरी होगा |

 

11. प्रधानमंत्री इस सरकारी आदेश के धारा-6 में दिए गए सीमाएं बदल सकता है | वो सीमा पूरे देश के लिए एक होगी |

12. चुनाव के समय, उम्मीदवार एक हलफनामा/एफिडेविट/शपथपत्र दे सकता है चुनाव-आयोग को बताते हुए कि वो `प्रजा अधीन-सांसद`/`राईट टू रिकाल-सांसद` सरकारी आदेश का समर्थन करता है कि नहीं |

 

13. ( जनता की आवाज़-1(सी वी – 1) ) (जिला कलेक्टर)

यदि कोई गरीब, दलित, महिला, वरिष्‍ठ नागरिक या कोई भी नागरिक इस कानून में बदलाव/परिवर्तन चाहता हो तो वह जिला कलेक्‍टर के कार्यालय में जाकर एक ऐफिडेविट/शपथपत्र प्रस्‍तुत कर सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्‍लर्क इस ऐफिडेविट/हलफनामा को 20 रूपए प्रति पृष्‍ठ/पन्ने का शुल्‍क/फीस लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।

 

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