यदि यह लेख आपको नागरिकों के हित में लगे, तो इसकी फोटोकॉपी वितरित करने की विनती है

सिर्फ ३ लाइन का कानून, कुछ ही महीनो में गरीबी और भ्रष्टाचार कम कर सकता है

 

लेखक : Rahul Mehta ; फेसबुक ग्रुप : www.facebook.com/groups/rrgindia ; चर्चा फोरम : www.forum.righttorecall.info

वेबसाइट www.righttorecall.info ; ई-मेल : info@righttorecall.info ; प्रश्नोत्तरी : www.righttorecall.info/004.h.pdf

टी.सी.पी. पर विडियो - http://youtu.be/OZKwL6wI9uc ; राईट टू रिकॉल पर राजीव दीक्षित जी : youtu.be/W2sj7M9bkNg टी.सी.पी. और राईट टू रिकॉल के प्रश्नोत्तरी पर विडियो - https://www.youtube.com/user/TCPHindiFAQs

1. Transparent Complaint Procedure (TCP.; टी.सी.पी.) - `पारदर्शिकायत / प्रस्ताव सिस्टम` के प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट

मैंने सिर्फ 3 लाईन के एक कानून की मांग की है । इस कानून को मैं `टी.सी.पी.`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव सिस्टम कहता हूँ । इस कानून को पारित करने के लिए मात्र पधानमंत्री या मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर चाहिए । यह प्रस्तावित टी.सी.पी. पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव सिस्टम कानून मात्र 3-4 महीनो में गरीबी कम कर सकता है, पढाई व्यस्था अच्छी बना सकता है, पुलिस आदि में भ्रष्टाचार ना के बराबर कर सकता है और सेना मजबूत कर सकता है |

मांग किये गये इस टी.सी.पी - पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव सिस्टम सरकारी आदेश का सार है :-

1.      यदि नागरिक चाहे तो अपनी फरियाद 20 रूपये प्रति पेज देकर कलेक्टर की कचहरी जाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर अपने वोटर आई.डी. नंबर के साथ स्कैन करवा सकेगा ।

2.      नागरिक 3 रुपये शुल्क देकर फरियाद पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर वोटर आई.डी के साथ दर्ज करवा सकेगा ।

3.      हाँ/ना पधानमंत्री पर अनिवार्य नहीं है ।

सम्पूर्ण ड्राफ्ट

#

अधिकारी

प्रक्रिया

 

 

1.

 

कलेक्टर

(और उसके क्लर्क)

कोई भी नागरिक मतदाता, यदि खुद हाजिर होकर, एफिडेविट पर अपनी सूचना अधिकार का आवेदन अर्जी / भ्रष्टाचार के खिलाफ फरियाद / कोई प्रस्ताव या कोई अन्य एफिडेविट कलेक्टर को देता है और प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर रखने की मांग करता है, तो कलेक्टर (या उसका क्लर्क) उस एफिडेविट को प्रति पेज 20 रूपये का लेकर, सीरियल नंबर देकर, एफिडेविट को स्कैन करके पधानमंत्री वेबसाइट पर उसके वोटर आई.डी. नंबर के साथ रखेगा ताकि बिना लॉग-इन कोई भी उस एफिडेविट को देख सके

 

 

2.

 

पटवारी

(तलाटी, लेखपाल)

(2.1) कोई भी नागरिक मतदाता यदि धारा-1 द्वारा दी गई अर्जी या एफिडेविट पर आपनी हाँ या ना दर्ज कराने मतदाता कार्ड लेकर आये, 3 रुपये का शुल्क (फीस) लेकर, तो पटवारी नागरिक का मतदाता कार्ड संख्या, नाम, उसकी हाँ या ना को कंप्यूटर में दर्ज करके रसीद दे देगा । नागरिक की हाँ या ना प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर उसके वोटर आई.डी. नंबर के साथ आएगी । गरीबी रेखा के नीचे के नागरिकों के लिए शुल्क 1 रूपये होगा । (2.2) नागरिक पटवारी के दफ्तर जाकर किसी भी दिन अपनी हाँ या ना, बिना किसी शुल्क के रद्द कर सकता है और तीन रुपये देकर बदल सकता है । (2.3) कलेक्टर एक ऐसा सिस्टम भी बना सकता है, जिससे मतदाता का फोटो, अंगुली के छाप रसीद पर डाला जा सके | (2.4) प्रधानमंत्री एक ऐसा सिस्टम बना सकता है, जिससे मतदाता अपनी हाँ या ना, 5 पैसे देकर एस.एम.एस. द्वारा दर्ज कर सके

 

 

3.

 

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ये कोई रेफेरेनडम/जनमत-संग्रह नहीं है | यह हाँ या ना अधिकारी, मंत्री, न्यायधीश, सांसद, विधायक, अदि पर अनिवार्य नहीं होगी । लेकिन यदि भारत के 37 करोड़ नागरिक मतदाता, कोई एक अर्जी, फरियाद पर हाँ दर्ज करें, तो पधानमंत्री उस फरियाद, अर्जी पर ध्यान दे भी सकते हैं या ऐसा करना उनके लिए जरूरी नहीं है, या इस्तीफा दे सकते हैं । उनका निर्णय अंतिम होगा

2. टी.सी.पी. या पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव सिस्टम का क्या मतलब है और ये कैसे काम करेगा ?

 

ये पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव सिस्टम ये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत / प्रस्ताव हमेशा देखी जा सकती है और जाँची की जा सकती है कभी भी, कहीं भी, किसी के भी द्वारा ताकि शिकायत को कोई नेता, कोई बाबू (लोकपाल आदि), कोई जज या मीडिया न दबा सके | अब मान लीजिए कि प्रधान मंत्री ने इसपर हस्ताक्षर कर दिए हैं, और पहले वाले उदहारण के अनुसार यदि आप के यहाँ का मंत्री भ्रष्ट है, तो आप या कोई भी, किसी भी कलेक्टर के दफ्तर जा कर मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं और उसे हटाने के लिए भी लिख सकते हैं | इस शिकायत को कलेक्टर या उसका क्लेर्क स्कैन कर लेगा और प्रधान मंत्री के वेब-साईट पर डाल देगा | अब क्योंकि इस शिकायत का एक-एक शब्द दुनिया के लाखों-करोड़ों लोग देख सकते हैं, कभी भी, इसीलिए इस शिकायत को जरा भी छेड़-छाड़ नहीं किया जा सकता है बिना लाखों लोगों को पता लगे | और इसके समर्थन में व्यक्ति को कलेक्टर के दफ्तर नहीं जाना है, केवल अपने पास के पटवारी या तलाटी, जो भूमि का रिकॉर्ड रखता है और कलेक्टर के द्वारा ही रखा गया होता है, के पास जाना है और अपना वोटर आई.डी. के जानकारी आर अंगुली की छाप देगा और वो भी वेब-साईट पर आ जायेगी | इस तरह कोई भी ये नहीं कह सकता कि समर्थक जाली हैं | उल्टा जो भी व्यक्ति या मीडिया इस मुद्दे को नहीं उठाएगा, उसका भरोसा कम हो जाएगा |

इसिलिए मीडिया वाले भी उठाएंगे और देश भर में लोग जान जाएँगे कि इस मंत्री के खिलाफ लाखों लोगों की शिकायत है और संभव है कि और लोग भी इसका फिर पटवारी के दफ्तर जा कर इस शिकायत के साथ नाम जोड़ेंगे | और ये लाखों लोग शिकायत करने के बाद ऐसे ही नहीं बैठे रहेंगे, वो अपने स्थान के विधायक, सांसद, आदि लोगों पर दबाव डालेंगे कि देखो, लाखों लोग बोल रहे हैं कि इस भ्रष्ट मंत्री को निकालो, तो फिर ये दबाव उन सांसदों और उन सांसदों द्वारा प्रधान-मंत्री पर भी आएगा | सांसद प्रधान-मंत्री को बोलेंगे कि हमारी लोकप्रियता दिनों दिन कम होती जा रही है | ऐसा ना हो कि हम अगले चुनाव तक बिलकुल ही जीरो हो जाएँ या उससे पहले भी लोगों का गुस्सा हमें झेलना पड़े, इसीलिए आप ये मंत्री पर कार्यवाई करें | इस प्रकार जनता के दबाव से ये प्रक्रिया काम करेगी और लाखोंकरोड़ों लोगों की शिकायत या प्रस्ताव को सरकार को सुनना होगा |

 

3. क्या, सिर्फ इतना ही ?

हाँ, सिर्फ इतना ही । अब सवाल आता है कि क्या मात्र एफिडेविट और हाँ/ना प्रधानमत्री के वेबसाईट पर आने करने से गरीबी, पुलिस का भ्रष्टाचार, अदालतों का भाईभतिजावाद आदि समस्याओं का हल आ जायेगा ? इस चार पेज के लेख में मैंने समझाने का प्रयास किया है । वाचक के मन में अनेक प्रश्न आ सकते है, जिनमें से अनेक का जवाब अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न righttorecall.info/004.h.pdf पर दिया है | और वाचक को जवाबमिले, तो फोन पर या मुलाकात करके या www.forum.righttorecall.info पर सवाल रखने की विनती है |

 

4. क्या प्रत्येक नागरिक के पास इन्टरनेट होना आवयश्क है ?

 

यह सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला गलत सवाल है । मैं इसे गलत सवाल इसलिए कहता हूँ क्योकि टी.सी.पी. में मतदाता के पास इन्टरनेट होना आवश्यक नहीं है । उनके पास इन्टरनेट हो या न हो, उन्हें कलेक्टर या पटवारी की कचहरी में जाना अनिवार्य होगा । यानि इस कानून के लिए इन्टरनेट की आवश्यकता नहीं है ।

 

5. टी.सी.पी. - पारर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) से गरीबी कैसे कम होगी ?

 

जिस दिन प्रधानमंत्री टी.सी.पी. पर हस्ताक्षर करेंगे, उसी दिन मैं करीब 200 एफिडेविट वेबसाईट पर दर्ज करूँगा । उनमें से प्रथम एफिडेविट होगी `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` (एम.आर.सी.एम) इस सात पेज की एफिडेविट का सम्पूर्ण ड्राफ्ट टी.सी.पी. 301 righttorecall.info/301.h.pdf के अध्याय 5 पर दिया है । यह एफिडेविट एक व्यवस्था का वर्णन है जिसके द्वारा खनिज रोयल्टी और सरकारी जमीन का किराया सीधा नागरिकों को मिलेगा । यदि मान लो की अक्टुबर-2011 में खनिज रोयल्टी और सरकारी की जमीन का किराया रु 30,000 करोड़ आया । तो रु 20,000 करोड़ सेना के लिय जायेगा और हर एक नागरिक के पोस्ट या स्टेट बैंक के खाते में रु 300 जमा हो जायेगा । यदि हर नागरिक महीने में एक बार नगद लेने जाता है तो मात्र 1 लाख क्लर्क चाहिए । आज सरकारी बैंको के पास 6 लाख क्लर्क है । इसका मतलब है कि `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी (आमदनी)` व्यवस्था में कोई बहुत बड़ी परेशानी नहीं होगी

अब मैं वाचक से एक प्रश्न पूछता हूँ :-

1.         भारत के नागरिक प्रधानमंत्री के पास पर टी.सी.पी. हस्ताक्षर कराने में सफल हुए ।

2.         किसी ने `सेना और नागरिकों के लिए रोयल्टी (आमदनी) (एम.आर.सी.एम) की एफिडेविट प्रधानमंत्री को वेबसाईट पर रखा है

3.         अब इस एफिडेविट के बारे में भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता को जानकारी कैसे मिलेगी यह मैं बाद में कहूँगा ।

4.         अब आप भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता से आर्थिक स्थिति से नीचे के ५५ करोड़ मतदाता ध्यान में रखना ।

 

वाचक को प्रथम सवाल : भारत के कुल 72 करोड़ मतदाता में से आर्थिक में से गरीबी की रेखा से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने लोग यह कहेंगे कि खनिज रोयल्टी (आमदनी) और सरकारी जमीन के किराये से महीने के 300-400 रुपये प्रति व्यक्ति आ सकता है, वह मुझे नहीं चाहिये, यह सरकार की तिजोरी में ही रहने दो ? ऐसा आर्थिक स्थिति से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने यह कहेंगे ?

मेरा जवाब है कि 5 प्रतिशत से कम लोग ही ऐसा कहेंगे । यानि टी.सी.पी. पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर आने के बाद `एम.आर.सी.एम` की एफिडेविट के बारे में जानने पर सोचेंगे कि इसमें मेरा 3 रुपये के शुल्क में ज्यादा क्या नुक्सान है ? अब में आप वाचक से दूसरा सवाल पूछता हूँ : टी.सी.पी. की दूसरी धारा साफ़ कहती है कि हाँ/ना प्रधानमंत्री पर बंधन करने वाला नहीं है । लेकिन यदि 72 करोड़ नागरिक मतदाता में से यदि 50-55 करोड़ मतदाता `एम.आर.सी.एम` एफिडेविट पर हाँ दर्ज करते है तो क्या प्रधानमंत्री की हिम्मत होगी कि वह `एम.आर.सी.एम` एफिडेविट पर हस्ताक्षर करने से मना करे ? यदि प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करने से मना करते हैं तो ये 50-55 करोड़ नागरिक, जिन्हें खनिज रोयाल्टी और सरकार जमीन का किराया चाहिए वे हाथ पर हाथ रखकर बेठे नहीं रहेंगे । इन में से 1 प्रतिशत ने भी आन्दोलन आदि किया तो प्रधानमंत्री के लिए सरकार चलाना असम्भव हो जायेगा । इसलिए प्रधानमंत्री विवश होकर `एम.आर.सी.एम` पर हस्ताक्षर कर देंगे । और 1-2 महीनो में ही नागरिकों को खनिज रोयाल्टी मिलनी शुरू हो जायेगी और गरीबी कम हो जायेगी । इस तरह तीन लाइन का टी.सी.पी. कानून 3-4 महीने में ही गरीबी कम कर देगा

6. टी.सी.पी. से पुलिस, आदि में भ्रष्टाचार कैसे कम होगा ?

वाचक को तीसरा सवाल : अमेरिका की पुलिस में भारत की तुलना में भ्रष्टाचार कम क्यों है ?

इसका एक मात्र उत्तर है - अमेरिका में नागरिक के पास बहुमत के द्वारा उनके जिला पुलिस के कमिश्नर को नौकरी से निकालने की (राईट टू रिकॉल) प्रक्रिया है । यह नागरिकों द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया (राइट टू रिकॉल) एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर रिश्वत कम लेता है और यदि उसे पता चले कि स्टाफ में कोंस्टेबल या इंस्पेक्टर रिश्वत ले रहा है तो जाल बिछाकर, सबूत इकठ्ठा कर उन्हें अदालत में ले जाकर नौकरी से निकलवा देता है । और यहाँ भारत में हम नागरिकों के पास जिला पुलिस कमिश्नर को नौकरी से निकलने का तरीका नहीं है और यही कारण है कि कमिश्नर नीचे के अघिकारियों को हफ्ता लेने को कहता है, वह आधा हफ्ता रख लेता है और आधा मंत्री को भेजता है । हम अकसर कहते हैं कि इसका यह कारण है कि अमेरिका में पुलिस की तनख्वाह ज्यादा है यदि यही एकमात्र कारण होता तो पोलिस कमिश्नर लाखो-करोड़ कमा कर रिश्वत लेना बंद कर देते, और क्या तनख्वाह ज्यादा करने के बाद भ्रष्टाचार कम हो जायेगा ? पुलिस कर्मियों का वेतन बढ़ाना आवश्यक है, परन्तु मात्र वेतन बढ़ाने से भ्रष्टाचार नहीं घटेगा ।

अब मैं वाचक को चौथा सवाल पूछता हूँ क्या पाठ्यपुस्तिका या अखबार के लेख लिखने वाले बुद्धिजीवी ने यह जानकारी आपको दी थी कि अमेरिका में नागरिकों के पास जिला पुलिस कमिश्नर, जिला न्यायाधीश, गवर्नर, जिला शिक्षण अधिकारी, विधायक को नौकरी से निकालने कि प्रक्रिया है या नहीं ? क्योंकि ये बूद्धिजिवी नहीं चाहते कि भारत के नागरिकों को यह जानकारी मिले कि अमेरिका में राइट टू रिकॉल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) है, और राइट टू रिकॉल से अमेरिका ने भ्रष्टाचार और उनकी समस्याओं का हल किया है । बुद्धिजीवी यह जानकारी इसलिए छिपाते हैं क्योंकि भारत के अधिकतर धनी लोग राइट टू रिकॉल के कानून नहीं चाहते 

अमेरिका में कुछ 2000 जिले हैं । करीब-करीब हर जिले में नागरिकों के पास कमिश्नर को निकालने की बहुमत आधारित प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया में नागरिकों को अदालत-कहचरी के धक्के खाने की जरूरत नहीं, न ही मुख्यमंत्री के आगे अर्जी करनी होती है या हाथ फैलाने पड़ते हैं । जिले के नागरिकों को बहुमत साबित करना होता है, और यदि जिला पुलिस कमिश्नर के खिलाफ बहुमत साबित हो जाये, तो फिर कोई अदालत या मुख्यमंत्री कोई भी उसे बचा नहीं सकता और उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है एवं यह राइट टू रिकॉल एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर भ्रष्टाचार कम करता है, और इस राइट टू रिकॉल की कमी एकमात्र वजह है कि भारत में अधिकतर जिला पुलिस कमिश्नर भ्रष्ट और मुख्यमंत्री के कलेक्शन एजेन्ट बन गये हैं ।

अब पुलिस के भ्रष्टाचार के समस्या का उपाय अति सरल है भारत में तमाम 700 जिलों में नागरिक पुलिस कमिश्नर को बदल सके ऐसी प्रक्रिया बनाना । अनेक संभव तरीकों में से एक तरीका प्रजा अधीन-जिला पोलिस कमिश्नर अथार्त जिला पुलिस कमिश्नर को बदलने की प्रक्रिया मैंने चैप्टर 22, www.righttorecall.info/301.pdf पर रखी है । इस ड्राफ्ट पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर आने मात्र पर नागरिकों को दूसरे दिन जिले के पुलिस कमिश्नर को बहुमत द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया मिल जायगी और यह प्रक्रिया आने के मात्र 1 महीने में पुलिस का भ्रष्टाचार ना के बराबर हो जायेगा । अब मैं वाचक को पाचँवा सवाल पूछता हूँ : क्या भारत के मुख्यमंत्री जिला पुलिस कमिश्नर बदलने की प्रक्रिया (राइट टू रिकॉल-जिला पुलिस कमिश्नर) पर खुशी से बिना नागरिकों के आन्दोलन या दबाव से हस्ताक्षर करेंगे ?

मेरा मानना है नहीं । बिना लोक दबाव या जन-आन्दोलन के भारत का शायद ही कोई मुख्यमंत्री राइट टू रिकॉल जिला पुलिस कमिश्नर की प्रक्रिया पर हस्ताक्षर करेगा  । क्योंकि यदि बहुमत नागरिकों के पास कमिश्नर को निकालने की प्रक्रिया जाए तो, जो कमिश्नर महीने का 1 करोड़ रुपये इकठ्ठा करता है, वह 1 लाख रूपये पर आ जायेगा । और 1 करोड़ रूपये में से मुख्यमंत्री, ग्रहमंत्री या विधायक को जो रु 50 लाख रूपये मिलते है, वह भी 50,000 हजार रूपये हो जायेगा । इसीलिए यदि कोई नागरिक यदि राइट टू रिकॉल-कमिश्नर की दरखास्त को लेकर मुख्यमंत्री, विधायक के पास जाता है तो वे सिर्फ गोल-गोल बातें करेंगे लेकिन यदि ] कारण ये प्रक्रिया ना तो पैसों द्वारा खरीदी जा सकती है, ना ही गुंडों या मीडिया द्वारा प्रभावित की जा सकती है |

और यह राइट टू रिकॉल कमिश्नर की प्रक्रिया आने के मात्र 2 महीनो में पुलिस में भ्रष्टाचार नहीं के बराबर हो जायेगा । और उसके मात्र 2-3 महीनों में और 200 राइट टू रिकॉल तरीकों (जैसे नागरिक प्रधानमंत्री बदल सके, आर.बी.आई. गवर्नर बदल सके, जिला शिक्षण अधिकारी बदल सके , जिला सरकारी वकील बदल सके) आ जायेंगीं, और इन सबसे इन विभागों में भ्रष्टाचार नहीं के बराबर हो जायेगा । राइट टू रिकॉल के आने से नागरीकों को हजारों अधिकारी बदलने की जरुरत नहीं पड़ेगी । अधिकतर अधिकारी समझदार है और इमानदारी से काम करना चाहते हैं । इसलिए 50 प्रतिशत अधिकारी राइट टू रिकॉल आने के 15 दिन में काम सुधार देंगे, और जब 1-2 प्रतिशत की नौकरी जाएगी तो अन्य 48 प्रतिशत भी काम सुधार लेंगे और भ्रष्टाचार कम कर देंगे ।

7. सुरक्षा धारा

इस प्रक्रिया में एक सुरक्षा धारा दी गयी है (2.2) कि `कोई भी व्यक्ति अपना मत किसी भी दिन रद्द कर सकता है, बदल सकता है | `इस सुरक्षा धारा के कारण ये प्रक्रिया ना तो पैसों द्वारा खरीदी जा सकती है, ना ही गुंडों या मीडिया द्वारा प्रभावित की जा सकती है |

 

8. समाधान कानून-ड्राफ्ट का जन-समूह में प्रचार विज्ञापन/पर्चों द्वारा, तेजी से परिणाम लाएगा

 

हमने समझाया है कि कैसे तीन लाइन का पारदर्शी शिकायत / पस्ताव प्रणाली गरीबी कम करेगा, पोल्स आदि में भ्रष्टाचार कम करेगा | 2-4 लाख कार्यकर्ता इस जानकारी को करोड़ों तक पहुंचा सकते हैं, कम समय में और मिलकर एक आपातकाल-विरोधी के समान जन-आन्दोलन शुरू कर सकते हैं (देखें चैप्टर 13,14, www.righttorecall.info/301.h.pdf) और प्रधानमंत्री को मजबूर कर सकते हैं कि इस कानून को भारतीय राजपत्र में डाले | ये प्रक्रियाओं के आने से पहले ही, यदि कुछ करोड़ लोगों को इन जन-हित प्रक्रियाओं के बारे में पता चलेगा, तो जनता के नौकर डरेंगे कि यदि उन्होंने अपना काम नहीं सुधारा, तो जन-समूह इन प्रक्रियाओं की मांग करना शुरू कर देंगे और ये प्रक्रियाएँ आ जाएँगी | दूसरे शब्दों में, इन प्रक्रियाओं के लागू होने का डर भी प्रभावशाली है और जनता के नौकरों को सुधरने के लिए मजबूर कर देगा |

 

9. मैं क्यों परवाह करूं ? मैं तो संपन्न हूँ , मुझे कुछ नहीं होगा !

 

यदि भारत रूपी जहाज डूबता है, तो हम सभी डूबेंगे ; हम सभी गुलाम बना लिए जायेंगे और विदेशी कंपनियों और विदेशी देशों द्वारा लूट लिए जायेंगे | आप चाहे एक उच्चवर्ग हो, चाहे एक आम-नागरिक, सभी लूट लिए जायेंगे | सबसे अच्छा है कि दश के सिस्टम रूपी जहाज को सुधारें ! यदि `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली` (टी.सी.पी) द्वारा हम सिस्टम को सुधरेंगे, तो सभी सुरक्षित और संपन्न रहेंगे !

वाचक के मन में कानून की असर-कारकता और विपरीत असर पर सवाल होंगे, जिनके लिए मैं उन्हें मेरा या अन्य राइट टू रिकॉल पार्टी के सदस्य का ऊपर दिए गए लिंक पर संपर्क करने के लिए विनती करता हूँ ।