यदि यह लेख आपको नागरिको के हित में लगे, तो इसकी फोटोकॉपी वितरित करने की विनती हे

सिर्फ तीन लाइन का कानून, कुछ ही महीनों में

गरीबी और भष्टाचार कम कर सकता है

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1.   `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) के प्रस्तावित कानून का ड्राफ्ट

 

मैंने सिर्फ 3 लाईन के एक कानून की मांग की है। इस कानून को मैं `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कहता हूँ। इस कानून को पारित करने के लिए मात्र पधानमंत्री या मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर चाहिए। यह प्रस्तावित `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) कानून मात्र 3-4 महीने में गरीबी कम कर सकता है; पढ़ाई-व्यवस्था अच्छी बना सकता है, पुलिस आदि, में भ्रष्टाचार नहीं के बराबर कर सकता, और सेना मजबूत कर सकता है

मांग किये गये इस `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) सरकारी आदेश का सार है :-

1.      यदि नागरिक चाहे तो अपनी फरियाद 20 रूपये हर पेज देकर कलेक्टर की कचहरी जाकर पधानमंत्री के वेबसाइट पर अपने वोटर आई.डी. नंबर के साथ रखवा सकेगा।

2.      यदि नागरिक चाहे तो 3 रुपये का शुल्क देकर फरियाद पर अपनी हाँ/ना पधानमंत्री वेबसाइट पर दर्ज करवा सकेगा।

3.      हाँ/ना पधानमंत्री पर अनिवार्य नहीं है।

सम्पूर्ण ड्राफ्ट

 

अधिकारी

तरीका / प्रक्रिया

1.

कलेक्टर (और उसके क्लर्क)

कोई भी नागरिक मतदाता यदि खुद हाजिर होकर यदि अपनी सूचना अधिकार का आवेदन अर्जी या भ्रस्टाचार के खिलाफ फरियाद या कोई भी हलफ़नामा / एफिडेविट कलेक्टर को देता है तो कोई भी दलील दिये बिना कलेक्टर ( या उसका क्लर्क ) उस हलफ़नामा / एफिडेविट को प्रति पेज 20 रूपये का लेकर सीरियल नंबर दे कर पधानमंत्री वेबसाइट पर नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ स्कैन करके रखेगा ताकि बिना लॉग-इन कोई भी उस एफिडेविट को देख सके ।

2.

पटवारी (तलाटी लेखपाल)

कोई भी महिला मतदाता, दलित मतदाता या कोई भी मतदाता यदि धारा-1 द्धारा दी गई अर्जी या फरियाद या हलफ़नामा / एफिडेविट पर आपनी हाँ या ना दर्ज कराने मतदाता कार्ड लेकर आये, 3 रुपये का शुल्क (फीस) लेकर पटवारी नागरिक का मतदाता संख्या, नाम, उसकी हाँ या ना को कंप्यूटर में दर्ज करेगा। नागरिक की हाँ या ना प्रधानमंत्री की वेब-साईट पर उसके वोटर आई.डी. नंबर के साथ आएगी। पटवारी नागरिक की हाँ या ना 3 रूपये देकर बदलेगा। गरीबी रेखा नीचे के नागरिको से शुल्क 1 रूपये का होगा। एस.एम.एस. पर ये सिस्टम लागू होने के बाद शुल्क 10 पैसे होगा |

3.

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ये कोई रेफेरेनडम/जनमत-संग्रह नहीं है | यह हाँ या ना अधिकारी, मंत्री, न्याधीश, सांसद, विधायक, अदि पर अनिवार्य नही होगी। लेकिन यदि भारत के 37 करोड़ नागरिक मतदाता कोई एक अर्जी, फरियाद पर हाँ दर्ज करे तो पधानमंत्री उस फरियाद, अर्जी पर ध्यान दे सकते हे या नही दे सकते, या इस्तीफा दे सकते हें । उनका निर्णय अंतिम होगा।

 

2. `पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम) का क्या मतलब है और ये कैसे काम करेगा ?

 

ये पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) ये पक्का करेगा कि नागरिकों की शिकायत/प्रस्ताव हमेशा देखी जा सकती है और जाँची जा सकती है कभी भी ,कहीं भी, किसी के भी द्वारा ताकि शिकायत को कोई नेत्ता, कोई बाबू(लोकपाल आदि) ,कोई जज या मीडिया न दबा सके | अब मान लीजिए के प्रधान मंत्री ने इसपर हस्ताक्षर कर दिए हैं, और पहले वाले उदहारण के अनुसार यदि आप के यहाँ का मंत्री भ्रष्ट है , तो आप या कोई भी ,किसी भी कलेक्टर के दफ्तर जा कर मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकता है और उसे हटाने के लिए भी लिख सकता है | इस शिकायत को कलेक्टर या उसका क्लेर्क स्कैन कर लेगा और प्रधान मंत्री के वेब-साईट पर डाल देगा | अब क्योंकि इस शिकायत का एक-एक शब्द दुनिया के लाखों-करोड़ों लोग देख सकते हैं, कभी भी, इसीलिए इस शिकायत को जरा भी छेड-छाड नहीं किया जा सकता है बिना लाखों लोगों को पता लगे | और इसके समर्थन में व्यक्ति को कलेक्टर के दफ्तर नहीं जाना है, केवल अपने पास के पटवारी या तलाटी , जो भूमि का रिकॉर्ड रखता है और कलेक्टर के द्वारा ही रखा गया होता है, के पास जाना है और अपना वोटर आई.डी. के जानकारी आर अंगुली की छाप देगा और वो भी वेब-साईट पर आ जायेगी | इस तरह कोई भी ये नहीं कह सकता कि समर्थक जाली हैं| उल्टा जो व्यक्ति या मीडिया इस को नहीं उठाएगा , उसकी भरोसा कम हो जायेगी

इसिलिए मीडिया वाले भी उठाएंगे और देश भर में लोग जान जाएँगे कि इस मंत्री के खिलाफ लाखों लोगों की शिकायत है और संभव है कि और लोग भी इसका फिर पटवारी के दफ्तर जा कर इस शिकायत के साथ नाम जोड़ें| और ये लाखों लोग शिकायत करने के बाद ऐसे ही नहीं बैठे रहेंगे, वो अपने स्थान के विधायक,सांसद, आदि लोगों पर दबाव डालेंगे कि देखो, लाखों लोग बोल रहे हैं कि इस भ्रष्ट मंत्री को निकालो, तो फिर ये दबाव उन सांसदों और उन सांसदों द्वारा प्रधान-मंत्री पर भी आएगा| सांसद प्रधान-मंत्री को बोलेंगे कि हमारी लोकप्रियता दिनों दिन कम होती जा रही है| ऐसा ना हो कि हम अगले चुनाव तक बिलकुल ही जीरो हो जाएँ या उससे पहले भी लोगों का गुस्सा हमें झेलना पड़े, इसीलिए आप ये मंत्री पर कार्यवाई करें | इस प्रकार जनता के दबाव से ये प्रक्रिया काम करेगी और लाखोंकरोड़ों लोगों की शिकायत या प्रस्ताव को सरकार को सुनना होगा |

 

3.   क्या, सिर्फ इतना ही?

हाँ, सिर्फ इतना ही। अब सवाल आता है कि क्या मात्र फरियाद और हाँ/ना प्रधानमत्री के वेबसाईट पर आने करने से गरीबी, पुलिस का भ्रष्टाचार, अदालतों का भाईभतिजावाद आदि समस्याओ का हल आ जायेगा? इस चार पेज के लेख में मेनें समझने का प्रयास किया है। वाचक के मन में अनेक प्रश्न आ सकते है, जिनमें से अनेक का जवाब अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (www.righttorecall.info/004.h.pdf) पर दिया है । और वाचक को जवाब न मिले, तो मिलकर या http://forum.righttorecall.info / पर सवाल रखने की विनती है ।

 

4.   क्या प्रत्येक नागरिक के पास इन्टरनेट होना आवयश्क है?

यह सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला गलत सवाल है। मैं इसे गलत सवाल इसलिए कहता हूँ क्योकि `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) में मतदाता के पास इन्टरनेट होना कोई आवश्यक नही है। उनके पास इन्टरनेट हो या न हो, उन्हें कलेक्टर या पटवारी की कचहरी में जाना आवश्यक है । यानि इस कानून के लिए इन्टरनेट की आवश्यकता नही है।

 

5.   `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) से गरीबी कैसे कम होगी?

 

जिस दिन प्रधानमंत्री `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) पर हस्ताक्षर करेंगे, उसी दिन में करीब 200 हलफ़नामा / एफिडेविट वेबसाईट पर दर्ज करूँगा। उनमें से प्रथम हलफ़नामा / एफिडेविट होगी `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) इस सात पेज की एफिडेविट का सम्पूर्ण ड्राफ्ट `जनता की आवाज़ 301`(www.righttorecall.info/301.h.pdf) के अध्याय 5 पर दिया है। यह हलफ़नामा / एफिडेविट एक व्यवस्था का वर्णन है जिसके द्धारा खनिज रोयल्टी और सरकारी जमींन का किराया सीधा नागरिको को मिलेगा। यदि मानो की अक्टुबर-2009 में खनिज रोयल्टी और सरकारी की जमींन का किराया रु 30,000 करोड़ आया। तो रु 10,000 करोड़ सेना के लिय जायेगा ओए हरेक नागरिक के पोस्ट या स्टेट बैंक के खाते में रु 200 जमा हो जायेगा। यदि हर नागरिक महीने में एक बार नगद लेने जाता है तो मात्र 1 लाख क्लर्क चाहिए। आज सरकारी बैंको के पास 6 लाख क्लर्क है । इसका मतलब कि `सेना और नागरिकों के लिए खनिज रोयल्टी(आमदनी)` व्यवस्था में कोई बहुत बड़ी परेशानी नही हें।

अब मैं वाचक से एक प्रश्न पूछता हूँ :-

1.   भारत के नागरिक प्रधानमत्री के पास पर `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) हस्ताक्षर कराने में सफल हुए।

2.   किसी ने `सेना और नागरिकों के लिए रोयल्टी(आमदनी) (एम.आर.सी.एम) की हलफ़नामा / एफिडेविट प्रधानमंत्री को वेबसाईट पर रखा।

3.   अब इस एफिडेविट के बारे में भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता को जानकारी कैसे मिलेगी यह में बाद में कहूँगा।

4.   अब आप भारत के 72 करोड़ नागरिक मतदाता से आर्थिक स्थिति से नीचे के ५५ करोड़ मतदाता ध्यान में रखना।

 

वाचक को प्रथम सवाल : भारत के कुल 72 करोड़ मतदाता में से आर्थिक में से गरीबी की रेखा से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने लोग यह कहेंगे कि खनिज रोयल्टी(आमदनी) और सरकारी जमीन के किराये से महीने के 300-400 रुपये प्रति व्यक्ति आ सकता है, वह मुझे नही चाहिये, यह सरकार की तिजोरी में ही रहने दो? ऐसा आर्थिक स्थिति से नीचे के 55 करोड़ मतदाता में से कितने यह कहेंगे?

मेरा जवाब है कि 5 प्रतिशत से कम लोग ही ऐसे कहेंगे। यानि `जनता की आवाज़` पर प्रधानमत्री के हस्ताक्षर आने के बाद `एम.आर.सी.एम` की एफिडेविट के बारे में जानने पर सोचेंगे कि इसमें मेरा 3 रुपये के शुल्क में ज्यादा क्या नुक्सान है? अब में आप वाचक से दितीय सवाल पूछता हूँ: `जनता की आवाज़` की दूसरी धारा साफ़ कहती है कि हाँ/ना प्रधानमंत्री पर बंधन करने वाला नही है। लेकिन यदि 72 करोड़ नागरिक मतदाता में से यदि 50-55 करोड़ मतदाता MRCM हलफ़नामा / एफिडेविट पर हाँ दर्ज करते है तो क्या प्रधानमंत्री कि हिम्मत होगी कि वह `एम.आर.सी.एम` हलफ़नामा / एफिडेविट पर हस्ताक्षर करने से मना करे? यदि प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करने से मना करते है तो ये 50-55 करोड़ नागरिक, जिन्हें खनिज रोयाल्टी और सरकार जमीन का किराया चाहिए ये हाथ पर हाथ रखकर बेठे नही रहेंगे। इन मे से 1 प्रतिशत ने भी आन्दोलन आदि किया तो प्रधानमंत्री के लिए सरकार चलाना असम्भव हो जायेगा। इसलिए प्रधानमंत्री विवश होकर `एम.आर.सी.एम` पर हस्ताक्षर कर देंगे। और 1-2 महीनो में ही नागरिको को खनिज रोयाल्टी मिलनी शुरू हो जायेगी और गरीबी कम हो जायेगी। इस तरह तीन लाइन का `जनता की आवाज़` कानून 3-4 महीने में ही गरीबी कम कर देगा।

 

6.   `जनता की आवाज़`- पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) से पुलिस, आदि में भ्रष्टाचार कैसे कम होगा?

 

वाचक को तीसरा सवाल : अमेरिका की पुलिस में भारत की तुलना में भ्रष्टाचार कम क्यों है?

इसका एक मात्र है - अमेरिका में नागरिक के पास बहुमति के द्धारा उनके जिला पुलिस के कमिश्नर नौकरी से निकालने की राइट टू रिकोल / प्रजा अधीन राजा (राईट टू रिकाल ) प्रक्रिया है। यह नागरिकों द्वारा नौकरी से निकालने की प्रक्रिया (राइट टू रिकोल) एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर रिश्वत कम लेता है और यदि उसे पता चले कि स्टाफ में कास्टेबल या इंस्पेक्टर रिश्वत ले रहा है तो जाल बिछाकर, सबुत इकट्टाकर उन्हें अदालत में ले जाकर नौकरी से निकलवा देता है। और यहा भारत में हम नागरिको के पास जिला पुलिस कमिश्नर को नौकरी से निकलने का तरीका नही है और इसी कारण है कि कमिश्नर नीचे के अघिकारियों को हफ्ता लेने को कहता है वह आधा रख लेता हें और आधा मंत्री को भेज दें। हम अकसर कहते है कि इसका कारण है कि अमेरिका में पुलिस की तनख्वाह ज्यादा है यदि यह एकमात्र कारण होता तो लाख करोड़ कमा कर रिश्वत लेना बंद कर देते, और क्या तनख्वाह ज्यादा करने के बाद भ्रष्टाचार कम हो जायेगा? पुलिस कर्मियों का वेतन बढाना आवश्यक है, परन्तु मात्र वेतन बढाने से भ्रष्टाचार नही घटेगा।

अब में वाचक को चौथा सवाल पूछता हूँ क्या पाठ्यपुस्तिका या अखबार के लेख लिखने वाले बुद्धिजीवी ने यह जानकारी आपको दी थी कि अमेरिका में नागरिको के पास जिला पुलिस कमिश्नर, जिला न्यायाधीश, जिला शिक्षण अधिकारी, विधायक को नौकरी से निकालने कि प्रक्रिया है या नही? क्योकि ये बूद्धिजिवी नही चाहते कि भारत के नागरिको को यह जानकारी मिले कि अमेरिका में राइट टू रिकोल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) है, और राइट टू रिकोल से अमेरिका ने भ्रष्टाचार और उनकी समस्याओं का हल किया हें। बुद्धिजीवी यह जानकारी इसलिए छिपाना चाहते है क्योकि भारत के धनिक राइट टू रिकोल के कानून नही चाहता।

अमेरिका में कुछ 2000 जिले है। करीब-करीब हर जिले में नागरिको के पास कमिश्नर को निकलने की बहूमति आधारित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में नागरिको को अदालत-कहचरी के धक्के खाने कि जरूररत नही, न ही मुख्यमंत्री के आगे अर्जी करनी होती है या हाथ फेलाने पड़ते है। जिले के नागरिको को बहुमति साबित करना होता, और यदि जिला पुलिस कमिश्नर के खिलाफ बहुमत साबित हो जाये, तो फिर कोई अदालत या मुख्यमंत्री कोई भी उसे बचा नही सकता और उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है एवं यह राइट टू रिकोल (भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार) एकमात्र कारण है कि अमेरिका में जिला पुलिस कमिश्नर भ्रष्टाचार कम करता है, और इस राइट टू रिकोल की कमी एकमात्र वजह है कि भारत में अधिकतर जिला पुलिस कमिश्नर अपने और मुख्यमंत्री के कलेक्शन एजेन्ट बन गये है।

अब पुलिस के भ्रष्टाचार कि समस्या का अति सरल उपाय है भारत तमाम 700 जिलो में नागरिक पुलिस कमिश्नर बदल सके ऐसी प्रक्रिया बनाना। अनेक संभव तरीकों में से एक प्रक्रिया/तरीका प्रजा अधीन-जिला पोलिस कमिश्नर अथार्त जिला पुलिस कमिश्नर बदलने की प्रक्रिया मैंने अपने वेबसाइट पर रखी है। इस ड्राफ्ट पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर आने मात्र पर नागरिको को दूसरे दिन जिले के पुलिस कमिश्नर को बहुमति द्धारा नौकरी से निकलने प्रक्रिया मिल जायगी. और यह प्रक्रिया आने के मात्र 1 महीने में पुलिस का भ्रष्टाचार नही बराबर हो जायेगा। अब मैं वांचक को पाचँवा सवाल पूछता हूँ : क्या भारत के मुख्यमंत्री जिला पुलिस कमिश्नर बदलने की प्रक्रिया ( याने राइट टू रिकोल जिला पुलिस कमिश्नर ) पर खुशी से बिना नागरिको के आन्दोलन या दबाव से हस्ताक्षर करेंगे?

मेरा मानना है नहीं। बिना लोक दबाव या जन-आन्दोलन के भारत का शायद ही कोई मुख्यमंत्री राइट टू रिकोल जिला पुलिस कमिश्नर की प्रक्रिया/तरीके पर हस्ताक्षर देगा। क्योकि यदि बहुमति नागरिको के पास कमिश्नर को निकलने प्रक्रिया है, तो जो कमिश्नर महीने का 1 करोड़ रुपये इकट्टा करता है, वह 1 लाख रूपये पर आ जायेगा। और 1 करोड़ रूपये में से मुख्यमंत्री, ग्रहमंत्री या विधायक को जो रु 50 लाख रूपये मिलते है, वह भी 50,000 रूपये हजार हो जायेगा। इसीलिए यदि कोई नागरिक यदि राइट टू रिकोल कमिश्नर की बर्खास्त लेकर मुख्यमंत्री, विधायक के पास जाता है तो वे सिर्फ गोल-गोल बातें करेंगे लेकिन यदि नागरिक प्रधानमत्री या मुख्यमंत्री को `जनता की आवाज़` पर हस्ताक्षर करने के लिय मजबूर कर देते है, तो उसके बाद अघिकतर नागरिक राइट टू रिकोल कमिश्नर पर अपनी हाँ दर्ज करा देंगे, और जब करोडो नागरिक हाँ दर्ज कराएँगे, तो विवश होकर मुख्यमंत्री को इस प्रक्रिया के ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर करने पडेगे। यह हस्ताक्षर आने के दूसरे दिन नागरिकों को कमिश्नर को निकालने की प्रक्रिया मिलेगी। और

यह राइट टू रिकोल कमिश्नर की प्रक्रिया आने के मात्र 2 महीनो में पुलिस में भ्रष्टाचार नही के बराबर हो जायेगा। और उसके मात्र 2-3 महीनो में और 200 राइट टू रिकोल तरीकों /प्रक्रियाएँ (जेसे नागरिक प्रधानमत्री बदल सके, आरबीआई गवर्नर बदल सके, जिला शिक्षण अधिकारी बदल सके सके, जिला सरकारी वकील बदल सके )आ जाएँगी, और इनसे सबसे इन विभागों में भ्रष्टाचार नही के बराबर हो जायेगा। राइट टू रिकोल के आने से नागरीको को हजारों अधिकारी बदलने की जरुरत नही पड़ेगी। अधिकतर अधिकारी समझदार है और काम करना जानते है। इसलिए 50 प्रतिशत अधिकारी राइट टू रिकोल आने के 15 दिन में काम सुधार देंगे, और जब 1-2 प्रतिशत की नौकरी जायेगी तो अन्य 48 प्रतिशत भी काम सुधार लेंगे और भ्रष्टाचार कम कर देंगे।

7.   सार

इस 4 पेज के लेख में मेनें यह बताने की कोशिश की है कैसे यह मात्र तीन लाइन का `जनता की आवाज़`-पारदर्शी शिकायत / प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम) का कानून गरीबी और भ्रष्टाचार भी कम कर सकता है। वाचक के मन में कानून की असर-कारकता और विपरीत असर पर सवाल होंगे, जिनके लिए में उन्हें मेरा या अन्य राइट टू रिकोल पार्टी के सदस्य का संपर्क करने के लिए विनती करता हूँ। और यदि आप राइट टू रिकोल के कानून को भारत में लाने में हमारी मदद करना चाहते है, तो आपसे http://www.petitiononline.com/rti2en पर हस्ताक्षर करने की विनती है।

इस कानून का समर्थन करने वाले हम सभी नागरिकों से हम विनती करेंगे कि वे वैसे किसी भी उम्मीदवार को वोट दें जो `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली (सिस्टम)` का समर्थन करता है। और हम नागरिकों से यह भी विनती करते हैं कि वे उस नेता को तंग करने के लिए सभी तरह के विरोध प्रदर्शन करें। और यदि किसी नागरिक को यह विश्वास हो जाता है कि नेता जनता की मांग पर कोई जवाब नहीं देगा तो वे उन सभी तरीकों का इस्तेमाल करने को आज़ाद है जो वह करना चाहता है